Sep 16, 2011

विकास और महंगाई-हिन्दी हास्य कविता (vikas aur mehangai or mahangai-hindi hasya kavita)

उनसे पूछा गया कि
‘‘आप इस तरह कब तक महंगाई बढ़ायेंगे,
आम आदमी को यूं तड़पायेंगे,
समझ में नहीं आता
आप लोगों का दर्द कैसे समझ पायेंगे।’’

वह बोले
‘देश विकास की तरफ बढ़ रहा है
चाहे आतंकवाद से लड़ रहा है,
तुमने सुना नहीं हमने चवन्नी बंद कर दी है,
उसी तरह हम चाहते हैं कि
दस, पचास और सौ के नोट को रोने वाले
गरीब लोग
हजार और पांच सौ के नोट पाने लगे,
महंगाई बढ़ेगी तो कमाई भी बढ़ेगी
किसी तरह गरीबी दूर भगे
अमीर भी अपनी दौलत आसानी से
गरीबों में बांटने के साथ ही
इधर उधर ले जायेंगे,
अभी तक अमीर ही देख रहे हैं हजार के नोट
हमारी कोशिश से गरीब भी देख पायेंगे।
---------------
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।
Post a Comment

जेब में पैसा कम पर सपने अमीरी से सजे हैं-हिन्दीक्षणिकायें (zeb mein paisa kam par sapne se saje hain-HindiShort poem}

हमारा विश्वास छीनकर उन्होंने अपनी आस खोई है। अपने ही पांव तले तबाही वाली घास बोई है। ------ जेब में पैसा कम पर सपने अमीरी से स...