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Apr 7, 2018

पाप पुण्य कभी नहीं मरें, इंसान का पीछा बछड़े जैसे करें-दीपकबापूवाणी (Paap punya kabhi nahin maren-DeepakBapuWani)


अमन का पसंद नहीं उनको राग
वैमनस्य की लगा रहे आग।
कहें दीपकबापू सब देते दगा
मिलजुलकर छिपा रहे अपने दाग।
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घोटाले पर आंदोलन का घेरा है,
अपना हिस्सा मिले तो मुंह फेरा है।
कहें दीपकबापू सच्चा साधु वही
कहें जो माया मेरी राम भी मेरा है।
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माथे पर लगाये हुए चंदन
मन में माया के लिये क्रंदन।
कहें दीपकबापू त्यागी बने पाखंडी
बांध रहे गले राजसी बंधन।
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पाप पुण्य कभी नहीं मरें,
इंसान का पीछा बछड़े जैसे करें।
कहें दीपकबापू बता गये चाणक्य
सच सामने आता झूठ से डरें।
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Jun 25, 2017

चोर की बारात में प्रहरी में आते हैं-दीपकबापूवाणी (Chor ki barat mein prahari aate hain-DeepakBapuWani0

धन संपदा के लिये भक्ति करें, कामयाबी से अपने ही मन में आसक्ति भरें।
‘दीपकबापू’ चढ़े जाते महंगे मंच पर, स्वार्थ के सिद्ध प्रेम से अनासक्ति करें।।
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खेल में भी जुगाड़ चलने लगी है, सट्टे की झोली में हार जीत पलने लगी है।
‘दीपकबापू’ धरा छोड़ पर्दे पर देव बसाये, नजरों की ही अगरबत्ती जलने लगी है।।
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सलामत है हाथ जिसमें हथियार नहीं है, गद्दारी से बचा जिसके यार नहीं है।
‘दीपकबापू’ सोच रखीं जमीन पर सदा, आकाश का उनके कंधे पर भार नहीं है।।
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चोर की बारात में प्रहरी में आते हैं, फूहड़ों की महफिल अक्लमंद सजाते हैं।
‘दीपकबापू’ चरित्र का प्रमाण नहीं जांचते, सभी अपने गिरेबां से घबड़ाते हैं।।
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आशा निराशा के बीच लोग झूले हैं, बुलाते कमजोरियां अपनी ताकत भूले हैं।
‘दीपकबापू’ दलालों से करते सुलह, मन उड़े पर पांव चले नहीं पेट जो फूले हैं।।
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आतंक के व्यापार में बहुत लोग पलते, हर वारदात पर विज्ञापन के दिये जलते।
‘दीपकबापू’ हथियारों का खोला कारखाना, शांति कराने हवाई जहाज में चलते।।
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पसीने के मालिक खुले आकाश में सोये हैं, पूंजपति वह जो ठगी के बीज बोये हैं।
‘दीपकबापू’ पहरेदार नाम अपना धर लिया, मगर लुटेरों के आभामंडल में खोये हैं।।
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लोहे लकड़ी के सामान में आसक्ति रखते, ऊंचे दाम चुकाकर भक्ति रस चखते।
‘दीपकबापू’ रूप स्वर गंध की पहचान नहीं, चिंत्तन मे अहंकार का भाव रखते।।
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दिल में मजे की आग जला देते हैं, वासना में देशभक्ति भी चला देते हैं।
‘दीपकबापू’ सौदागरों के चालाक ढिंढोरची, इंसान की अक्ल गला देते हैं।।
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चाहतों में हर पल इंसानी मन डूबा है, बहला लो हर तरह फिर भी ऊबा है।
‘दीपकबापू’ विलासिता में सुख ढूंढता, भीड़ में खड़े फिर भी अकेले में डूबा है।
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बाज़ार में लगे खरीददारों के मेले, भीड़ दिखती पर स्वार्थ से खड़े सभी अकेले।
‘दीपकबापू’ जो मिले उसे यार कहें, जानते हुए कि दाम पर वफा के लगे हैं ठेले।।
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अपनी नाकामी पर कसूर पराया बतायें, मन में विष ज़माने का सताया जतायें।
‘दीपकबापू’ मतलब से संबंध जोड़ें तोड़ें, काली नीयत से अपनी काया ही सतायें।।
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Mar 22, 2017

हर ताबूत में एक बुत भरा है-दीपकबापूवाणी (Har tabut mein ek but Bhara hai-DeepakBapuWani)

जहान के सहारे से अपनी जरुरत धरे, दिल में मदद का ख्याल रखे परे।
‘दीपकबापू’ बंजर जमीन पर खड़े होकर, श्रमहीन सोना पाने की चाह करे।।
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आमजन जन्मदिन याद नहीं रखता, खास की तरफ हर कोई तकता।
‘दीपकबापू’ लिख कथा मिटा देते, प्रेम शब्द कोई हिसाब नहीं रखता।।
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घुमाफिरा कर अपनी बात कहते हैं, सच के साथ डरकर रहते हैं।
‘दीपकबापू’ कायरों के जमघट में, सभी मुर्दों की कहानी कहते हैं।।
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हर ताबूत में एक बुत भरा है, जिंदगी में हारने से हर कोई डरा है।
‘दीपकबापू’ मस्ती खरीदें बाज़ार से, फिर भी दिल बोरियत में मरा है।।
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सच है लातों के भूत बातों से न माने, जब प्यार करो तो घूंसा ताने।
‘दीपकबापू’ मानवाधिकारों के चिंतक, भले बुरे इंसान में फर्क न माने।।
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तिलक लगाकर चलें भक्त कहलाते, नृत्य गायन से दिल आसक्त बहलाते।
‘दीपकबापू’ भक्ति की पहचान रंग बनाये, तस्वीर दिखा सदा वक्त टहलाते।।
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उनके अपने दिमाग एकदम हिले हैं, दूसरे इंसानो से बहुत शिकवे गिले हैं।
‘दीपकबापू’ घर से निकले लालच के साथ, सामने ताकतवर लुटेरे मिले हैं।।
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जीतें तो  तेजी से अपना कोष  बढ़ायें, हारें तो मैदान पर रोष चढ़ायें।
‘दीपकबापू’ खिलाड़ी होकर अक्ल खो दी, कर्म का भाग्य पर दोष मढ़ायें।
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सिंहासन पाने के लिये चलाते अभियान, जलकल्याण पर देते नये बयान।
‘दीपकबापू’ पांव पर चलाते बितायी जिंदगी, दर्द भूल जाते चढ़ते ही यान।।
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