Dec 27, 2013

आम आदमी और जाम आदमी-हिन्दी हास्य व्यंग्य(aam admi aur jaam aadmi-hindi hasya vyangya-hindi hasya vyangya or hindi satire on comman man)



            हमारे देश में आम आदमी होना कभी गौरव की बात समझी नहीं जाती। कोई कितना भी अच्छा  लेखक, कवि, या चित्रकार हो अगर उसके नाम के समक्ष कोई पद, पदवी या प्रकाशन नहीं है तो उसे समाज में आम आदमी ही माना जाता है। अगर वह कहीं अपने रचनाकर्म की बात करे तो उससे  सवाल यही किया जाता है कितुम उसके अलावा क्या करते हो?’
            हमारे समाज की यह वास्तविकता है कि वह राजकीय छवि की ही प्रशंसा करता है।  भगवान श्रीराम राजपद पर बैठे थे उनका राज्य काल इतना प्रशंसनीय रहा कि लोग आज भी उसे याद करते हैं पर जिन बाल्मीकी महर्षि ने उन पर बृहइ  ग्रंथ की रचना के माध्यम से उनको  भगवान के रूप में समाज के सामने प्रतिष्ठत किया उन्हें  कभीं भगवान का दर्जा नहीं मिला।  जिन महर्षि वेदव्यास ने महाभारत ग्रंथ की रचना के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण को भगवत् पर पद प्रतिष्ठत करने के साथ ही श्रीगीता के संदेशों का इस तरह स्थापित किया कि पूरा विश्व उनको मानता है मगर व्यासजी समाज  पूज्यनीय तो बने पर प्रेरक नहीं। कोई व्यक्ति बाल्मीक या वेदव्यास जैसी रचना करने की  दूर यह बात सोच भी नहीं सकता।  जो आम जीवन जी रहा है वह खास बनने के लिये हमेशा बेताब रहता है।
            आम आदमी का भला करना हैका नारा लगाते हुए अनेक लोग खास बन गये। इतने खास कि उन्हें अब आम आदमी की कतार होने का भय लगता है।  उस दिन एक प्रदेश के राज्यमंत्री का समाचार देखा। वह अब चाय बेचता है।  अपना दर्द बयान कर रहा था।  आम से खास बने लोगों के लिये उसके समाचार  डरावना हो सकते हैं। 
            खास आदमी अपना स्तर बनाये रखने के लिये भारी जद्दोजेहद करता है। इसमें उसे आम से खास बनने से अधिक मेहनत करना होती है। 
            बहरहाल अपने दीपक बापू आजकल भारी परेशानी में है।  स्वयं को आम आदमी कहकर अभी तक अपने फ्लाप होने के आरोप से छिपते फिर रहे थे। अब यह मुश्किल हो गया है।
            उस दिन वह एक किराने की दुकान पर गये। वहां से सौ ग्राम शक्कर खरीदी और अपने घर चल दिये। हालांकि उन्होंने शक्कर खरीदने के लिये  अपने घर से पांच किलोमीटर दूर की दुकान चुनी थी ताकि कोई जान पहचान वाला न देख ले। अभी तक समाज में उनकी  छवि मध्य वर्गीय मानी जाती थी,  पर महंगाई ने उनको निम्न वर्ग में पहुंचा दिया था। यह सच्चाई कोई जान न ले इस कारण दीपक बापू किराने का सामान दूर से ही खरीदते हैं।  मगर उनका दुर्भाग्य भी पीछा नहंीं छोड़ता। वह शक्कर खरीद कर पलटे नहीं कि एक कार उनके पास आकर रुकी। आलोचक महाराज उसमें से निकले। बोले-‘‘कार खाली जा रही है। चलो घर तक छोड़ देता हूं। तुम मुझे पांच रुपये दे देना।
            कंगाली में आटा  गीला। चार रुपये की शक्कर खरीदी थी और पांच रुपये का किराया देना पड़े यह दीपक बापू को मंजूर नहीं था। बहरहाल हास्य कवि-भले ही फ्लाप हो-यह सहन नहीं कर सकता कि कोई उसे इस तरह जलील करे। बोले-‘‘नहीं, मै तो पैदल घर से निकला हूं। मुझें अपनी सेहत बनाये रखनी है।
            आलोचक महाराज हंसे-‘‘तुम्हारी सेहत में ऐसा क्या है जिसे बनाये रखना है।  एकदम दुबले पतले कीकट रखे हो। हमें देखो कितने मोटे ताजे हैं।  तुम्हारे पास अभी पांच रुपये नहीं हों तो बाद में दे देना। इतना उधार तो तुम पर रख ही सकता हूं।
            दीपक बापू बोले-नहीं आप जाईये। मेरे पास पांच रुपये का छुट्टा नहीं है।’’
            आलोचक महाराज बोले-‘‘छुट्टा नहीं है, या हैं ही नहीं! जहां तक मेरा अनुमान है कि तुम्हारी जेब में दस दस रुपये के चार, नहीं हो सकता है कि तीन, नहीं नही मुझे लगता है कि  एक दस के नोट से अधिक नहीं हो सकता।  इधर तुम्हारी हास्य कवितायें छोटी पत्रिकाओं में छपती हैं वहां से पैसा मिलता ही नही है।  इधर उधर टाईप कर कमाने का तुम्हारा धंधा भी अब कंप्यूटर की वजह से कम हो गया है।
            दीपक बापू हंसे-‘‘बोले आप हंस लीजिये।  आप को तो बड़े बड़े लोगों का संरक्षण मिला हुआ है। हम तो आम आदमी हैं, ऐसे ही फटेहाल ही ठीक हैं।’’
            इसी बीच दुकानदार को किसी दूसरे ग्राहक को देने के लिये खुले पैसे चाहिये थे। वह दीपक बापू के पास आया और बोला-साहब आपके पास दस रुपये के खुले होंगे। आपने अभी सौ ग्राम शक्कर खरीदी थी। मैंने सोचा आपके पास जरूर खुले पैसे होंगे। मुझे दूसरे ग्राहक को देने हैं।’’
            दीपक बापू चिढ़कर बोले-‘‘नहीं है! जाओ यहां से!
             उसके दूर होते ही आलोचक महाराज कृत्रिम आश्चर्य से बोले-‘‘आम आदमी! तब तो तुमसे डरना पड़ेगा। अरे, तुम्हें मालुम नहीं है आजकल आम आदमी के नाम से बड़ों बड़ों को पसीना आता है।  आम आदमी नाम का एक संगठन जलवे दिखा रहा है। तुम अगर आम आदमी होते तो यहां सौ ग्राम शक्कर खरीदने पांच किलोमीटर चलकर नहीं आते। यह दुकानदार खुद ही सौ ग्राम की बजाय एक किलो शक्कर देने घर आता।’’
            दीपक बोले-एक तो आप हमारी कवितायें छपने के लिये किसी बड़े पत्र या पत्रिका के संपादक से सिफारिश नहीं करते। अब हमारे आम आदमी होने का उपहास तो न उड़ायें जिस पर हम अपनी हास्य कवितायें लिखते हैं।
            आलोचक महाराज बोले-‘‘तुम अब स्वयं को आम आदमी नहीं जाम आदमी कहा करो। तुमने सुना है कि यह बात आम जाम है।  आम आदमी शब्द तो आम की तरह मीठा हो गया है। अपने को आप आदमी कहने से पहले  दमखम रखना वरना.......कहीं तुमने आम आदमी होने का दावा किया और प्रमाणित नहीं कर सके तो कोई मार मारकर जाम आदमी बना देगा।’’
            दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, यही तो हमारे पास एक पदवी थी इसे भी अगर आप खास लोग छीन लेंगे तो बचा ही क्या?’’
            आलोचक महाराज बोले-‘‘भईये देख लो! हम तो तुम्हें आम आदमी नहीं जाम आदमी ही कहेंगे। आम आदमी तो विकास पथर पर चलता है, तुम जाम आदमी की तरह खड़े हो। दूसरी बात अपनी हास्य कविताओं में अब आम आदमी के दर्द पर रोना नहीं क्योंकि अब वह योद्धाओं की पहचान बन गया है।’’
            दीपक बापू   सोचने की मुद्रा में बोले-मगर जाम आदमी शब्द भी नहीं चल पायेगा।  ऐसा करते हैं सामान्य आदमी शब्द चल जायेगा।
            आलोचक महाराज ने पहले आकाश में देखते हुए बोले-देखो भई, आम इंसान शब्द थोड़ा ठंडा है। हास्य कविताओं में नहीं चल पायेगा। जाम आदमी जमेगा।’’
            दीपक बापू बोले-‘‘महाराज आप छोड़ें। आम आदमी शब्द आपको ले जाना है तो ले जायें रहा हमारी हास्य कविताओं के प्रभाव का सवाल! आप परेशान न हों! हमारी हास्य कवितायें आपकी सिफारिश चाहे न पायें पर उनका प्रभाव शब्दों की वजह से हमेशा रहेगा।  हम आम इंसान से ही काम चला लेंगे।
            आलोचक महाराज गुस्से में कार के अंदर चले गये। दीपक बापू परेशान हाल घर की तरफ चल पड़े। सौ ग्राम शक्कर खरीदने की पोल से अधिक उनको इस बात की चिंता थी कि आम आदमी शब्द उनकी लेखनी से दूर जा रहा था।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Dec 12, 2013

लोकतंत्र के गीत-हिन्दी व्यंग्य कविता(loktantra ke geet-hindi vyangya kavita or satire poem)

लोकतंत्र में ईमानदार होने से ज्यादा
दिखना जरूरी है,
वादे करते जाओ,
दावे जताते जाओ,
भले ही यकीन से उनकी दूरी हो।
कहें दीपक बापू
सत्ता का रास्ता चुनाव से जाता है,
लोगों को शब्दों के जाल में फंसना  भाता है,
चल रहा है देश भगवान भरोसे,
इंसानों को कोई क्यों कोसे,
दिल में भले ही कुर्सी के मचलता हो,
दिमाग में अपना घर भरने का विचार पलता हो,
सादगी दिखाओ ऐसी
जिसमें चालाकी भरी पूरी हो।
गरीब का भला न कर पाओ,
पर नित उसके गीत गाओ,
चाहे जुबान की जो मजबूरी हो।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Dec 1, 2013

अंतर्जालीय जनसंपर्क(सोशल मीडिया) के अधिक प्रभावी होने का भ्रम न पालें-हिन्दी संपादकीय (social media in not powerful in hindi language than TV and news paper in india-hindi editorial)



            अंतर्जाल पर सामाजिक संपर्क जिसे हम सोशल मीडिया कह रहे हैं उसके प्रभावों पर इस समय देश में बहस चल रही है।  कुछ लोग यह मानते हैं कि देश की सामाजिक, राजनीतिक तथा वैचारिक स्थिति पर इसका अधिक प्रभाव है तो कुछ इसे नहीं मान रहे।  हमारा मानना है कि यह कथित सोशल मीडिया वास्तव में एक ऐसी आभासी दुनियां है जिसके बारे में अनुमान ही किया जा सकता है।  एक तथ्यात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत करना कठिन काम है। 
            यह लेखक पिछले आठ वर्ष से लिख रहा है पर सच्चाई यह है कि इसका नाम अपने मोहल्ले के बाहर भी एक ब्लॉग लेखक के रूप में कोई नहीं जानता। पहचानना तो दूर की बात है किसी एक व्यक्ति से इसके माध्यम से भौतिक संपर्क तक नहीं हो पाया। कथित रूप से अनेक मित्र बने पर जैसे जैसे खुलासे हो रहे हैं उससे साफ साफ लगता है कि अंतर्जाल कंपनियों ने अपनी अपनी माया जिस तरह रची है उससे ख्वामख्वाह में अपने प्रसिद्ध होने का भ्रम पाल लिया था।  यह भ्रम भी उन मित्रों की ही देन थी जो अत्यंत भावपूर्ण रूप से टिप्पणियां देते थे।  हमारा मानना है कि कोई आठ ऐसे लोग रहे होंगे (जिनके नाम हमारे एक स्थानीय अखबार में छपे थे जो हमें अब याद नहीं हैं) जो हिन्दी भाषा के विशारद थे और वह पेशेवराना अंदाज में संगठित बाज़ार को भविष्य के लिये जमीन प्रदान कर रहे थे।  उनकी प्रतिभा यकीनन असंदिग्ध रही है। इनमें भी कम से कम एक आदमी ऐसा है जो हमें हार्दिक भाव से चाहता रहा होगा। वह कई नाम से आता होगा और यकीनन अपनी टिप्पणी में अपना वास्तविक नाम नहीं लिखता होगा। वह महिला भी हो सकती है, क्योंकि आभासी दुनियां में कुछ भी कहना कठिन है।
            हमने अंतर्जाल पर केवल अपनी रचनात्मकता स्वयं को दिखाने का लक्ष्य रखकर प्रारंभ किया पर कथित मित्र अच्छे अदाकर भी थे इसलिये उन्होंने हमारे सामने अनेक उत्सुकतायें पैदा कीं। अगर हम पत्रकार नहीं रहे होते तो जल्दी उन पर यकीन कर लेते। हमें  यह जल्द समझ में आ भी गया कि इस तरह की आत्मीयता के पीछे कुछ राज है। इशारों में हमने अपनी बात कह भी डाली और उसके बाद हमारी यह आभासी दुनियां एकदम समाप्त हो गयी।  इससे हमें राहत मिली कि हमें कोई पढ़ता नहीं है क्योंकि ऐसे में विवादों में पड़ने का भय नहीं रहता।   अंतर्जाल पर प्रकाशित पाठों से पता चलता है कि देश के कुछ अखबारों में प्रकाशित अनेक लेखों में प्रतिष्ठत हिन्दी ब्लॉगरों के नाम  होते हैं पर हमारा नाम नहीं मिलता।   सीधी बात कहें तो हम आज भी वहीं है जहां आठ वर्ष पहले थे।  कथित मित्रों के पाठ अब भी देखते हैं उसमें अपना नाम तक नहीं होता।  लोग यह न सोचें कि हम इससे निराश हैं क्योंकि हमें पता था कि हमें कुछ पेशेवर लोग केवल हिन्दी में अंतर्जाल पर अधिक से अधिक हिन्दी लिखने के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिये हमसे मित्रता का स्वांग कर रहे हैं।  हम स्थानीय अखबार में छपे नामों को इसलिये भी याद नहीं रख पाये क्योंकि उनमें से कोई भी अपनी वास्तविक छवि के साथ नहीं था।  वह आठ लोग पता नहीं कितने नामों से पाठ और टिप्पणियां लिखते रहे थे। उस समय ऐसा लगता है कि सैंकड़ों ब्लॉगर होंगे पर ऐसा था नहीं। वह न केवल अच्छे लेखक थे पर अच्छे अदाकार भी थे। उनके अनेक पाठ ऐसे थे जो उनकी प्रतिभा का प्रमाण थे।  वह बेहतर ढंग एक ही समय में मित्र और विरोधी की भूमिका निभा लेते थे।  कोई कह नहीं सकता कि एक समय में एक व्यक्ति इस तरह दोहरी भूमिका निभा सकता है। बहरहाल उन्होंने हमसे पीछा छुड़ाया तो हमें भी तसल्ली हुई। एक बात तय रही कि इन आठों में कोई भी ऐसा नहीं था जो हम जैसा स्वतंत्र चिंत्तन रखता हो।  यह सभी कहीं न कहीं देश में प्रचलित राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, तथा कला क्षेत्रों में बंटे समाज में अपने समूहों के प्रतिनिधि थे।  हम विशुद्ध रूप से भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा की तरफ उस समय तक मुड़ चुके थे। सच्ची बात यह कि हमने अंतर्जाल पर लिखते हुए अपने अंदर एक दृढ़ वैचारिक ढांचे का निर्माण किया।  इस उपलब्धि ने हमें इतना मजबूत बनाया कि हमें साफ लगने लगा कि जिस राह पर हम हैं वह किसी हमराही के मिलने की संभावना नगण्य रहेगी। सत्य स्वीकार करने के साथ ही मनुष्य में दृढ़ता का भाव आता है यह हमारी इस यात्रा से निकाला गया निष्कर्ष है।
            इस अनुभव के कारण हमने यह भी निष्कर्ष निकाला कि अगर आठ वर्ष से लिखते हुए जो अंतर्जाल हमें एक अंतरंग मित्र या स्थाई पाठक न दिला सका तो वह किसी के लिये फलीभूत नहीं हो सकता। अलबत्ता यहां काम करने पेशेवर लोग किसी के सामने किसी भी तरह की आभासी दुनियां खड़ी कर सकते हैं।  यह अलग बात है कि उनकी आभासी दुनियां के साथ कुछ सत्य जुड़ जाता है पर उसका प्रतिशत कितना होगा इसका विश्लेषण करना बाकी है।  इस समय चुनावों पर सोशल मीडिया के जिस प्रभाव का उल्लेख किया जा रहा है उसका अधिक आंकलन हमें सशंकित करता है। यह पेशेवर लोग हिन्दी भाषी क्षेत्रों में किसी के लिये प्रचार कर सकते हैं पर उन्हीं व्यक्तित्वों का जो परंपरागत प्रचार माध्यमों में-टीवी और समाचार पत्र-पहले से ही स्थापित हैं। इनमें यह शक्ति नहीं है कि अंतर्जाल पर सक्रिय व्यक्ति को इन माध्यमों में स्थापित कर सकें। यह संगठित बाज़ार और प्रचार समूहों के पिछलग्गू हो सकते हैं पर कोई स्वतंत्र मार्ग निर्मित नहीं कर सकते। आठ वर्ष लिखते रहने के बाद हमारा कोई नाम नहीं लेता इससे अफसोस नहीं होता क्योंकि हमें पता है कि हिन्दी भाषा के स्थापित समूहों ने ही यहां कब्जा किया है और जो हमें कभी पहचानने का प्रयास नहीं करेंगे।  वह परंपरागत समूहों और व्यक्तियों के अनुयायी होकर यहां आये हैं कि किसी स्वतंत्र हिन्दी लेखन समाज का निर्माण करना उनका लक्ष्य है। एक पेशेवर को जिस तरह के तौर तरीके आजमाने चाहिये वही वह कर रहे हैं।  वह धन कमायें हमें बुरा नहीं लगता पर अगर वह समाज में कोई नवीन परिवर्तन का स्वप्न दिखायें तो उनको चुनौती देने का मन हमारा भी करता है।  हमने पहले भी लिखा कि जिस तरह स्थापित हिन्दी भाषी प्रकाशनों का रवैया रहा है कि वह किसी लेखक को उभारते नहीं वरन् उभरे हुए किसी हिन्दी क्षेत्र के अंग्रेंजी लेखक को हिन्दी में अनुवाद कर प्रकाशित कर अपनी कमाई  का लक्ष्य पूरा करना बेहतर समझते  हैं उसी तरह  अंतर्जाल पर भी रहने वाला है। एक सामान्य शुद्ध हिन्दी लेखक के लिये जिस तरह प्रबंध कौशल के अभाव में कहीं नाम और नामा कमाना कठिन है वैसा ही यहां भी है।  अलबत्ता हम जैसे स्वांत सुखाय लेखकों के लिये यह मजेदार है।  कहीं कुछ देखकर अपनी भड़ास यहां निकालना अपने आप में एक मनोरंजक काम लगता है।
            अपनी बात करते हुए हम इस बात को भूल ही गये कि समाज पर इस अंतर्जाल के प्रभाव की बात करना है। एक बात हम यहां यह भी बता दें कि देश के व्यवसायिक टीवी चैनल इससे बहुत डरे हुए होंगे।  वजह यह कि टीवी चैनल से ऊबे लोगों के लिये अंतर्जाल एक नये टॉनिक का काम करता है।  यहीं कारण है कि सभी टीवी चैनल इस तरह की सामग्री देते हैं है जिससे नयी पीढ़ी के लोग उसके साथ बने रहें। यही कारण है कि अनेक समाचार वह फिल्म की तरह पेश करते हैं।  एक ही समाचार पर सात दिन तक बहसें होती हैं। खासतौर से प्रतिष्ठित लोगों का कभी खराब समय आता है तो वह इन चैनलों के लिये कमाई का अवसर बन जाता है।  जिस दिन यह टीवी चैनल फार्म में होते हैं उस दिन हमारे ब्लॉग पिटते हैं और जिस दिन अपने ब्लॉग हिट देखते हैं तो पता लगता है कि टीवी चैनल कमजोर हैं।  सीधी बात कहें तो अभी भी टीवी चैनल और समाचार पत्र ताकतवर बने हुए हैं।  उन्होंने अपने प्रयासों से अंतर्जाल के प्रयोक्ता अपनी तरफ खींच लिये हैं।  दूसरी बात यह भी है कि अंतर्जाल हिन्दी भाषा से नये लेखक देने में नाकाम रहा है जिससे उसका मकड़जाल भी कमजोर रहा है।  अंतर्जाल पर पेशेवर लोग इस बात को समझ लें कि उनके पास एक भी ऐसा नाम नहीं है कि वह दावा कर सकें कि उन्होंने यहां किसी हिन्दी भाषी लेखक को उभारा। यह बात अंतर्जाल के प्रयोक्ताओं को निराश करने वाली है।  सबसे बड़ी बात यह कि हम उनके हिन्दी भाषी क्षेत्रों में उस तरह की पहुंच को मानते ही नहीं जैसा कि वह दावा करते है। कुछ विवाद सोशल मीडिया को लेकर खड़े हुए है पर हमारा मानना है कि यह केवल इस प्रचार के लिये हैं कि अंतर्जाल के प्रयोक्ता बने रहें। जिस तरह फेसबुक (facebook), ट्विटर(twitter) तथा ब्लॉग (blogger and wordpress blog) से मोहभंग होते लोगों को हम देख रहे हैं उससे तो यह लगता है कि यह आम उपयोग से बाहर होने वाला ही है। इसलिये किसी को भी सोशल मीडिया के अधिक शक्तिशाली होने का भ्रम नहीं पालना चाहिये। शेष अगले भाग में।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

जेब में पैसा कम पर सपने अमीरी से सजे हैं-हिन्दीक्षणिकायें (zeb mein paisa kam par sapne se saje hain-HindiShort poem}

हमारा विश्वास छीनकर उन्होंने अपनी आस खोई है। अपने ही पांव तले तबाही वाली घास बोई है। ------ जेब में पैसा कम पर सपने अमीरी से स...