Aug 30, 2007

इस ब्लोगर मीट पर हास्य कविता मत लिखना

पहले ब्लागर का पता उसके मित्र ने ही दूसरे ब्लागर को दिय था और सख्त हिदायत थी कि किसी भी तरह उससे बहस अधिक मत करना-वह कभी कामेडियन लगता है तो कभी ऐकदम दार्शनिक हो जाता है।
दूसरा ब्लागर उसके पत्ते पर पहुंचा। उसने पहले ब्लागर को उसके मित्र का परिचय दिया। पहले ब्लोगर ने भी उसका स्वागत किया और पूछा-'' आपको देखकर खुशी हुई पर मैने कभी आपका ब्लोग देखा ही नहीं है।'
जरूरत क्या-'दूसरे ने कहा-'मैंने उस पर लिखा ही क्या है जो आप पढ पाते। बस अपने आने की घोषणा करने वाली दो-चार लाइनें डालीं और हो गये ब्लोगर, पर मैं आपका लिखा पढता हूं।'
पहला ब्लोगर-'क्या आपने कभी मेरे ब्लोग पर कमेंट दी है?'
दूसरा ब्लोगर्-''नहीं अब मैं आपका लिखा पढ्कर भूल जाता हूं कि कमेंट भी लिखा जाना चाहिये।'
पहला ब्लोगर-आपको बहुत पसंद आता है?'
दूसरा ब्लोगर-नही!आपका लिखा मेरे समझ से परे होता है, पर आप अच्छा लिखते हैं।'
पहला ब्लोगर-जब आपके समझ में नहीं आता तो कैसे कह सकते हैं कि अच्छा लिखता हूं?'
दूसरा ब्लोगर-मेरे समझ में नहीं आता इसलिये। खैर छोडिये इस बात को, काम की बात करें।' पहला ब्लोगर्-'आप मुझसे क्या चाह्ते हैं?'
दूसरा ब्लोगर-'कुछ खास नहीं! बस ऐक ब्लोगर मीट कर लेते हैं। इतनी सारी ब्लोग मीट हो रहीं हैं पर कोई अपने को बुला ही नहीं रहा है, इसलिये आज हम लोग भी ऐक मीटिंग कर लेते हैं। आप उसकी रिपोर्ट लिख देना।'
पहला ब्लोगर-'मैं क्यों लिखूं? आप क्यों नहीं लिखेंगे ?''
दूसरा ब्लोगर-मैं तो उस पर जबरदस्त कमेंट लिखूंगा।''
पहले ब्लोगर ने देखा कि वह लगातार अपने कंधे उचकाये जा रहा था-ऐसा लग रहा था कि वह कोई व्यायाम करने का आदी हो। पहले ब्लोगर ने कहा-'आप अपने कंधे लगातार इस तरह घुमा क्यों रहे हैं। कोई व्यायाम कर रहे हैं या बचपन से ही ऐसी कोई आदत है। इस तरह आपके कंधे घूम रहे हैं या नाच रहे हैं पता ही नहीं लग रहा है।'
दूसरा बोला-'आप ही देख लीजिये।'
पहला ब्लोगर-'आप ऐसा कर क्यों रहे हैं?'
दूसरा बोला-'और क्या करूं? कंप्युटर पर लिखते-लिखते ऐसी आदत हो गयी है। उस पर काम करते हुए भी टाइप करूं या नहीं ऐसे ही कंधे उचकाता रहता हूं ताकि मुझे यह याद रहे कि मैं ऐक ब्लोगर हूं।'
पहला ब्लोगर-हां, अभी आपने बताया था कि उस पर अपने आने की घोषणा करते हुए ऐक पोस्ट डाली थी। वैसे आप किस तरह और कौनसे विषयों पर लिखते हैं?'
दूसरा ब्लोगर्-'मैंने आपको बताया थ कि बस ऐक बार लिख है और वह मेरी जिंदगी की पहली और आखिरी रचना है।
पहला ब्लोगर्-'कुछ तो लिखते ही होंगे।'
दूसरा ब्लोगर्-'बस कुछ ज्यादा नहीं बस कमेंट लिखता हूं कभी-कभी। वैसे इस लाइन में आपसे सीनियर हूं। वैसे कमेंट लिखना भी कोई आसान काम नहीं है।'
पहला ब्लोगर-'आपकी बात सही हैं, कमेंट लिखना भी कोई आसान काम नहीं है। पर आप बताईये हम दो लोग मिलकर कैसे ब्लोगर मीट कर सकते हैं? क्या आपके पास इसके कोई योजना है?'
दूसरा ब्लोगर्-'मेरे पास दस ब्लोग हैं। आपके पास भी छह ब्लोग है। फ़िर चिंता की क्या बात है? किसी भी ब्लोगमीट में इतने सारे ब्लोग लिखने वाले लेखक नहीं शामिल हुए होंगे।'
वह अपने कंधे लगातार उचकाये जा रहा था। पहला ब्लोगर-'आपकी बात सही हैं। पर हम लिखने वाले तो दो ही लोग हैं।'
दूसरा बोला-'मेरे सभी ब्लोगों पर अलग-अलग नाम हैं। किसीपर मेरा असली नाम नहीं हैं। सभी नाम छ्द्म हैं, आपके भी छ्द्म नाम से कुछ् ब्लोग तो होंगे ही?'
पहला ब्लोगर-हां! ऐक धार्मिक ब्लोग है और उस पर केवल धार्मिक विषयों पर ही लिखता हूं।'
दूसरा ब्लोगर-'तब तो मजा आ गया। हमारे मीट में धार्मिक ब्लोगर का होना चार चांद लगा देगा।'
पहला ब्लोगर-पर वह तो मैं ही हूं।'
दूसरा-पर यहां कौंन देखने आ रहा है। आप तो अपने छ्द्म नाम ही लिख देना। और हां मैने अपने अपनी बच्ची और पत्नी के नाम पर भी ब्लोग बनाये हैं पर उन पर कुछ लिखा नहीं है, मीट में उनकी उपस्थिति भी दिखा देना। इससे महिलाओं की उपस्थिति भी हो जायेगी। '
गृह्स्वामिनी चाय और नाश्ता ले आयी उनके जाने के बाद दूसरा ब्लोगर बोला-'आपने भाभी जी से परिचय नहीं कराया?'
पहला-इसलिये कि आप और मैं आराम से चाय और नाश्ता उदरस्थ कर सकें।'
दूसरा-'क्या ब्लोगिंग से चिढती हैं?"
पहला-'नहीं, नफ़रत करती हैं।'
दूसरा-'कोई बात नहीं है। मेरी पत्नी ने भी घर से निकाल दिया है। अब इधर्-उधर रिश्तेदारों के यहां रहकर गुजार लेता हूं। घर में दोबारा घुसने देने के लिये उसने ब्लोगिंग छोडने की शर्त रखी है।'
पहला-'फ़िर आप ब्लोगिंग कैसे करते हैं?'
दूसरा-'ऐक साइबर कैफ़े वाले को पटा रखा है।'
पहला-'आप किस तरह के ब्लोग पर कमेंट रखते है।'
दूसरा-चाहे जिस पर भी। बस लेखक चिढ जाये या डरकर ब्लोगिंग छोड जाये। मुझे कोई डर भी नहीं लगता क्योंकि मेरा तो सब जगह छ्द्म नाम है, यहां तक कि घर परिवार के लोगों के नाम भी छ्द्म हैं। वह तो मैं खुद मानकर चलता हूं कि उनके नाम है।"
पहला-'आपके ब्लोग का नाम क्या है?"
जैसे ही उसने अपने ब्लोग का नाम बताया पहला ब्लोगर उछल कर खडा हो गया और बोला-'अच्छा तो वह तुम थे जो मेरे छ्द्म ब्लोग पर अभद्र कमेन्ट रख गये थे। तुमने मुझे विचाराधारा की लडाई लडने की चुनौती दी थी और मैने उसी वजह से उसे धर्म का ब्लोग बना दिया। उसके बाद तुम आये ही नहीं। आज आओ तो कर लें विचारधारा पर बहस!'
दूसरा-आप नाराज क्यों हो रहें है? आपने खुद ही कहा कि आपका छ्द्म नाम है, अगर आपक असली नाम होता तो आपका हक बनता शिकायत करने का । अच्छा अब आप ब्लोगर मीट पर रिपोर्ट लिख देना।'
पहला-कौनसी ब्लोगर मीट?'
दूसरा-'यह जो अभी यहां हुई।'
पहला-'यह ब्लोगर मीट थी?'
दूसरा-' और क्या थी? मुझे क्या बेवकूफ़ समझ रखा है जो इतने देर से बात कर रहा हूं। मैं केवल मीटिंग में ही बोलता हूं। मेरे पास फ़ालतु समय नहीं है। और हां, इस पर कोई हास्य कविता मत लिख देना। मुझे वह बिल्कुल पसंद नही है।फ़िर कमेंट नहीं लिखूंगा।'

वह चला गया। पहले ब्लोगर ने यह सोचकर चैन की सांस ली ऐक तो घर में यह किसी को पता नहीं लगा कि वह ब्लोगर था दूसरा उसने हास्य कविता के मनाही की थी हास्य आलेख की नहीं।

Aug 27, 2007

क्रिकेट:अब मनोरंजन की दृष्टि से ही देखना ठीक रहेगा

आजकल क्रिकेट में जो द्वंद चल रहा है उससे तो कुछ क्रिकेट प्रेमी बहुत खुश हैं। वजह बिल्कुल साफ है कि जो क्रिकेट के पागलपन की हद तक दीवाने थे अब उनको यह पता लग गया है कि वह ठगे गये हैं-और उनके भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया गया है। उनके राष्ट्र प्रेम को भुनाने के लिए क्रिकेट ऐक ऐसा व्यवसाय बना जिससे की लोगों ने दौलत और शोहरत पाई पर वास्तव में उनका उसकी भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं था।

उस दिन कपिल देव ने टीवी में ऐक साक्षात्कार में इंग्लेंड गयी टीम को बीसीसीआई की टीम कहा बाद में एंकर द्वारा घूर कर देखे जाने पर वह बोले 'मैं यह मजाक में कह रहा हूँ' , पर हम उन लोगों में हैं जो क्रिकेट में कपिल देव के आगे किसी को गिनते भी नहीं है और आज के खिलाड़ी जिनमें सचिन, राहुल और सौरभ भी शामिल हैं कितने भी बडे बने रहें पर उनकी तुलना मैं कपिल से नहीं कर सकता। बहरहाल क्रिकेट की आड़ में जिस तरह इस देश के लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया गया उस पर मीडिया दबे स्वर में सही उस पर दृष्टिपात करता है पर खुल कर कोई नहीं कहता क्योंकि इसकी प्रायोजक कंपनिया ही उनकी भी उनकी सबसे बड़ी विज्ञापनदाता हैं।

आजकल देश में जो दो क्रिकेट संस्थाओं के बीच जो द्वंद चल रहा है उससे मैं भी बहुत खुश हूँ, क्योंकि जिस तरह क्रिकेट की इकलौती संस्था के कर्णधारों ने अपनी संस्था को प्राईवेट कंपनी के रुप में चलाया और इस बात की परवाह नहीं की विश्व में भारतीय क्रिकेट का क्या सम्मान रह जाएगा और राष्ट्र प्रेम की आड़ में लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ हुआ उससे उसके प्रति लोगों में कोई सम्मान नहीं रह गया है। इसके विपरीत भारत द्वारा जीते गये गये इकलौते विश्व कप के कारण कपिलदेव का आज भी देश में सम्मान है क्योंकि उन्होने ही उस टीम का नेतृत्व किया था। सचिन तथाकथित रुप से विश्व के महानतम बल्लेबाज पर उनके नाम ऐक भी विश्वकप नहीं है। हम तो ऐक ही बात कहते हैं कि 'अपने कपिल का जवाब नहीं'

बीसीसीआई और आईसीएल दोनों ही संस्थाएं क्रिकेट की व्यवसायिक संस्थाएं हैं मतलब यह कि क्रिकेट अब ऐसा व्यवसाय बन चूका है जिसे शौक़ से देखें पर देशप्रेम जैसी चीज इसमें देखने वाली कोई बात नहीं होगी। जरूरत तो पहले भी नहीं थी पर ऐक ही टीम होने के कारण लोग उसे अपने देश की टीम समझ लेते थे पर अब तो टीम की पहचान संस्थाओं के नाम पर हो जायेगी। कभी बीसीसीआई की टीम खेलती दिखेगी तो कभी आईसीएल की टीम दिखेगी। मेरा मानना है कि इससे खेल में गुणवता ही आयेगी। अब हमें क्या मतलब कि किसकी टीम है? हम तो अच्छी टीम का ही मैच देखेंगे । उल्टे पहले से ज्यादा मजा आयेगा क्योंकि पहले देश के लिए भी दिल धड़कता था अब उस तनाव से मुक्त हो जायेंगे। कम से कम कोई खिलाड़ी देशप्रेम का नकली भाव तो नहीं ओढ़ कर सामने आएगा। क्रिकेट भी फिल्म और मीडिया की तरह ऐक शो बिजिनेस हो गया है और जिस तरह फिल्म के लोग पैसा लेकर अभिनय करते हैं पर उसकी आड़ में देश प्रेम का कोई दिखावा नहीं करते उसी तरह अब क्रिकेट खिलाडियों को भी अब राष्ट्र नायक का दर्जा नहीं मिलने वाला । अब तो यह है कि अपना अच्छा खेल दिखाओ और पैसा पाओ। देखने वाले भी बेपरवाह होकर देखेंगे। जिस तरह हम किसी फिल्म को देखकर किसी उसके अभिनेता, अभिनेत्री और निदेशक की तुलना किसी पाकिस्तानी फिल्म के अभिनेता, अभिनेत्री और निदेशक से नहीं करते वैसे ही क्रिकेट का भी होने वाला है। अभी हम कहते हैं 'हमारे पास सचिन है' तो पाकिस्तानी कहते हैं के 'हमारे पास इंजमाम है'। यह झगडा अपने आप खत्म हो जाएगा।

कुल मिलाकर अब अपनी भावनाएं क्रिकेट से लगाने का समय निकल गया है। हालांकि क्रिकेट से मुझे विरक्ति तो चार वर्ष पहले से हो गयी थी पर इस बार के विश्व कप के समय तो मेरा दिमाग अपने ब्लोग बनाने में के चक्कर में लगा हुआ था और सोचा था कि प्रतियोगिता का पहला चरण क्योंकि ज्यादा आकर्षक नहीं है इसलिये दूसरे चरण के मैचों से देखेंगे पर बीसीसीआई की टीम पहले ही बाहर हो गयी। इस टीम विश्व का विश्व कप जीतना संदिग्ध है यह बात मैंने अपने पहले लेख में लिखी थी यह अलग बात है कि सादा हिन्दी फॉण्ट में होने के कारण लोग उसे नहीं पढ़ सके। लिखने के बावजूद दिल हैकि मानता ही नहीं था कि हो सकता है शायद अपनी टीम जीत जाये। कपिल देव द्वारा आईसी एल का गठन करने के बाद यह दबाव तो खत्म हो गया है कि क्रिकेट में देशप्रेम जैसी भावनाएं जोड़ने की कोई जरूरत है, क्रिकेट को मनोरंजन की दृष्टि से देखना ही ठीक रहेगा।

Aug 24, 2007

ऐसा भी होता है-कहानी

उनके दोनो बेटे-बहु प्रतिवर्ष की भांति भी इस वर्ष अपने माता-पिता के पास रहने के लिए आये। अब पति-पत्नी अकेले ही रहते थे। पति अब रिटायर हो गये थे, और दोनों ही सुबह, दोपहर और शाम एक मंदिर में जाते थे। उनके दोनों लड़के पढने के बाद शहर से बाहर नौकरी कर रहे थे और उनकी अच्छी आय थी। अपने माता-पिता से मिलने वह साल में पांच-छ: बार जरूर आते थे पर विवाह के बाद पिछले तीन वर्षों में यह आगमन केवल एक वर्ष तक रह गया था। इधर उनके पिताजी भी रिटायर हो गये थे। रिटायर होने से पूर्व भी पति महोदय दिन में दो बार अपनी पत्नी को सुबह-शाम जरूर मंदिर गाडी पर बैठा कर जरूर ले जाते थे, अब वह क्रम तीन बार हो गया था। उनकी पत्नी अपने मंदिर जाने का प्रदर्शन पडोस में जरूर करतीं और बार-बार अपने धर्मभीरू होने की चर्चा अवश्य करती। और कभी-कभी बिना किसी आग्रह के ज्ञान भी देतीं देती थी। उनका मंदिर घर से दो किलोमीटर दूर था और किसी दिन गाडी खराब हो या पति महोदय का स्वास्थ्य ठीक न हो तो उन्हें अनेक ताने सुनने को मिलते। वह कभी घर से मंदिर तक पैदल नहीं गयीं।


उस दिन वह अपनी बहुओं पर अपना ज्ञान बघार रहीं थीं-"अपने शरीर को चलाते रहना चाहिए, वरना लाचार हो जाता है अब देखो तुम्हारे ससुर कभी नाराज होकर मंदिर नहीं ले जाते तो मैं पैदल ही चली जाती हूँ कभी भी झगडा नहीं करती- अपने पति से कभी भी झगडा नहीं करना चाहिए। बिचारे पुरुष तो जीवन भर कमाने में ही समय गंवाते हैं।"

वगैरह........वगैरह।इधर वह अपने पति के साथ मंदिर गयी और उधर उनकी बहुओं ने पडोसियों से बातचीत शुरू की और फिर उसने सासके दावे की इस तरह सत्यता का पता लगाने का प्रयास किया कि वह बिचारे समझ नहीं पाए ।

एक पडोसन बोली -"हमने तो कभी भी तुम्हारी सास को पैदल जाते हुए नहीं देखा, अगर गाडी खराब हो या उनका मन न हो या उनके कोई रिश्तेदार आ गये हौं तो मंदिर न ले जाने के लिए उनको हजार ताने देतीं हैं। तुम्हारे ससुर तो सीधे हैं सब सह जाते हैं।"

बहुओं की ऑंखें खुल गयीं, उन्हें अपनी सास पर वैसे भी यकीन नहीं था- और अब तो पडोसियों से भी पुष्टि करा ली थी। उन्होने अपने-अपने पतियों को उनकी माँ की पोल बतायी-हालांकि पडोसन ने आग्रह किया था कि वह ऐसा न करे क्योंकि उनके जाने के बाद उनकी सास उनसे लडेगी।

इधर उनके बहु-बेटे अपने घरों को रवाना हुए और उधर वह अपने पडोसियों पर पिल पडी-"तुम लोगों से किसी का सुख देखा नहीं जाता। मेरी बहुओं को भड़काती हो। अब देखना जब तुम्हारे घर में बहुएँ आयेंगी तो मैं भी यही करूंगी।"

एक पडोसन बोली-"हमें क्या पता था कि तुम्हारी बहुएँ चालाकी करेंगी। पता नहीं तुमसे क्या बात नमक मिर्च लगाकर कह गयीं हैं।"

मगर वह नहीं रुकीं और बोलतीं गयी-"तुम लोगों का क्या मतलब? मैं अपनी बहुओं से कुछ भी कहूं। तुन कौन होती हो बीच में दखल देने वाली ....." उन्होने और भी बहुत कुछ कहा और इस तरह सास-बहु का झगडा पडोसियों के मत्थे आ चूका था।

Aug 23, 2007

धूल का प्रतिरोध

बहुत दिन बाद ऑफिस में
आये कर्मचारी ने पुराना
कपडा उठाया और
टेबल-कुर्सी और अलमारी पर
धूल हटाने के लिए बरसाया
धूल को भी ग़ुस्सा आया
और वह उसकी आंखों में घुस गयी
क्लर्क चिल्लाया तो धूल ने कहा
'धूल ने कहा हर जगह प्रेम से
कपडा फिराते हुए मुझे हटाओ
मैं खुद जमीन पर आ जाऊंगी
मुझे इंसानों जैसा मत समझो
कि हर अनाचार झेल जाऊंगी
इस तरह हमले का मैंने हमेशा
प्रतिकार किया है
बडों-बडों के दांत खट्टे किये हैं
जब भी कोई मेरे सामने आया '
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Aug 22, 2007

आदमी उमर भर अनजान रहता है

अपने शारीर के हर अंग को
उपयोग प्रतिदिन करते हुए
भी कौन उसका महत्व जान पाता है
जीता है जिस मन के साथ
जीवन भर उसे कौन समझ पाता है

ऑंखें देखने के लिए मिली
पर क्या देखता है उमर भर
केवल अपने दायरे में क़ैद
खुद को ही करते हुए
अपने परिश्रम से एकत्रित वस्तुएं
और उनके रक्षा के लिए कर देता है
बरबाद कर देता है अपनी कीमती दृष्टि
नहीं देख पाता पूरी सृष्टि
कभी मूक जीवों की आँखों को नहीं देखता
इसलिये उमर भर आदमी आंखों की
भाषा को नहीं पढ़ पाता है

नाक से लेता सांस
चीखता-चिल्लाता, डरता और क्रोध में
खर्च कर देता
कभी फूलों के पास जाकर उन्हें सूंघे
कभी पेड के नीचे बैठकर अपनी साँसें ले
पर उमर भर अपने ही घर की चाहरदीवारी में
घुसकर बैठ जाता और
कभी अपने नाक से ली गयी साँसों का
आदमी महत्व नहीं जान पाता है

अपने दोनों हाथों से बटोरता है वह दौलत जो
कभी उसके साथ नहीं जाती
लुटने के भय से हमेशा ताने रहता
कभी नहीं अपने हाथ से दूसरे के
कल्याण के लिए नहीं उठाता
अपने हाथों की अस्तित्व को
उमर भर आदमी नहीं जान पाता है

पूरी जिन्दगी अपनी टांगो पर इधर-उधर
दौड़ता फिरता है
जब तक नहीं थकता
तब तक नहीं करता विश्राम
अपनी टांगों की ताकत से हमेशा
आदमी अपने को अनजान पाता है
सब जगह ढूँढता ख़ुशी पर
अपने मन को हमेशा खाली पाता है

Aug 4, 2007

जीवन के खेल निराले

आँखों से देखने की चाहत में
कई लोगों को गर्त में
गिरते देखा है
बोलने के लिए चाहे जैसे
शब्द दूसरों पर पत्थर की
तरह फेंकने वालों को
अपने ही वाक जाल में
फंसते देखा है
झूठ और दिखावटी अभिनंदन के
लिए उठने वाले हाथों को
हाथकडी में बंधते देखा है

इन सबसे परे होकर
जो रखते हैं अपने
मन पर नजर
जीभ से निकले शब्दों में
जिनके होता है मिठास
हाथ उठते हैं
जिनके केवल सर्वशक्तिमान के आगे
उन्हें ही सहज भाव से
जीवन जीते देखा है
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Aug 1, 2007

पहले तय करो चाहते क्या हो

तुम तय करो पहले
अपनी जिन्दगी में
चाहते क्या हो
फिर सोचो
किस्से और कैसे चाहते क्या हो

उजालों में ही जीना चाहते हो
तो पहले चिराग जलाना सीख लो
उससे पहले तय करो
रोशनी में देखना चाहते क्या हो


बहारों में जीना है तो
फूल खिलाना सीख लो
उड़ना है हवा में तो
जमीन पर पाँव
पहले रखना सीख लो
अगर तैरना है तो पहले
पानी की धार देखना सीख लो
यह ज़िन्दगी तुम्हारी
कोई खेल नहीं है
इससे खिलवाड़ मत करो
इसे मजे से तभी जीं पाओगे
जब दिल और दिमाग पर
एक साथ काबू रख सकोगे
तुम्हारे चाहने से कुछ नहीं होता
अपने नसीब अपने हाथ से
अपनी स्याही और
अपने कागज़ पर
लिखना सीख लो
पर पहले यह तय करो
इस जिन्दगी के इस सफर में
देखना और पढ़ना चाहते क्या हो
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आओ खूबसूरत चरित्रों की फिक्र करें-दीपकबापूवाणी (Aao Khubsurat charitron ki Fikra kahen-DeepakBapuwani)

जिससे डरे वही तन्हाई साथ चली , प्रेंमरहित मिली दिल की हर गली। ‘ दीपकबापू ’ हम तो चिंगारी लाते रहे अंधेरापसंदों को नह...