Oct 29, 2014

स्वामी बन रहा सेवक-हिन्दी कविता(swami ban raha sewsk-hindi poem)



निर्धन की सेवा
कोई धर्म बताकर
हृदय के  बड़े चाव से
सेवका की भूमिका निभा रहा है।

कोई आधुनिक समय की
आवश्यक परंपरा मानकर
चंदे का ग्राहक 
प्रचार के लिये स्वयं  सेवक की
भूमिका  निभा रहा है।

कहें दीपक बापू सर्वशक्तिमान से
कैसी रची यह माया,
कभी खुश नहीं रही
इसका पीछा करती
मनुष्य की काया,
भाग्य लिख दिये
सभी के अलग अलग
जिसकी जेब खाली
वह दाल रोटी खाकर भी
भजन में मग्न रहता
उसकी चिंता के व्यापार मे
स्वामी दिखाने के लिये
सेवक की भूमिका निभा रहा है।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Oct 24, 2014

दीपावली और अंधेरे के साये-हिन्दी कविता(deepawali aur andhere ke saye-hindi poem)



दीपावली की रात को
जले दीये
सुबह बुझे खड़े थे।

उनके तले  चारों तरफ
अंधेरे साये प्रातःकाल तक
डेरा डाले अड़े थे।

कहें दीपक बापू रंग बदलती दुनियां में
जहां ऊंचाई है,
वहीं खाई है,
जहां आनंद मिलने के संकेत हैं,
वही खड़े स्वार्थ के खेत हैं,
उत्थान के चलते हैं दौर,
पतन पर भी करते लोग गौर,
खुशी की रात जले पटाखे
चमके मस्ती के बादल
सुबह सूरज की सलामी के लिये
जमीन पर गंदगी के ढेर भी खड़े थे।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Oct 17, 2014

धन की दौड़ में-हिन्दी कविता(dhan ki daud mein-hindi kavita)




धन का शिखर
हमेशा चमकदार दिखता है
मगर कोई चढ़ नहीं पाता।

एक रुपये की चाहत
करोड़ों तक पहुंचती
चढ़ते जाते फिर भी लोग शौक से
चाहे वह हमेशा दूर ही नज़र आता।

कहें दीपक बापू माया की दौड़ में
शामिल धावकों की कमी नहीं है,
कुछ औंधे मुंह गिरे
जो दौड़ते रहे
फिर भी उनको
सफलता जमी नहीं है,
यह माया का खेल है
किसी के हाथ आयी
किसी के हाथ से गयी
जीतकर भी कोई नहीं
सिर ऊंचा कर पाया
नाकाम धावक
प्राण भी दांव पर लगाता है।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Oct 5, 2014

मर गयी संवेदना-हिन्दी कविता(mar gayi sanvedna-hindi poem)




हादसों के समाचार पर
लोग आंखों में आंसु लाकर
अपने ही हृदय में बसे
तनाव कम कर जाते हैं।

फिर जुटती कहीं भीड़
पहुंच जाते दर्शक बनकर
जमघट के खतरे
तब वह भूल जाते हैं।

कहें दीपक बापू बेचैन समाज में
अकेलेपन से घबड़ाये सभी,
अपने हाल से छिपते हुए
गैर के हादसे से
सबक लेने की सोचते कभी,
मर गयी संवेदना
दूसरे की मौत पर ही
लोग अपने जिंदा होने का
अहसास कर पाते हैं।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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जेब में पैसा कम पर सपने अमीरी से सजे हैं-हिन्दीक्षणिकायें (zeb mein paisa kam par sapne se saje hain-HindiShort poem}

हमारा विश्वास छीनकर उन्होंने अपनी आस खोई है। अपने ही पांव तले तबाही वाली घास बोई है। ------ जेब में पैसा कम पर सपने अमीरी से स...