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Aug 27, 2017

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर-दीपकबापूवाणी (man ke khet par dhan ka Chakkar-DeepakBapuwani)

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर, वैभव रथ पर सवार देव से लेता टक्कर।
‘दीपकबापू’ आदर्श की बातें करते जरूर, रात के शैतान दिन में बनते फक्कड़।।
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भक्ति व्यापार के लिये जो घर तजे हैं, चंदे से कमाये मुफ्त पर उनके बजे हैं।
‘दीपकबापू’ मेले में भीड़ आती भक्तों की तरह, हर रंग के भगवान वहां सजे हैं।।
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हृदय में रस से पत्थर भी
गुरु हो जाते हैं।
दर्द के मारे रसहीन
जहां कोई मिले
रोना शुरु हो जाते हैं।
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गरीबों के उद्धार के लिये
जो जंग लड़ते हैं।
उनके ही कदम
महलों में पड़ते हैं।
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दिल की बात किससे कहें
सभी दर्द से भाग रहे हैं।
किसके दिल की सुने
सभी दर्द दाग रहे हैं।
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ईमानदारी से जो जीते
गुमनामी उनको घेरे हैं।
चालाकी पर सवार
चारों तरफ मशहूरी फेरे है।
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जहां शब्दों का शोर हो
वह शायर नहीं पहचाने जाते।
जहां जंग हो हक की
वहा कायर नहीं पहचाने जाते।
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समय का खेल 
कभी लोग ढूंढते
कभी दूर रहने के बहाने बनाते।
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राजपथों की दोस्ती
वहम निकलती
जब आजमाई जाती है।
गलियों में मिलती वफा
जहां चाहत जमाई नहीं जाती है।
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कंधे से ज्यादा  बोझ दिमाग पर उठाये हैं,
खाने से ज्यादा गाने पर पैसे लुटाये हैं।
मत पूछना हिसाब ‘दीपकबापू’
इंसान के नाम पशु जुटाये हैं।
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नाम कमाने मे श्रम होता है,
बदनामी से कौन क्रम खोता है।
‘दीपकबापू’ कातिलों की करें पूजा
शिकार गलती का भ्रम ढोता है।।
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हम तेरे दर्शन करते रहेंगे
तू दिख या न दिख।
हम तेरा नाम कहते रहेंगे
तू लिख या न लिख।
तेरी दी जिंदगी तेरे नाम लिखेंगे
तू दिख या न दिख।
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Jul 6, 2017

जेब में पैसा कम पर सपने अमीरी से सजे हैं-हिन्दीक्षणिकायें (zeb mein paisa kam par sapne se saje hain-HindiShort poem}

हमारा विश्वास छीनकर
उन्होंने अपनी आस खोई है।
अपने ही पांव तले
तबाही वाली घास बोई है।
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जेब में पैसा कम
पर सपने अमीरी से सजे हैं।
वातानुकूलित मॉल में
ग्राहक सोचता सामान
देखने में कितने मजे हैं।
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समस्या खड़ी कर
हल का सवाल पूछने आते हैं।
पत्थर दिल के बुत
हवा से जूझने जाते हैं।
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मन में बाज़ार से
खरीददारी की चाहत
पर जेब खाली है।
ज़माने ने जिंदगी
उधार पर ही टाली है।
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मिलती खुशी उधार से
चाहे जहां से हम मांग लेते।
नकद में सस्ता मिला चैन
इसलिये चाहतें यूं ही टांग देते।
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बस्तियों में आग लगा देते हैं
अमन में जंग जगा देते हैं।
जज़्बात के सौदागर
इंसानों को दगा देते हैं।
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Jun 11, 2017

गर्मी की तपती धूप देह को जलाती है-हिन्दी में छोटी क्षणिकायें (Garmi ki Tapti Dhoop deh ko jalate hai-ShortHindiPoem)

मौसम के साथ दिल के
मिजाज भी बदल जाते हैं।
जिंदगी से यूं ही निभायें
हालातों से ख्याल भी
बदल जाते हैं।

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जिंदगी के चलते दौर
हर बार साथी बदल जाते हैं।
कुछ की यादें साथ चलतीं
कुछ भूले में बदल जाते हैं।
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हर बार नयी काठ की हांडी
आग पर चढ़ जाती है।
नया रसोईया देखकर
स्वाद की उम्मीद जो बढ़ जाती है।
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बाज़ार लगा है
पशु पक्षी क्या
इंसान भी बिकते हैं।
दुकानों में अमीर
ग्राहक और विक्रेता
हमेशा ही दिखते हैं।
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नाम के राजा
काज तो ऊपरवाला ही
चला रहा है।
लोभियों ने शहर में लगाई आग
कहते हैं भूखा जला रहा है।

अपना हमारा दुश्मन
एक दिखाकर हाथ मिलाया।
हमारे कंधे पर शिखर चढ़े
उससे अपना गला मिलाया।
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कहीं जीतने की जंग
कहीं खरीद के रंग
जमीन की लड़ाई जारी है।
कभी बंदूकधारी जीते
कभी धनी की बारी है।
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गर्मी की तपती धूप
देह को जलाती है।
पीड़ा इतनी कि
दिल में पल रहे
दर्द को भी गलाती है।
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चिंताओं में डूबे हैं
चित्तक कहलाते हैं।
दुनियां का डर बेचकर
सबका दिल बहलाते हैं।
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उनके नाम के सहारे ही
जिंदगी भर चलते रहे।
हालात बिगड़े तब आया ज्ञान
भारी भ्रम में पलते रहे।

संगमरमर के पत्थर से बने
महलों में भी क्या रखा है।
जब शब्दज्ञान का हर रस
दिल दिमाग ने चखा है।
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पर्दे पर सपने बेचने वाले
हांका लगाते हैं।
लटकायें सुंदर पर खाली झोली
पर चालाकी का टांका लगाते हैं।
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मांगते तो सामनों का
ढेर जुटा लेते।
चाही दर्द की दवा
मिलती जाती बेबसों में
ढेर लुटा देते।
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पैसे पद प्रतिष्ठा के
तख्त पर बैठे
क्या गरीब का भला करेंगे।
वातानुकूलित कक्ष में पैदा ख्याल
धरा पर क्या चला करेंगे।
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आज भी पापों के घड़े
कभीकभी फूट जाते हैं।
यह अलग बात भरने वाले
जमानत पर छूट जाते हैं।
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फरिश्ता बनने की चाहत
बंदे को मसखरा बना देती है।
त्याग के तपयोगी को
आग सोना खरा बना देती है।
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छात्र किसान जवान के नाम
झंडा लगा देते।
भीड़ में इंसान जुटते
भेड़ की तरह
नारा लगाकर जगा देते।

Apr 3, 2017

गज़ब उनकी खामोशी दिल को लुभाती है-हिन्दीक्षणिकायें (Gazab unki Khamoshi lubhati hai-ShortHindiPoem)

नाव चली लहरों से लड़ने
किनारा मिला नहीं
मांझी ने ही किया छेद
इसलिये डूबने का
हुआ गिला नहीं
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गज़ब उनकी खामोशी 
दिल को लुभाती है।
तारीफ  के काबिल
उनका नज़र डालना
जो फूल भी चुभाती है।
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नाम तो बड़े सुने
छोटे दर्शन से सिर धुने।
थक गये यह सोच
कब तक ख्वाब बुने।
..............
बंद कमरों की गप्पबाजी
कभी बाहर नहीं आती।
राई को ढके पर्वत
यही राजनीति बताती।
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घर से बाहर आते
पर दिमाग के द्वार बंद हैं।
ताजगी की अनुभूति में
उनकी संवेदनायें मंद हैं।


दिल पढ़ा नहीं
आंखें देखकर
श्रृंगार पद रच डाला
अर्थरहित स्पंदहीन
शब्द हुआ मतवाला।
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समाज सेवा के ठेके
वादों पर मिल जाते हैं।
नकली जुबानी जंग से
लोग यूं ही हिल जाते हैं।
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बंदर जैसी उछलकूद
करते रहो
लोग समझें बंदा व्यस्त है।
कुछ नहीं कर पाओगे तुम
इसलिये हौंसला बढ़ाओ
उन लोगों का
जो पस्त है।
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अपनी बात इशारों में
शेर कहकर लिखते हैं।
मन भी होता हल्का
शालीन भी दिखते हैं।
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विकास के रास्ते
तांगे से कार पर
सवार हो गये।
जज़्बातों से ज्यादा
सामानों के यार हो गये।
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एकांत मे भी अकेले
कहां होते हम
अपना अंतर्मन जो साथ होता।
मौन से मिलता वह
वरना कोने में बैठा रोता।


चांद और सूरज से
तुलना न कीजिये।
अंधेरा को चिराग ही पहचाने
रौशनी का मजा यूं ही लीजिये।
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घर सामान से भरे हैं,
दिल जज़्बात से डरे हैं।
शोर करते भीड़ में लोग
अकेलेपन से डरे हैं।

Feb 12, 2017

सौदे की वफादारी एक साल-हिन्दी व्यंग्य कविता (saude ki vafadaari ek saal-HindiSatirePoem)


सामानों से शहर सजे हैं
खरीदो तो दिल भी
मिल जायेगा।

इंसान की नीयत भी
अब महंगी नहीं है
पैसा वफा कमायेगा।

कहें दीपकबापू बाज़ार में
घर के भी सपने मिल जाते
ग्राहक बनकर निकलो
हर जगह खड़ा सौदागर
हर सौदे की वफादारी 
एक साल जरूर बतायेगा।
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एक दूसरे पर
सब लफ्जों से बरसे हैं।
जुबान पर गालियों के 
एक से बढ़कर एक फरसे हैं।

नासमझों की भीड़ खड़ी
कब जंग होगी 
कब बहेगा लहू
दूश्य देखने के लिये
सभी बहुत तरसे हैं।
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Sep 25, 2016

नकली दूध पीकर वीर नहीं बने-दीपकबापूवाणी (Naqli Dudh peekar veer nahin bane-DeepakBapuWani)

हम खुश है चाहे नहीं बुलाया तुमने अपनी महफिल में।
फिर भी कोई शिकायत नहीं तुमसे हमारे टूटे दिल में।।
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बेपरवाह होकर घड़ियों में वक्त चले, चिराग अंधेरों में जले।
फिक्र में अक्ल का घनी इंसान, उसके पेट में रोटी कैसे पले।।
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जनता का जीवन कागज से चलाते, स्याही से सड़क पर चिराग जलाते।
‘दीपकबापू’ स्वयं रैंग कर चलते हैं, तेज दौड़ने के संदेश चलाते।।
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ख्वाहिशें कर देती है सोच तंग, परिवार में लगी है बड़ी जंग।
‘दीपकबापू’ ज्ञान की करें बड़े बात, पीते रहते माया की भंग।।
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संतों का सिंहासन पंत जैसा, पंतों का प्रवचन संत जैसा।
‘दीपकबापू’ पहचान के संकट में फंसे, हर चेहरा एक जैसा।।
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हम दो खुशी बांटने चले थे हवाओं ने रुख बदल दिया।
उनके घर देखा जब तोहफों ढेर, अपना रुख बदल दिया।।
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नोट-याद नहीं आ रहा एक क्षेत्रीय भाषा में पंत शब्द का अर्थ राजपद से है।
हिन्दी दिवस पर वक्ता खूब बोलेंगे, पुराने राज नये जैसे खोलेंगे।
‘दीपकबापू’ करें रोज अंग्रेजी को सलाम, हिन्दी मंच पर डोलेंगे।।
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कोई बेवफा कहे परवाह नहीं, आगे रिश्ते ढोने से बचे रहेंगे।
वफा के सबूत नहीं ला सकते, मजबूरी का बोझ भी नहीं सहेंगे।।
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नकली दूध पीकर वीर नहीं बने, भूख पर छाये महंगाई के बादल घने।
‘दीपकबापू’ रुपहले पर्दे पर बेचें गरीबी, काले दौलतमंदों के महल बने।।
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अपनी उदासी से स्वयं छिपना भी मुश्किल है।
हमारे अंदर ही बैठा पर कितना पराया दिल है।।
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Aug 3, 2016

नारों पर पका रहे खाना-हिन्दी कविता(Naron par Paka rahe Khana-Hindi kavita

देख था उनका चेहरा
लगा कि वह
चमका देंगे ज़माना।

उनके बोल सुनकर लगा
जिंदगी में हो जायेगा
आसान सांस पाना।

कहें दीपकबापू नारों पर
पका रहे सभी का खाना
बांट रहे कल्याण का दाना
उनके फैलाये यकीन के
जाल में कभी दिल न फसाना।
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Jul 18, 2016

भावनाओं की मौत-हिन्दी शायरी (Bhavnaon Ki Maut-HindiShayari)


उनके घर का दरवाजा
अधिकतर बंद रहा था
फिर भी आंखें
उसकी तरफ ताकती थीं।

वह कभी नहीं आयेंगे
इस खबर ने
हृदय की भावनाओं को
मौत की नींद सुला दिया
जो उनका चेहरा 
देखने की प्रतीक्षा में
बाहर झाकती थीं।
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Apr 30, 2016

वह सब्र ही तो है जो इंसान के साथ रहे-हिन्दी क्षणिकायें (Vah sab hi to hai insan ke sath rahe-HindiShortpoem)

खुश होने के बहाने
बहुत मिल जाते
कोई तलाश तो करे,
आंसुओं के कूंऐ में
रहने के आदी मेंढकों में
कोई कैसे आस को भरे।
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ऊंचे सपने लोग देखते
पर अपनी सोच
जमीन से नहीं उठाते।
सामानों के समंदर में तैरते
सस्ती दर पर
महंगा पसीना लुटा जाते।
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वह सब्र ही तो है
जो इंसान के साथ रहे
वरना तो ज़माना
दिल तोड़ने का इंतजाम
खुशी से कर देता है।
आंखों में चमक देखे
गम आगे कर देता है।
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जिंदगी के सफर में
राहों के साथ
हमराही भी बदल जाते हैं।

मुश्किल यह कि
कदम कभी पीछे जाते नहीं
बिछड़े चेहरों की
बस याद ही साथ लाते हैं।
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कैसे मिलें उनसे
अपना पता देकर
जो लापता हो जाते हैं।

उनके दिल में झांककर
हालचाल क्या जाने
दिखाते अपनी अजीब अदा
फिर खफा हो जाते हैं।
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आंखों से दूर हो गये
फिर भी तुम
दिल से निकले नहीं हो।

हमें भुलाकर
तुमने चिंता से ली आजादी
फिर भी तुम
हमारी यादों से निकले नहीं हो।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Jan 29, 2012

प्रकृति और संवेदनाएँ-हिन्दी कविता (prakrati aur samvedanen-hindi kavita or poem)

पत्थरों के घर
दीवारें रंगीन हैं,
लकड़ी और लोहे के सामान से
सजी बैठक,
खिड़की से सर्दी की धूप अंदर झांक रही है,
उसके स्पर्श का आनंद
ले सकता है कौन।
कहें दीपक बापू
जिनके दिल में स्पंदन है
बस अपनी चाहतों के लिए,
दिमाग में बसी है
सामानों को खोजने की योजनाएं,
प्रकृति उनकी  नज़र में एक अमर मुर्दा है
उन मांस के बुतों की
संवेदनाएँ हैं मौन।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

May 1, 2010

ताजमहल और पसीना-मज़दूर दिवस पर कविता(tajmahal aur mazdoor-hindi shayari on mazdoor divas diwas or may day)

ताजमहल प्यार का प्रतीक है
या परिश्रम का
यह समझ में न आया।
शहंशाह ने लूटा गरीब का खज़ाना,
कहलाया वह नजराना,
मजदूरों ने अपना खून पसीना बहाकर
संगमरममर के पत्थर सजाये,
फिर अपने हाथ कटवाये,
कहीं कब्र में दफन था मुर्दा
जिसकी हड्डिया भी धूल हो गयी,
उठकार रख दी वह सभी
नये बने महल के कुछ पत्थरों के नीचे
उसे साम्राज्ञी कहने की इतिहास से भूल हो गयी,
पहले पसीना बहाकर
फिर खून के आंसु रोने वाले
मजदूरों का नाम कोई कागज़ दर्ज नहीं कर पाया।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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