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Dec 12, 2013

लोकतंत्र के गीत-हिन्दी व्यंग्य कविता(loktantra ke geet-hindi vyangya kavita or satire poem)

लोकतंत्र में ईमानदार होने से ज्यादा
दिखना जरूरी है,
वादे करते जाओ,
दावे जताते जाओ,
भले ही यकीन से उनकी दूरी हो।
कहें दीपक बापू
सत्ता का रास्ता चुनाव से जाता है,
लोगों को शब्दों के जाल में फंसना  भाता है,
चल रहा है देश भगवान भरोसे,
इंसानों को कोई क्यों कोसे,
दिल में भले ही कुर्सी के मचलता हो,
दिमाग में अपना घर भरने का विचार पलता हो,
सादगी दिखाओ ऐसी
जिसमें चालाकी भरी पूरी हो।
गरीब का भला न कर पाओ,
पर नित उसके गीत गाओ,
चाहे जुबान की जो मजबूरी हो।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Oct 21, 2013

ज्ञान से कीमती बड़ा खजाना कहां मिलेगा-हिन्दी व्यंग्य लेख(gyan se kimti bada khazana kahan milega-hindi vyangya lekh)



                        एक संत ने एक सपना देखा कि एक पुराने महल में पंद्रह फुट नीचे  एक हजार टन सोना-जो एक एक स्वर्गीय राजा का है जिसे अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था-दबा हुआ है।  उसने अपनी बात जैसे तैसे भारतीय पुरातत्व विभाग तक पहुंचायी।  पुरातत्व विभाग ने अपनी सांस्कृतिक खोज के तहत एक अभियान प्रारंभ किया।  पुरातत्वविद् मानते हैं कि उन्हें सोना नहीं मिलेगा। मिलेगा तो इतने बड़े पैमाने पर नहीं होगा।  अलबत्ता कोई प्राचीन खोज करने का लक्ष्य पूरा हो सकता है, यही सोचकर पुरातत्व विभाग का एक दल वहां खुदाई कर रहा है।
                        यही एक सामान्य कहानी अपने समझ में आयी पर सोना शब्द ही ऐसा है कि अच्छे खासे आदमी को बावला कर दे। सोने का खजाना ढूंढा जा रहा है, इस खबर ने प्रचार माध्यमों को अपने विज्ञापन प्रसारण के बीच सनसनीखेज सामग्री प्रसारण का वह  अवसर प्रदान किया है जिसकी तलाश उनको रहती है।  भारत में लोगों वेसे काम अधिक होने का बहाना करते हैं पर ऐसा कोई आदमी नहीं है जो टीवी पर खबरें देखने में वक्त खराब करते हुए  इस खबर में दिलचस्पी न ले रहा हो। व्यवसायिक निजी चैनलों ने भारतीय जनमानस में इस कदर अपनी पैठ बना ली है कि इसके माध्यम से कोई भी विषय सहजता से भारत के आम आदमी के लिये ज्ञेय बनाया जा सकता है।  इस पर खजाना वह भी सोने का, अनेक लोगों ने दांतों तले उंगली दबा रखी है। टीवी चैनलों ने लंबी चौड़ी बहसें चला रखी हैं।  सबसे बड़ी बात यह कि संत ने सपना देखा है तो तय बात है कि बात धर्म से जुड़नी है और कुछ लोगों की आस्थायें इससे विचलित भी होनी है।  सोना निकला तो संत की वाह वाह नहीं हुई तो, यह बात अनेक धर्मभीरुओं को डरा रही है कि इससे धर्म बदनाम होगा।
                        कहा जाता है कि संत त्यागी हैं। यकीनन होंगे। मुश्किल यह है कि वह स्वयं कोई वार्तालाप नहीं करते और उनका शिष्य ही सभी के सामने दावे प्रस्तुत करने के साथ ही विरोध का प्रतिकार भी कर रहा है। इस पर एक टीवी पर चल रही बहस में एक अध्यात्मिक रुचि वाली संतवेशधारी महिला अत्यंत चिंतित दिखाई दीं। उन्हें लग रहा था कि यह एक अध्यात्मिक विषय नहीं है और इससे देश के भक्तों पर धर्म को लेकर ढेर सारा भ्रम पैदा होगा।
                        एक योग तथा ज्ञान साधक के रूप में कम से कम हमें तो इससे कोई खतरा नहीं लगता।  सच बात तो यह है कि अगर आप किसी को निष्काम कर्म का उपदेश दें तो वह नहीं समझेगा पर आप अगर किसी को बिना या कम परिश्रम से अधिक धन पाने का मार्ग बताओ तो वह गौर से सुनेगा।  हमारे देश में अनेक लोग ऐसे हैं जिनके मन में यह विचार बचपन में पैदा होता है कि धर्म के सहारे समाज में सम्मान पाया जाये।  वह कुछ समय तक भारतीय ज्ञान ग्रंथों का पठन पाठन कर अपनी यात्रा पर निकल पड़ते हैं। थोड़े समय में उनको पता लग जाता है कि इससे बात बनेगी नहीं तब वह सांसरिक विषयों में भक्तों का मार्ग दर्शन करने लगते है। कुछ चमत्कार वगैरह कर शिष्यों को संग्रह करना शुरु करते हैं तो फिर उनका यह क्रम थमता नहीं।  अध्यात्मिक ज्ञान तो उनके लिये भूली भटकी बात हो जाती है।  लोग भी उसी संत के गुण गाते हैं जो सांसरिक विषयों में संकट पर उनकी सहायता करते हैं।  यहां हम एक अध्यात्मिक चिंतक के रूप में बता दें कि ऐसे संतों के प्रति हमारे मन में कोई दुर्भाव नहीं है। आखिर इस विश्व में आर्त और अर्थाथी भाव के भक्तों को संभालने वाला भी तो कोई चाहिये न! जिज्ञासुओं को कोई एक गुरु समझा नहीं सकता और ज्ञानियों के लिये श्रीमद्भागवत गीता से बड़ा कोई गुरु होता नहीं। आर्ती और अर्थार्थी भक्तों की संख्या इस संसार में सर्वाधिक होती है। केवल भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व में धर्म के ठेकेदारों का यही लक्ष्य होते है। केवल भारतीय धर्म हीं नहीं बल्कि विदेशों में पनपे धर्म भी इन ठेकेदारों के चमत्कारों से समर्थन पाते हैं। जब अंधविश्वास की बात करें तो भारत ही नहीं पूरे विश्व में ऐसी स्थिति है।  जिन्हें यकीन न हो वह हॉलीवुड की फिल्में देख लें। जिन्होंने भूतों और अंतरिक्ष प्राणियों पर ढेर सारी फिल्में बनायी हैं। दुनियां के बर्बाद होने के अनेक संकट उसमें दिखाये जाते हैं जिनसे नायक बचा लेता है। ऐसे संकट कभी प्रत्यक्ष में कभी आते दिखते नहीं।
                        हम संतों पर कोई आक्षेप नहीं करते पर सच बात यह है कि जब वह सांसरिक विषय में लिप्त होते हैं तो उनका कुछ पाने का स्वार्थ न भी हो पर मुफ्त के प्रचार का शिकार होने का आरोप तो उन पर लगता ही है। दूसरी बात यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान साधक स्पष्टतः उनकी छवि को संदेह की नजरों से देखने लगते है।  विदेशी लोग भारत के बारे में कह करते थे  कि यहां हर डाल पर सोने की चिड़िया रहती है।  जब हम मार्ग में गेेंहूं के खेत लहलहाते देखते हैं तो लगता है कि यहां खड़ी फसलें देखकर ही उन्होंने ऐसा कहा होगा।  हो सकता है यह हमारा पूर्वाग्रह हो क्योंकि हमें गेंहूं की रोटी ही ज्यादा पसंद है।  उससे भूख शांत होती है। दूसरी बात यह भी है कि सेोने से कोई अधिक लगाव नहीं रहा।  गेंहूं की रोटी लंबे समय तक पेट में रहती है और दिल में संतोष होता है। संतोषी आदमी को सोना नहीं सुहाता।  मुश्किल यह है कि सोना प्रत्यक्ष पेट नहीं भर पाता।
                        कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने। भारत में सोने की कोई खदान हो इसकी जानकारी हमें नहीं है।  सोना दक्षिण अफ्रीका में पैदा होता है।  तय बात है कि सदियों से यह विदेश से आयातित होता रहा है।  सोना यहां से दूर रहा है इसलिये भारत के लोग उसके दीवाने रहे हैं।  जिस गेंहूं से पेट भरता है वह उनके लिये तुच्छ है।  एक हजार टन सोना कभी किसी राजा के पास रहा हो इस पर यकीन करना भी कठिन है। हीरे जवाहरात की बात समझ में आती है क्योंकि उनके उद्गम स्थल भारत में हैं।  अनेक प्राचीन ग्रंथों में स्वर्णमय हीरे जवाहरात जड़े मुकुटों तथा सिंहासन  की बात आती है पर उनके सोने की परत चढ़ी रही होती होगी या रंग ऐसा रहा होगा कि सोना लगे।  असली सोना यहां कभी इतना किसी व्यक्ति विशेष के पास रहा होगा यह यकीन करना कठिन है।
                        भारत में लोगों के अंदर संग्रह की प्रवृत्ति जबरदस्त है।  कुछ समझदार लोग कहते हैं कि अगर सोने का आभूषण तीन बार बनवाने के लिये किसी एक आदमी के पास ले जायें तो समझ लो पूरा सोना ही उसका हो गयां।  इसके बावजूद लोग हैं कि मानते नहीं। अनेक ढोंगी तांत्रिक तो केवल गढ़ा खजाना बताने के नाम पर धंधा कर रहे हैं। इतना ही नहीं अनेक ठग भी सोना दुगंना करने के नाम पर पूरे गहने ही महिलाओं के हाथ से छुड़ा लेते है।  बहरहाल खुदाई पूरी होने पर सोना मिलेगा या नहीं यह तो भविष्य ही बतायेगा पर टीवी चैनलों में विज्ञापन का समय समाचार तथा बहस के बीच खूब पास हो रहा है।
                        आखिर में हमारा हलकट सवाल-अरे, कोई हमें बतायेगा कि श्रीमद्भागवत गीता के बहुमूल्य ज्ञान के खजाने से अधिक बड़ा खजाना कहां मिलेगा।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Sep 24, 2013

नैरोबी के मॉल पर हमलाःफिल्म और धारावाहिकों के लिये सामग्री बन ही गयी-हिन्दी लेख(ataick on nerobi in mol:Narobi ke mol par hamla:film aur tv episond ke liye samagri ban he gayee-hindi lekh or article)



                        कीनिया के नैरोबी में मॉल पर आतंकवाद हमले के जो समाचार प्रचार माध्यमों में देखने, सुनने और पढ़ने को मिले उससे तो यही लगता है कि आने वाले दिनों में इस पर अनेक फिल्में बन जायेंगी और जमकर व्यवसाय करेंगी।  इसका मुख्य कारण उसकी खलपात्र एक खूबसूरत महिला के होने का जमकर प्रचार होना  है जो ब्रिटेन की गौरवर्ण वर्ग से संबंध रखती थी।  विश्व में आतंकवाद एक पेशा बन गया है।  हम जैसे लोगों का इस बात पर यकीन करना अत्यंत कठिन काम है कि बिना लोभ और लालच के कोई इसमें शामिल हो सकता है। अगर धर्म के लिये युद्ध करते हुए मर जाने पर स्वर्ग मिलने की चाहत है तो वह भी एक भ्रम है पर अंततः वह एक लालच ही है। बहरहाल हम इस मसले पर सामान्य से कुछ हटकर सोच रहे हैं। हमारी सोच का आधार ऐसे मसलों पर होने वाली बहसें तथा अन्य ऐसे समाचार हैं जो कुछ अलग सोचने को विवश करते हैं।
                        पहली बात तो यह है कि कीनिया के इस मॉल पर हमला होते ही इजरायल के कमांडो वहां कार्यवाही के लिये पहुंच गये। उन्होंने बाकी बंधकों को हानि पहुंचे बिना उनको मुक्त करवाने के साथ ही  अंदर मौजूद आतंकवादियों को परास्त किया।  अभी तक ऐसी घटनाओं में कभी इजरायल के ऐसे मामलों में शामिल होने की बात सामने नहीं आयी थी।  मुंबई पर हमले के समय इजरायल से अपने कमांडो भेजने का प्रस्ताव भारत को दिया था पर उसे नहीं माना गया।  उस प्रसंग में यहूदियों को भी लक्ष्य किया गया था और इजरायल अपने धर्म का दुनियां भर में खैरख्वाह होने का दंभ भरता है इसलिये उसने ऐसा प्रस्ताव दिया होगा।  अब इजरायल ने अपनी भड़ास निकाली।  क्या इजरायल किसी ऐसे अवसर के इंतजार में था या फिर उसकी खुफिया एजेंसियों ने कहीं न कहीं अपने सूत्रों से इस तरह की संभावित घटना का अनुमान कर लिया था पर बताया नहीं क्योंकि वह चाहते थे कि उनके देश को अपना पराक्रम दिखाने का अवसर मिले।  वैसे अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि विश्व भर में फैले आतंकवादियों को कहीं न कहीं खुफिया एजेंसियों का संरक्षण मिलता हैै। अफगानिस्तान में अमेरिका की खुफिया एजेंसी ने तो बकायदा रूस के खिलाफ ऐसे ही आतंकवाद की मुहिम चलायी थी।  इजरायल की खुफिया एजेंसी का नाम कम आता है  पर कहीं न कहीं वह भी अमेरिका के साथ तालमेल करती रही है।
                        एक तरह से एक धर्म विशेष के आतंकवादी दावा तो यह करते हैं कि वह अमेरिका तथा इजरायल के विरुद्ध हैं पर हम देखते हैं कि उनकी वारदातों के बाद इन दोनों देशों को अपना पराक्रम दिखाने का अवसर मिल ही जाता है। ऐसे में अनेक प्रकार के संदेह तो होते ही हैं खासतौर से तब जब  इतिहास इन्हीं आतंकवादियों के साथ उनके रिश्ते होने की बात को प्रमाणित करता है।  इन दोनों देशों के पास नित नये प्रकार के हथियार बनते हैं जिनकी प्रयोगशाला ऐसी ही आतंकवादी घटनायें साबित होती हैं। संभव है इस प्रकार के आतंकवादियों में कुछ  इनकी खुफिया एजेंसियों से जुड़े हों जो समय आने पर इस तरह के छोटे छोटे युद्धों की पटकथा लिखते हों।  दूसरी बात यह है कि पूरे विश्व में काले और सफेद धंधे वालों का समन्वय बन गया है।  सफेद धंधे वाले भी अपनी अपनी शक्ति बढ़ाने के लिये काले धंधे वालों से संबंध बना ही लेते हैं।  फिल्म बनाने का धंधा आजकल चोखा है।  फिल्म न बने तो धारावाहिक भी बन ही जाते हैं। ऐसे में एक खूबसूरत सफेद विधवा के आतंकवादी बनने पर ढेर सारी कहानियां बन सकती है। यह अलग बात है कि अब उसे प्रमाणित करना कठिन काम है। यह अलग बात है कि फिल्म और टीवी धारावाहिकों के लिये एक कीमती मसाला तो मिल ही गया है जिसका लाभ अंततः इन धनपतियों को ही होगा।
            जिस महिला का जिक्र हो रहा है वह ब्रिटेन की है।  उसका पति किसी आतंकवादी घटना को अंजाम देते ही मारा गया था।  उसे दो बच्चे भी हैं।  पति के मरने पर वह स्वतः भी आतंकवादी बनी बल्कि वह चाहती थी कि उसके बच्चे भी आतंकवादी बने।  उसकी सामग्री इंटरनेट पर है जो उसे आतंकवादी प्रमाणित करनी पड़ती है।  कहा गया कि इस हमले का संचालन वही महिला कर रही थी।  अब वह मारी गयी हैं।  मॉल के हमले के बाद उसमें मरे लोगों पर चर्चा कम उस सफेद विधवा की चर्चा अधिक हो रही थी।  एक अलग से कहानी चल रही थी।  प्रश्न यह है कि उस महिला को किसने देखा? क्या वही थी या किसी अन्य महिला के वहां होने पर ऐसा प्रचार किया गया? क्या इंटरनेट पर उसकी सामग्री को प्रमाणिम मान लिया जाये या फिर माना जाये कि उसे भविष्य की खलपात्रा के रूप में स्थापित करने के लिये सृजित किया गया? नैरोबी के मॉल में जब लोग मर रहे थे तब क्या मीडिया में बैठे कुछ बुद्धिमान लोग हॉलीवुड की फिल्म के लिये कोई सामग्री जुटा रहे थे? इस तरह संभावनायें इसलिये लगती हैं क्योंकि हॉलीवुड सत्य घटनाओं पर फिल्म बनाकर जमकर पैसा कमाता है।  वैसे भी पूरे विश्व में अमेरिका की पहचान  आधुनिक हथियारों और फिल्म के निर्माण के कारण ही है। दूसरे यह भी कि काले और सफेद धंधे वालों को कहीं न कहीं से पैसा चाहिये।  विश्व में आतंकवाद बढ़ा है तो हथियारों की बिक्री तथा उस पर बनी फिल्मों के व्यवसाय में वृद्धि हुई है। हम अपने देश में देख लें। मान लीजिये यहां बिल्कुल आतंकवाद न होता तो या कोई ऐसी फिल्में बनाता।  बनाता तो सामान्य एक्शन फिल्म होकर रह जाती।
                        शक का दूसरा कारण यह भी है कि प्रचार माध्यम इन खूंखार  आतंकवादियों को आकर्षण खलपात्र के रूप में प्रचारित करते हैं।  ऐसे प्रचारित करते हैं जैसे कि वह कोई आसमान से उतरे जीव हों।  हम जिस महिला का जिक्र कर रहे हैं वह मारी गयी। तय बात है उस पर अब कोई मुकदमा तो चलेगा नहंी कि यह साबित किया जा सके कि वही थी। प्रचार माध्यम जो कह रहे हैं उस पर इसलिये कोई प्रश्न उठाना संभव नहीं है क्योंकि उसकी प्रमाणिकता के लिये कोई सूत्र उपलब्ध नहीं है। मॉल का प्रसंग तीन दिन चला और उस पर कोई तीन घंटे की रोमांचक फिल्म बनाना कोई बड़ी बात नहीं है।
                        अगर हम देखें तो इस घटना में जो आतंकवादी मरे वह भी कोई संपन्न नहीं थे और जिन निर्दोष लोगों को मारा भी कोई बड़े लोग नहीं थे।  अगर होते तो क्या वह इस मॉल में खरीददारी करने जाते, घर पर ही सामान नहीं मंगवा लेते। इस तरह आम आदमी का आम आदमी के विरुद्ध  यह ऐसा युद्ध था जो अंततः धनपतियों को लाभ देगा।  इस घटना के कारण सुरक्षा के वह उपकरण अवश्य दूसरे देश खरीदेंगे जो इजरायल या अमेरिका बनाते हैं।  हम अपने ही देश में देखेंगे अनेक जगह मॉल, मंदिर और पुरात्तव स्थानों पर पहले अंदर जाने के लिये मेटल डिक्टेटर   लगे फिर जब आतंकवाद के साथ अन्य अपराध बढ़े तो  सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर  सीसीटीवी कैमरे लग गये हैं।  अगर आतंकवाद न आता तो क्या सब बिकते। भारत बड़ा देश है और यह किसी एक वस्तु का जब प्रचलन बढ़ता है तो वह खरबों रुपये का व्यवसाय करती है। यह कारण है कि कुछ बुद्धिमान लोग आतंकवादियों को मिलने वाले धन का पता लगाने की मांग करते हैं।  इस तरह के संदेहों को जन्म अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल के साथ ही उन देशों ने भी दिया है जो आतंकवादियों को अपने यहां पनाह देते हैं या फिर मानवाधिकारेां के नाम उनको संरक्षण प्रदान करते हैं।  अगर आतंकवाद पनपने के बाद हथियारों की बिक्री और उन पर बनी फिल्में खरबों रुपये का व्यापार नहीं करती तो यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण लग सकता था पर कछ बुद्धिमान लोग इसे सत्य वचन कहकर प्रचारित करते हैं।   बहरहाल यह हमारे अनुमान ही है सच क्या है कोई नहीं जानता?  जो जानते हैं वह बतायेंगे नहीं और जो जानते नहीं वह ऐसे अनुमान करते रहेंगे। यह सिलसिला चलता रहेगा।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Sep 16, 2013

रोने पर जश्न-हिन्दी व्यंग्य कविता (rone par jashna-hindi vyangya kavita, a hindi satire poem)



किसी की कामयाबी पर
कौन जश्न मनाता है,
एक दूसरे की तबाही पर ही
सभी को मजा लेना आता है।
कहें दीपक बापू
दिल बहलाने के लिये
चाहिये लोगों को कोई न कोई बहाना,
चलते को गिराकर
अपनी ताकत का अहसास कराते हैं सभी
वक्त खराब करना लगता है
किसी गिरे इंसान को ऊपर उठाना,
बिक जाती है मनोरंजन के बाज़ार में
इसलिये सरलता से सनसनी,
बनते घर की कोई खबर नहीं,
टूटते पर सभी की भोहें तनी,
कुदरत ने इंसान को दिये
हंसने के कई तरीके
मगर उसे दूसरों के रोने पर ही
जश्न मनाना आता है।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Sep 9, 2013

श्रीगणेश जी के स्मरण से आनंद मिलता है-श्रीगणेश चतुर्थी पर विशेष हिन्दी लेख(shri ganesh ji ke smaran se hi anana milta hai-shri ganesh chaturthi par vishesh hindi lekh,special hindi ariticle on ganesh chauth)



       आज पूरे देश में  श्रीगणेश चतुर्थी का पर्व उत्साह से मनाया जा रहा है। साकार रूप में  श्रीगणेश भगवान का चेहरा हाथी और सवारी वाहन चूहा दिखाया जाता है।  सकाम भक्त उनके इसी रूप पर आकर्षक होकर उनकी आराधना करते हैं। आमतौर से हिन्दू धर्म समाज के बारे में कहा जाता है कि वह संगठित नहीं है और भगवान के किसी एक स्वरूप के न होने के कारण उसमें अन्य धर्मों की तरह एकता नहीं हो पाती।  अनेक लोग भारतीय समाज के ढेर सारे भगवान होने के विषय की मजाक बनाते हैं। इनमें भी भगवान श्री हनुमान तथा गणेश जी के स्वरूप को अनेक लोग मजाक का विषय मानते हैं।  ऐसे अज्ञानी लोगों से बहस करना निरर्थक है।  दरअसल ऐसे बहसकर्ता अपने जीवन से कभी प्रसन्नता का रस ग्रहण नहीं कर पाते इसलिये दूसरों के सामने विषवमन करते हैं। यह भी देखा गया है कि गैर हिन्दू विचारधारा  के कुछ  लोगों में रूढ़ता का भाव इस तरह होता है कि उन्हें यह समझाना कठिन है कि हिन्दू अध्यात्मिक दर्शन निरंकार परमात्मा का उपासक है पर सुविधा के लिये उसने उनके विभिन्न मूर्तिमान स्वरूपों का सृजन किया है।  साकार से निराकार की तरफ जाने की कला हिन्दू बहुत अच्छी तरह जानते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि देह की इंद्रियां-आंख, नाक, कान, तथा मन बाह्य विषयों की तरफ सहजता से आकर्षित रहता है।  इसलिये ही बाह्य विषयों में दृढ़ अध्यात्मिक भाव स्थापित किया जाये तो बाद में निष्काम भक्ति का भाव सहजता से अंतर्मन में लाया जा सकता है।
                        भगवान के मूर्तिमान स्वरूपों से अमूर्त रूप की आराधना करने में सुविधा होती है।  दूसरे धर्मों के लोगों के बारे में क्या कहें कुद स्वधर्मी बंधु भी अपने भगवान के विभिन्न स्वरूपों के प्रति रूढ़ता का भाव दिखाते हुए कहते हैं कि हम तो अमुक भगवान के भक्त हैं अमुक के नहीं? इसके बावजूद गणेश जी के रूप के सभी उपासक होते हैं क्योंकि उनके नाम लिये बिना कोई भी शुभ काम प्रारंभ नहीं होता।
                        आमतौर से भगवान श्रीगणेश जी का स्मरण मातृपितृ भक्त के रूप में किया जाता है। बहुत कम लोग उस महाभारत की याद करते हैं जिसके गर्भ से श्रीमद्भागवत गीता जैसे अद्भुंत ग्रंथ  का जन्म हुआ, इसी महाभारत के रचयिता तो महर्षि वेदव्यास हैं पर भगवान श्रीगणेश जी ने हार्दिक भाव के साथ  अपनी कलम से उसे सजाया है।  आम भारतीय के लिये श्रीमद्भागवत गीता एक पवित्र ग्रंथ है पर इसके विषय में  कुछ ज्ञानी और साधक मानते हैं कि यह विश्व का अकेला एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें तत्व ज्ञान के साथ सांसरिक विषयों का विज्ञान भी विद्यमान है।  हाथी जैसे विशाल धड़ को धारण तथा चूहे की सवारी करने वाले भगवान श्रीगणेश जी ने श्रीमद्भागवत गीता की  रचना में अपना योगदान देकर भारतीय तत्वज्ञान को एक ऐसा आधारभूत ढांचा प्रदान किया जिससे भारत विश्व का अध्यात्मिक गुरु कहलाता है।  यही कारण है कि भगवान श्रीगणेश जी के उपासक जहां सकाम भक्त हैं तो निष्काम ज्ञानी और और साधक भी उनका स्मरण करते हुए उनके स्वरूप का आनंद उठाते हैं।
यहां प्रस्तुत है श्रीगणपत्यथर्वशीर्षम् के श्लोक आधार पर उनके स्मरण के लिये मंत्र।

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 ॐ (ओम) नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि। त्वमेव केवलं कर्तासि। त्वमेव धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि। त्वमेव सर्व खल्विदं ब्रह्मासि। त्वं साक्षादात्मासि नित्यम्

                        हिन्दी में भावार्थ-गणपति जी आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्यक्ष तत्व हो, केवल आप ही कर्ता, धारणकर्ता और संहारकर्ता हो। आप ही विश्वरूप ब्रह्म हो और आप ही साक्षात् नित्य आत्मा हो।

ऋतं वच्मिं। सत्यं  वच्मि।।

                        हिन्दी में भावार्थ-यथार्थ कहता हूं। सत्य कहता हूं।
                        हम जैसे योग तथा ज्ञान साधकों के लिये श्रीगणेश भगवान हृदय में धारण करने योग्य विषय हैं।  उन्हें कोटि कोटि नमन करते हैं।  सच बात तो यह है कि इस तरह उनके आकर्षक स्वरूप का स्मरण करने से मन में उल्लास तथा आत्मविश्वास का भाव पैदा होता है उसे शब्दों में व्यक्त करना एक दुष्कर कार्य है।
                        इस गणेशचतुर्थी के पावन पर्व पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों, पाठकों को हमारी तरफ से बधाई।  भगवान श्रीगणेश जी उनके हृदय में स्थापित होकर उनका जीवन मंगलमय करें। वही हर मनुष्य के  शुभ कमों के प्रारंभ में ही उत्तम फल का सृजन करते हैं जो समय आने पर उसे मिलता है। वही दुष्टों के  दंड का भी निर्धारण करते हैं जिसकी कल्पना अपना दुष्कृत्य करते हुए अपराधी सोच भी नहंी सकता। इसलिये मनुष्य को श्रीगणेश जी पर विश्वास करते हुए तनाव रहित होने का प्रयास करना चाहिये।
 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Aug 29, 2013

रुपये के अंतर्राष्ट्रीय मूल्य से जुड़ा राष्ट्र के सम्मान का प्रश्न-हिन्दी लेख(rupaye ke antarrashtriya mulya se juda rashtra ke samman ka prashna-hindi lekh or article)



                        जिस तरह रुपये की अंतर्राष्ट्रीय कीमत तेजी से गिरी है उससे देश की अर्थव्यवस्था को लेकर अनेक तरह की आंशकायें जन्म लेने लगी हैं।  फिलहाल इस बात की संभावना नहीं लगती कि रुपया का मूल्य आत्मसम्मान योग्य हो पायेगा। इन आशंकाओं के बीच एक प्रश्न भी उठता है कि आखिर रुपये का आत्मसम्मान योग्य अंतर्राष्ट्रीय मूल्य कितना रहना चाहिये? जहां तक हमारी याद्दाश्त है पंद्रह से बीस वर्ष पूर्व तक एक डॉलर का मूल्य  28 रुपया हुआ करता था।  अब वह 68 रुपये हो गया है।  इस पर हमारे देश की सरकारों का बजट भी घाटे वाला हुआ करता है।  घाटे का बजट होने का मतलब यह है कि सरकार उतनी राशि के नये नोट जारी कर ही  खर्च की पूर्ति करती है।  इसकी कोई सीमा तय नहीं है कि पता नहीं पर नये नोटों से मुद्रास्फीति बढ़ती है।
                        हमारे देश के आर्थिक रणनीतिकार इस घाटे के बजट को विकास के लिये आवश्यक कदम मानते हैं।  हम उनकी बात मान लेते हैं पर ऐसा लगता है कि इस सुविधा को अब एक आवश्यक मजबूरी मान लिया गया है।  अभी तक हमने धन के असमान वितरण को सुना था पर अब वह कदम कदम पर दिखने लगा है।  हजार और पांच सौ नोटों के प्रचलन ने छोटे मूल्य के नोटों के प्रचलन को कम कर दिया है पर फिर भी उनकी आवश्यकता अनुभव होती है।  पहले सौ रुपये का नोट तुड़वाकर उसे दस तथा पांच में सहजता से बदला जा सकता था पर अब पांच सौ नोट पास में है तो साइकिल या गाड़ी में हवा भरवाने के लिये छोटे नोट पहले से ही छांटकर रखने पड़ते हैं।  बाज़ार में खाने पीने का सामान महंगा है, सब्जियां महंगी हैं, दूध भी सस्ता नहीं है पर सीमित मात्रा में क्रय करना हो तो अनेक जगह पांच सौ का नोट बड़ा दिखने लग  जाता है। हजार का नोट किसी को दो तो वह हाथ से पकड़ कर देखने लगता है कि नकली तो नहीं है।  अगर पांच सौ या हजार का नोट पुराना हो तो लेने वाला आदमी संकोच भी करता है।  दस से लेकर सौ तक नोट कोई भी सहजता से लेता है पर उसके आगे का नोट लेने में आदमी सतर्कता बरतता है।
                        नकली नोटों ने असली मुद्रा का सम्मान कम कर दिया है। स्थिति यह है कि बैंकों के एटीएम से भी नकली नोट निकलने की शिकायतें आने लगी हैं। ऐसे में अगर किसी को सौ का नोट हाथ में दो और वह उसे गौर से देखे तो उसके सामने यह दावा करना निरर्थक होता है कि वह एटीएम से निकाला गया है।  लोग कह देते हैं कि एटीएम से नकली नोट निकलते हैं।
                        देश के हालात ऐसे हैं कि समझ में नहीं आता कि महंगाई इतनी तेजी से कब तक बढ़ेगी!  विशेषज्ञ बताते हैं कि विकसित देशों की मुद्रा सौ तक ही होती है।  अमेरिका डॉलर या ब्रिटेन के पौंड में सौ से ऊपर का नोट नहीं छापा जाता है।  भारत में अनेक लोग इसी के आधार पर पांच सौ या नोट छापने का विरोध करते हैं। हम अपनी कोई राय नहीं पा रहे पर इतना तय है कि पांच सौ और हजार के नोटों के प्रचलन के बाद महंगाई ने गुणात्मक रूप से अपने कदम बढ़ाये हैं।  नये नोट प्रचलन में आते ही गायब हो जाते हैं और पुराने बाहर आकर अपना रूप दिखाते हैं।  नये नोटों के आने मुद्रास्फीति के कारण महंगाई बढ़ती है और ऐसे में नोट ज्यादा देने पड़ते हैं।  उनमें पुराने नोटों होने पर  लेने में आनाकानी होती है और यहीं से मुद्रा के सम्मान का प्रश्न उठना प्रारंभ होता है। एकदम नये नोट चल जायें और पुरानों को चलाने में जद्दाजेहद करनी पड़े तक अपनी देश की मुद्रा को लेकर पीड़ा तो होती ही है।
                        कहा जाता है कि देश की आजादी के समय डॉलर का मूल्य एक रुपये के बराबर था। इस हिसाब से तो एक रुपये का यही मूल्य विश्व बिरादरी में हमारा आत्म सम्मान लौटा सकता है।  यह एक कल्पना हो सकती है पर असंभव नहीं है।  अमेरिका के हथियारों के अलावा कोई दूसरी चीज भारत में प्रसिद्ध नहीं है। इस मद में इतना खर्चा नहीं होता कि डॉलर इतना दमदार बना रहे। अलबत्ता अमेरिका जाने वाले भारतीयों नोट के बदले डॉलर खर्च करने के लिये  लगते हैं जिससे शायद इस तरह का असंतुलन पैदा होता हो तो कह नहीं सकते।  इसका कोई तोड़ आर्थिक रणनीतिकारों को ढूंढना चाहिये।  रुपये की गिरती कीमत देश की विश्व पटल पर ही राष्ट्रीय स्तर पर खतरों का संकेत दे रही है।  अमेरिका दुनियां का सबसे शक्तिशाली देश हथियारों की वजह से नहीं डॉलर के सम्मान के कारण माना जाता है। हमारा रुपया अगर सम्मान खोयेगा तो फिर किसी अन्य तरह से सम्मान पाने की आशा करना व्यर्थ होगा।  अध्यात्मिक विषय के कारण हमारी श्रेष्ठता विश्व में मानी जाती है पर जब सम्मान की बात आये तो विश्व का हर समाज केवल धनिकों को ही मानता है। फिर अध्यात्म वाले सम्मान या अपमान की सोचते ही कब हैं? जब हम विश्व में सम्मान पाने की बात करते हैं तो वह सांसरिक विषयों का ही भाग है और उसमें मुद्रा का सम्मान ही देश का सम्मान होता है। जब देश की मुद्रा का मूल्य बढ़ेगा तो विश्व में हमारे समाज का सम्मान निश्चित रूप से बढ़ेगा।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Jul 15, 2013

बच्चों का शराब पीना-लघु हिन्दी व्यंग्य (bachcho ka sharab peena-hindi vyangya or satire on sex and smoke parti chiled and student's)



          करीब सौ  बच्चे एक मॉल में शराब की पार्टी में शामिल होने पर पकड़े गये।  यह पार्टी फेसबुक के संपर्कों का उपयोग कर आयोजित की गयी।  पुलिस को पता चला कि अवैध ढंग से यह आयोजन हो रहा है तो वह इन बच्चों का सुधारने के लिये पहुंची।  मॉल के जिस बार में शराब पार्टी थी उसके स्वामी और प्रबंधकों को पुलिस ने पकड़ लिया पर बच्चों के विरुद्ध मामला न दर्ज कर अभिभावकों को  बुलाकर उन्हें सौंपा। हमारे टीवी चैनलों के लिये यह बाल सामग्री अत्यंत उपयोगी थी और तय बात है कि उन्होंने समाज के स्थिति पर किराये के आंसु भी बहाये। चिंता जताई।
            पुलिस ने बच्चों पर प्रकरण दर्ज न कर उनके अभिभावकों को सौंपा यह अच्छी बात है।  तर्क यह दिया कि सभी बालक बालिकायें पंद्रह  से बीस वर्ष तक की आयु वर्ग से संबंधित हैं इसलिये उनके उज्जवल भविष्य की संभावनायें खत्म नहीं की जानी है।  यह तर्क भी ठीक है। प्रचार माध्यमो में-टीवी चैनल और अखबार-कुछ चर्चा सामाजिक अंतर्जालीय संपर्क पर हुई तो कुछ समाज में व्याप्त व्यसनों की बढ़ती प्रवृत्ति  पर भी चिंता जताई गयीं। हिन्दुस्तान बिगड़ रहा है जैसे नारे भी पढ़ने और सुनने  को मिले।  हमने इस घटना के दृश्य टीवी चैनलों पर देखे।  इन दृश्यों में पकड़े गये बच्चों के अभिभावकों में कुछ अपने हाथों से अपनी संतानों पर बरस रहे थे।  इस दृश्य को देखकर हमारे अंदर यह विचार आया कि आखिर यह अभिभावक अपने बच्चों को पीट क्यों रहे हैं? इसकी कुछ वजहें हमारी समझ में आयीं।
            1-अभिभावकों को इस बात का अफसोस था कि बच्चे शराब पीते पकड़े गये न कि इसका कि उनके बच्चे शराब पीते हैं।
            2-पुलिस के हत्थे न चढ़ें इसलिये अपने बच्चों पर हाथ बरसाकर उन्हें बचा रहे थे।
             3-यह बताने के लिये बच्चे बिगड़े जरूर है पर हम तो ठीक प्रकार के अभिभावक हैं।
            यह तीनों बातें कम से कम हमें तो जमती हैं। घर के बच्चे रात को घर से गायब हों और माता पिता उनकी उपस्थिति के स्थान की जानकारी नहीं रखें तो उनको दोषमुक्त नहीं किया जा सकता।  दरअसल हमारे समाज में आज कमाने की प्रवृत्ति ने लोगों को हर तरफ से अंधा कर दिया है।  अभिभावक स्वयं पैसा कहां से कमा रहे हैं यह वह जानते हैं पर खर्च कैसे हो रहा है इस पर अनेक उनकी दृष्टि नहीं जाती क्योंकि पैसा तो उनके पास बाढ़ की तरह चला आता है। चाणक्य कहते हैं कि अधिक धन हो तो उसे निकालना चाहिये।  हमारे लोग यह नहीं मानते तो पैसा स्वयं ही आगे निकलने लगता है।  जिस तरह बाढ़ का पानी अपने किनारे तोड़ता है उसी तरह पैसा भी अपने ही घर उखाड़ता हैं।  धनलोलुपों का  लक्ष्य एक ही है कि अपने बच्चों को इतना कमा कर दें कि आगे की सात पीढ़ियों तक उनका नाम चलता जाये।  आप अगर किसी से पूछें कि ‘‘आप किसके लिये कमा रहे हैं?’’
           वह फट से जवाब देगा कि ‘‘बच्चों के लिये कमा रहा हूं!’’
            हमारे देश के किसी पुराने दार्शनिक का कहना है कि पुत्र अगर सुयोग्य है तो वह स्वयं कमा लेगा। अगर नालायक है तो सब गंवा देगा, इसलिये उतना ही कमाओ जितना आवश्यक हो। बेकार में अपनी जिंदगी क्यों केवल सासंरिक विषयों में बर्बाद हो।  सच बात तो यह है कि बच्चों का नाम लेना तो  बहाना है। लोग अपनी सामाजिक स्थिति में चार चांद लगाने के लिये कमाते हैं।  कुछ लोग अपनी विलासिता के लिये कमाते हैं पर नाम बच्चों का लेते हैं।
       बहरहाल उन बच्चो को अपनी भाग्य समझना चाहिये कि पुलिस ने उन्हें वह सबक सिखाया है जिसकी जिम्मेदारी उनके माता पिता की थी। पुलिस वालों को तारीफ करना चाहिये कि वह अपना सामाजिक दायित्व समझने लगे हैं।  हमारा दर्शन तो कहता है  कि शिक्षा के दौरान विलासित से दूर रहना चाहिये पर मुश्किल यह है कि आधुनिक शिक्षा प्रबंधक शिक्षा के दौरान ही छात्रों  को संपूर्ण व्यक्तित्व का स्वामी बनाने का दावा करते हुए उनको अपनी संस्थाओं के अंतर्गत होने  पर्यटन और पिकनिक कार्यक्रमों में शामिल होने के लिये बाध्य करते हैं।  शिक्षा के लिये निर्धारित पाठ्यक्रम  से अलग अन्य  विषयों की जानकारी देकर शिक्षा के स्वामी और प्रबंधक अपने अधिक से अधिक कुशल शैक्षणिक व्यवसायी होने का प्रमाण देना चाहते हैं।  ऐसे में अभिभावक भी यह सोचते हैं कि हमें क्या चिंता  पूरी फीस दे रहे हैं हमारे बच्चे को तो विद्यालय और महाविद्यालय के शैक्षणिक ठेकेदार अपने आप ही एक आदर्श व्यक्तित्व का स्वामी बना देंगे।  ऐसे में  मद्यपान और ध्रुमपान से संयुक्त ढेर सारे आयोजन होने ही जिसमें नवयुवक शामिल हों।  सौ बच्चों को पकड़कर पुलिस ने उन्हें एक सबक सिखाया पर उसे जीवन भर कितने बच्चे याद रखेंगे या इस घटना से पूरे देश कितने भविष्य में ऐसा न करने या होने देने की छात्र और अभिभावक कसम खायेंगे कहना कठिन है।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Jun 29, 2013

केदारनाथ की त्रासदी का मानसिक प्रभाव लंबे समय तक रहेगा-हिन्दी संपादकीय (kedarnath ki trasdi ka lambe samay es rahega-hindi editorial natural calamity in uttrakhand,hindi sampadkiya)



         उत्तराखंड में जो प्रकृति ने महाविनाशलीला मचायी उसमें भारी जन हानि का अनुमान शायद ही पहले किसी ने किया हो।  दरअसल हमारे देश में अनेक तीर्थ हैं जिनमें लाखों लोग शामिल होते हैं।  उत्तराखंड में चार धाम-गंगोत्री, यमनोत्री, बद्रीनाथ, और केदारनाथ। भारतीय जनमानस के हृदय में हैं पर बहुत कम लोग यहां जाने को तैयार होते थे।  गंगा और यमुना अत्यंत पवित्र नदियां मानी जाती हैं पर धार्मिक रूप से अकेले इनकी मान्यता नहीं है। नर्मदा और क्षिप्रा भी भगवत् मान्यता वाली मानी जाती हैं।  हरिद्वार की हर की पैड़ी, दक्षिण में तिरुपति बालाजी, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि, इलाहाबाद का संगम, काशी तथा उज्जैन में लोग तीर्थ करने जाते हैं। कश्मीर में अमरनाथ के दर्शन करने वालों की भी कमी नहीं है। 
      वर्तमान समय में जम्मू का वैष्णोदेवी और शिरडी के सांई बाबा के साथ भी अनेक लोग जुड़े हैं हालांकि इनका भारतीय धार्मिक दृष्टि से सामान्य महत्व है।  वैष्णोदेवी पर फिल्म आशा में गायक चंचल के गाये एक गीत माता ने बुलाया हैकी वजह से वहां के मंदिर का नाम चमक उठा तो सांईबाबा पर फिल्म अमर अकबर ऐंथोनी में उनके मंदिर के  एक गाने में उनके चमत्कारों  गुणगान होने के बाद भक्तों की संख्या बढ़ी। आमतौर से सांईबाबा को धर्मनिरपेक्ष छवि का माना जाता है पर वास्तविकता यह है कि उनको हिन्दू भक्तों की ही भक्ति प्राप्त है।  वैष्णोदेवी और सांईबाबा पर जो भक्तों की भीड़ बढ़ी है उसका आधार कोई  प्राचीन मान्यता नहीं वरन् आधुनिक बाजा़र और प्रचार समूहों की प्रेरणा उसका एक कारण है। 
       ऐसे में चारो धामों में इतनी सारी भीड़ होने देखकर अनेक लोगों को आश्चर्य तब हुआ जब हताहतों की संख्या का अनुमान बताया गया।  इन चारों धामों में पहले जो लोग जाते थे उनके परिवार वाले मालायें पहनाकर विदा करते थे।  माना जाता था कि  जीवन के उत्तरार्ध में की जाने वाली इस यात्रा में आदमी वापस लौटा तो ठीक न लौटा तो समझ लोे भगवान के पास चला गया।  महाभारत काल में पांडवों ने भी अपने अंतिम काल में ही हिमालय की यात्रा की थी।  हरिद्वार या ऋषिकेश तक यात्रा करना अनेक लोगों के लिये अध्यात्मिक शांति का उपाय है पर सच यह भी है कि आज भी हरिद्वार जाने की बात किसी से कही जाये तो वह पूछता है कि घर में सब ठीक तो है न! 
       वहां अपने परिवार के सदस्यों की अस्थियां विसर्जित करने के अलावा किसी अन्य उद्देश्य से यात्रा अधिक लोग नहंी करते। अगर कर आते हैं तो मान लेते हैं कि उन्होंने इस तीर्थ पर भले ही किसी भी उद्देश्य से आये पर सभी तीर्थ का पुण्य कमा लिया।
             ऐसे में चारों धामो में प्रकृति ने कहर बरपाया तो उससे हताहत  लोगों की संख्या से अधिक हैरानी हो रही है।  दरअसल बाज़ार के पेशेवर यात्रा प्रबंधकों ने वहां हुए सड़क विकास का लाभ उठाया और हर शहर से अनेक लोगों को चारों धामों पर ले जाने लगे।  सड़क और रेल मार्ग से वह पूरा एक प्रस्ताव तैयार कर लोगों को अपना ग्राहक बनाते हैं।  उत्तराखंड दुर्गम है पर वहां बनी सड़कों से बसें जाने लगी थीं।  अनेक बस दुर्घटनाओं की खबर आती रहती थी।  वहां का रास्ता दुर्गम था, अब भी है और रहेंगा।  अनेक बसें जाती थीं।  सभी नहीं गिरी पर नियमित रूप से ऐसी बसों की दुर्घटनाओं की खबरें आती रहती थी।  जो यात्रा कर घर वापस लौटे उनके लिये रास्ता सुगम बना और जो नहीं लौटे वह भूत बनकर किसी को बता नहीं सकते थे कि उन्होंने दुर्गम रास्ते का अनुकरण किया था।  इस आवाजाही के बावजूद अनेंक लोग चारों धामों की यात्रा को सुगम नहीं  मानते थे।  यह अलग बात है कि पहले जब मार्ग दुर्गम दिखता था तब कम लोग जाते थे। वहां सड़क, बिजली और होटलों के निर्माण का लाभ उठाकर  बाज़ार और प्रचार समूह ने धार्मिकता के साथ ही पर्यटन का लाभ दिलाने का बीड़ा उठाया।  जिससे वहां भीड़ बढ़ गयी।  बहरहाल चारों धामों का ऐसा कोई प्रचार नहीं हुआ था कि सामान्य लोगों को सहज विश्वास हो कि आपदा के समय वहां  लाखों की संख्या में वहां श्रद्धालू  होंगे। जब प्रचार माध्यमों ने इसकी पुष्टि की तब ही सच्चाई सामने आयी।
           जो हुआ सो हुआ। प्रकृति का यह प्रकोप है जिसे यह प्रथ्वी अनेक बार सह चुकी है।  इतना जरूर है कि हम धर्म के कर्मकांडों मे रुचि लेते हैं क्योंकि वह प्रत्यक्ष दिखते हैं पर उस अध्यात्मिक ज्ञान पर दृष्टिपात नहीं करते जो कि जीवन की वास्तविकता को बताते हैं।  अध्यात्मिक दृष्टि से इन चारो धामों की यात्रा जीवन के सारे सांसरिक दायित्व पूरे करने के बाद की जाती रही है। संभव है कुछ लोग अपनी शक्ति के कारण इसे पर्यटन की दृष्टि से भी पूर्वकाल में करते रहे हों पर सामान्य आदमी कभी इस पर विचार नहीं  करता था।  दूसरी बात यह कि  हमारे देश में धार्मिक आधार पर पर्यटन के लिये यात्रा करने वाले स्थान है जहां यात्रा की परंपरा है। इधर अमरनाथ यात्रा भी चल रही है।  इस यात्रा में जाने वाले यात्री का पहले स्वास्थ्य परीक्षण तक किया जाता है।  तय बात है कि श्रद्धा की दृष्टि से की जाने वाली यात्रा के लिये श्रद्धालू  का स्वस्थ होना आवश्यक है।  चारों धामों की यात्रा के लिये ऐसी कोई शर्त नहीं रही। इसका कारण यह है कि यहां आने वाले श्रद्धालू को जीवन से मुक्त माना जाता रहा होगा।  यही कारण है कि माला पहनकर जाने वाले श्रद्धालु एक तरह से परिवार तथा समाज से विदा लेकर जाते थे।  इसे गर्मियों के लिये पिकनिक जैसा स्थान भी बनाया गया तो यह प्रश्न भी उठना स्वाभाविक है कि पहाड़ियों की यात्रा के लिये जो स्वास्थ्य परीक्षण होना चाहिये वह भी अनिवार्य होना चाहिये था।  आपने देखा होगा कि अनेक लोग संघर्ष करते हुए पहाड़ से जमीन पर उतर आये पर कुछ लोगों ने अपने खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर पैदल चलने से इंकार कर दिया।  अब प्रशासन कह रहा है कि स्वयं उतर कर आओ पर अनेक यात्री इसके लिये तैयार नहीं है।  यह अजीबोगरीब स्थिति है।  पहाड़ियों पर चढ़ने से अधिक उतरने में संकट पैदा होता है।  ऐसे में अस्वस्थ व्यक्ति से इस आपदा में नीचे आने की आशा करना ही व्यर्थ है। 
     बहरहाल इस आपदा ने देश के लोगों का मनोबल हिलाकर दिया है।  कल हम वृंदावन की यात्रा समाप्त कर मथुरा आये। वहां गोंडवाना एक्सप्रेस की एक सामान्य बोगी में खाली जगह देखी। हमने चढ़ने से पहले बोगी को देखा।  वह सामान्य बोगी लग रही थी फिर भी विश्वास नहीं हुआ तो खिड़की पर  अंदर यात्री से पूछा कि ‘‘क्या यह जनरल बोगी है?’’ 
उसने जब हां कहा तब अंदर बैठे। तब उसने सवाल किया कि आपने यह प्रश्न क्योंकि किया। हमने उसे जब बताया कि हमने कभी सामान्य बोगी को कभी इतना खाली कभी नहीं देखा। तब वह बोला-‘‘केदारधाम की त्रासदी के बाद लोगों का मनोबल गिर गया लगता है जिससे यात्रा कम की जा रही है। शायद यही वजह लगती है।’’
      इसमें सच हो न हो पर इतना तय है कि समाज में इस त्रासदी का मानसिक प्रभाव लंबे समय तक रहेगा।


कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Mar 20, 2013

सताने वाला सपना-हिन्दी शायरी satane wala sapana-hindi shayri or poet

झूठ बोलना नहीं आता,
सच सहन कर सके कोई इंसान
सामने नज़र नहीं आता,
पाखंड पसंद जमाने को
लुभाने के लिये ख्वाब बेचना सरल है
आकाश में उड़ने की चाहत लिये
सभी खड़े हैं बाज़ार में
हकीकत की जमीन पर गिरते
जब मदहोश लोग
दिल बहलाने वाले खिलौने का
सच तभी उनके सामने आता।
कहें दीपक बापू
दिल का सच
अंदर ही सांस लेता रहता है
अपने दर्द का इलाज कर लेते है
हम अपनी सांसों से
सता सके कोई सपना
ऐसा कभी अपनी सोच में नहीं आता।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Dec 29, 2012

शोक, बहस और विज्ञापन-लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य (shok, bahas aur vigyapan-laghu hindi hasya vyangya,short hindi satire article

                     दो प्रचार प्रबंधक एक बार में सोमरस का उपभोग करने के लिये   गये। बैरा उनके कहे अनुसार सामान लाता और वह उसे उदरस्थ करने के बाद इशारा करके पास दोबारा बुलाते तब फिर आता। दोनों आपस में अपने व्यवसाय से संबंधित बातचीत करते रहे।  एक प्रचार प्रबंधक ने दूसरे से कहा‘-‘‘यार, मेरे चैनल का मालिक विज्ञापनों का भूखा है।  कहता है कि तुम समाचार अधिक चलाते हो विज्ञापन कम दिखाते हो।’’
      दूसरा बोला-‘‘यार, मेरे चैनल पर तो समाचारों का सूखा है।  इतने विज्ञापन आते हैं कि समझ में नहीं आता कि समाचार चलायें कि नहीं। जिन मुद्दों पर पांच मिनट की बहस होती है  हम पच्चपन मिनट के विज्ञापन चलाते हैं।  हालांकि इस समय मुसीबत यह है कि हर रोज कोई मुद्दा मिलता नहीं है।’’
      पहला बोला-‘‘अरे, इसकी चिंता क्यों करते हो? हम और तुम मिलकर कोई कार्यक्रम बनाते हैं। राई को पर्वत और रस्सी को सांप बना लेंगे। अरे दर्शक जायेगा कहां? मेरे चैनल  या तुम्हारे चैनल पर जाने अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है।
   इतने में बैरा उनके आदेश के अनुसार सामान ले आया।  उसकी आंखों में आंसु थे। यह देखकर पहले प्रचार प्रबंधक ने उससे पूछा कि ‘‘क्या बात है? रो क्यों रहे हो? जल्दी बताओ कहीं हमारे लिये जोरदार खबर तो नहीं है जिससे हमारे विज्ञापन हिट हो जाये।’’
            बैरा बोला-‘‘नहीं साहब, यह शोक वाली खबर है।  वह मर गयी।’’
           दोनों प्रबंधक उछलकर खड़े हुए पहला बोला-‘‘अच्छा! यार तुम यह पैसा रख लो। सामान वापस ले जाओ। हम अपने काम पर जा रहे है। आज समाचार और बहसों के लिये ऐसी सामग्री मिल गयी जिसमे हमारे ढेर सारे विज्ञापन चल जायेंगे।’’
           दूसरा बोला-‘‘यार, पर शोक और उसकी बहस में विज्ञापन! देखना लोग बुरा न मान जायें।’’
           पहला बोला-‘‘नहीं यार, लोग आंसु बहायेंगे। विज्ञापन देखकर उनको राहत मिलेगी। हम फिर उनको रुलायेंगे। देखा नहीं उसके  बस से लेकर उसके अस्पताल रहने तक  हमने समाचार और बहस में कितने विज्ञापन चलाये।’’
            दूसरा बोला-‘‘पहले यह तो इससे पूछो मरी कौन है?’’
           पहले ने बैरे से पूछा-‘‘यह तो बताओ मरी कौन है?’’
          बैरा रोता रहा पर कुछ बोला नहीं। दूसरे ने कहा-‘‘यार, यह तो मौन है।’’
               पहला बोला-‘‘चलो यार, अपने विज्ञापन का काम देखो।  यह हमारा कौन है?’’
दोनों ही बाहर निकल पड़े। पहले ने एक विद्वान को मोबाइल से फोन किया और बोला-‘‘जनाब, आप जल्दी आईये।  अपने साथ अपनी मित्र मंडली भी लाना। सभी अच्छा बोलने वाले हों ताकि दर्शक अधिक से अधिक हमने चैनल पर बने रहें। हमारा विज्ञापन का समय निकल सके।’’
            दूसरे ने भी मोबाईल निकाला और अपने सहायक से बोला-‘‘सुनो, जल्दी से विज्ञापन की तैयारी कर लो। एक खबर है जिस पर लंबी बहस हो सकती है। इसमें अपनी आय का लक्ष्य पूरा करने में मदद मिलेगी।’’
दोनों अपने लक्ष्यों की तरफ चल दिये। उन्होंने यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि ‘मरी कौन है’। इससे उनका मतलब भी नहीं था।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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