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May 16, 2010

वफा सस्ती कब थी-हिन्दी शायरी (vafaa sasti aur mahangi-hindi shayari)

वफा न कभी सस्ती थी
जो कहें अब महंगी हो गयी,
बाज़ार से हो गयी लापता बरसों से
खरीदने वालों की जो तंगी हो गयी।
दाम चुकाकर वफा खरीद सकते हैं,
पर उसके खालिस होने का नहीं दम भरते हैं,
जब जब कीमत का नकाब उतरा
तब असलियत नंगी हो गयी।
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कई अक्लमंद लगे हैं काम पर
दुनियां के आम इंसान जगाने के लिये,
इसलिये कोई दे रहा है खूनी तकरीर
कोई बांट रहा हथियार  लोगों में, लड़ने के लिये।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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Apr 3, 2010

ईमानदार अब तबाह हो गये-हिन्दी शायरी (imandar ab tabah ho gaye-hindi shayri)

उनके दिखाये सपनों का पीछा करते कई घर तबाह हो गये,
अंधेरे को भगाने के लिये जलाई आग में अंधे स्वाह हो गये।
जंग भड़काई थी जमाने में, ईमान और इंसाफ लाने के लिये
हार गये तो अपने ही दोस्तों के खिलाफ एक गवाह हो गये।
मुखौटा लगाया पहरेदार का, सब का भरोसा जीतने के लिये,
लुट गया सामान, भरोसा करने वालों के चेहरे स्याह हों गये।
जिंदगी बनाने का दावा करने वालों पर नहीं करना भरोसा,
बेईमान चढ़े हैं हर शिखर पर, ईमानदार अब तबाह हो गये।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Mar 23, 2010

ज़हर और अमृत-हिंदी शायरी (zahar aur amrit-hindi shayri)

यूं तो तन्हाई में भी इतना नहीं डरे थे

जितना भीड़ में आकर खौफ खाने लगे.

घर से निकलते हुए सोचा नहीं था कि

ज़माने भर के कायरों से मुलाकात होगी,

बिके थे लोग बाज़ार के सौदागरों के हाथ

दलाली लेकर ज़हर को अमृत बताने लगे..

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शहीदों के नाम पर लगाते हैं हर बरस मेले

नाम और नामा कमाने के वास्ते.

अपने हाथ से कभी किसी की

जिन्होंने कभी नहीं संवारी ज़िन्दगी

वाही बता रहे हैं लोगों को तरक्की के रास्ते..
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कवि,लेखक-संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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