Feb 28, 2010

चाटुकारिता का फन-व्यंग्य कविता (chatukarita ka fun-hindi vyangya kavita)

बाजार के खेल में चालाकियों के हुनर में
माहिर खिलाड़ी
आजकल फरिश्ते कहलाते हैं।
अब होनहार घुड़सवार होने का प्रमाण
दौड़ में जीत से नहीं मिलता,
दर्शकों की तालियों से अब
किसी का दिल नहीं खिलता,
दौलतमंदों के इशारे पर
अपनी चालाकी से
हार जीत तय करने के फन में माहिर
कलाकार ही हरफनमौला कहलाते हैं।
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काम करने के हुनर से ज्यादा
चाटुकारिता के फन में उस्ताद होना अच्छा है,
अपनी पसीने से रोटी जुटाना कठिन लगे तो
दौलतमंदों के दोस्त बनकर
उनको ठगना भी अच्छा है।
अपनी रूह को मारना इतना आसान नहीं है
इसलिये उसकी आवाज को
अनसुना करना भी अच्छा है।
किस किस फन को सीख कर जिंदगी काटोगे
नाम का ‘हरफनमौला’ होना ही अच्छा है।

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Feb 23, 2010

आंसु भी हंसी में बदल जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य क्षणिकायें (ansu aur hansi-hindi satire poem)

फिक्र हो या नहीं
करते दिखना,
एक झूठ को
सौ बार सच लिखना,
ईमानदारी और वफा के कायदों से
कोई वास्ता हो या न हो
कामयाबी का बस एक ही दस्तूर है
बाजार में महंगे भाव बिकना।
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कभी कभी आंखों के आंसु भी
हंसी में बदल जाते हैं
जब हमदर्द कम करने की बजाय
दर्द बढ़ाने लग जाते हैं।
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अभावों का होना
तब नहीं अखरता
जब सामान हादसों की वजह
बनते नज़र आते हैं।
किसी हमदर्द का न मिलना
तब दुःख नहीं लगता
जब दौलतमंद भी
अपने महलों में तन्हा नज़र आते हैं।

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Feb 20, 2010

सादगी से वार-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (sadgi se war-hindi satire poems)

उनकी नज़रों मे आते हैं हमेशा
तलवारें चलने के मंजर
जुबां से
गरीबों और बेसहारों पर
जमाने के दिये घावों का
बयां किये जा रहे हैं।

हर जगह बेसहारों के लिये
हमदर्दी दिखाते हैं,
अमन के लिये जंग करना सिखाते हैं,
अपने हाथ में लिये छुरा कर लिया है
उन्होंने पीठ पीछे
जहां में तसल्ली लाने के लिये
सादगी से वार किये जा रहे हैं।
------------
वह लोगों के दिल में लगा कर आग
शांति के लिये कर रहे हैं जंग,
गरीब की भलाई का ख्वाब दिखाते
अमीरों के करके रास्ते तंग।
दान लेने से ज्यादा स्वाभिमान
उनको लूटने में लगता है,
जिंदा लोगों से कुछ नहीं सीखते
मरों की याद में उनका ख्याल पकता है,
एक बेहतर ढांचा बनाने की सोच लिये,
उन्होंने कई शहर फूंक दिये,
भूखे के लिये रोटी पकाने के बहाने
शहीदों की चिता पर मेले लगाने का
उनका अपना है ढंग।
यह अलग बात है कि
गरीबों पर नहीं चढ़ता उनका रंग।

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Feb 16, 2010

पसीना और कमाई-व्यंग्य कविता (pasina aur kamai-vyangya kavita)

गाड़िया बहुत हैं

पर सड़कें जाम हैं,

कभी आती तो कभी जाती

बिजली के इंतजार में

खड़े उपकरण तमाम हैं।

तरक्की का मतलब कभी

समझ में नहीं आया,

चीजों की खरीद फरोख्त में ही

ग्राहक और सौदागरों का  बाजार समाया,

अमीरों की चकाचैंध में

गरीबी का अंधेरा नहीं देखायी देता,

खाली है जो हाथ, किसे दिखते

समेट रहा है जो लूट का सामान

बस वही सर्वत्र दिखाई देता,

पसीना बहा रहा है कोई

कमाई किसी दूसरे के नाम है।

कहने को तरक्की तमाम  है।


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Feb 14, 2010

पसीना है पवित्र नदी-हिन्दी शायरी (pasnina hai pavitra nadi-hindi shayri)

मेहनतकशों की किस्मत में

आरामदायक गद्दे इसलिये भी नहीं आते हैं,

उनके लिये रोगों का  होना जरूरी है

जो अमीरों के ही हिस्से में आते हैं।

तीर्थ में जाकर सर्वशक्तिमान के दर्शन कर

स्वर्ग मिल जाता,

पर वहां पवित्र सरोवरों में

स्नान कर भी

देह का कूड़ेदान साफ नहीं हो पाता,

जाने को पैसा नहीं है

फिर भी मजदूरों की देह से

बहते हुए अमृत रूप पसीने में

कई रोग बाहर बह जाते हैं।

पसीना है वह पवित्र नदी

जिसमें मेहनतकश की तैर पाते हैं।

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Feb 12, 2010

जय हो दूरदर्शन-हिन्दी हास्य व्यंग्य (jay ho doosrdarshan-hindi haysa vyangya)

अरे, हम क्या देखना चाहते हैं और यह क्या दिखा रहे हैं।
भइये यह क्या हुआ। हम टीवी पर देशभर के शिव मंदिरों में आज मनाये जा रहे शिवरात्रि पर्व को देखना चाहते हैं पर यह सभी चैनल वाले एक नायक शाह की फिल्म रिलीज होने का का शोर इस तरह दिखा रहे हैं जैसे कि उसने कोई युद्ध जीत लिया हो।
अब समझ में आया गड़बड़झाला। बुढ़ा चुका हीरो उनके विज्ञापन का भी आधार है! देश के सबसे बड़ी कपंनी  भारतीय संचार निगम की प्रतिद्वंद्वी एक टेलीफोन कंपनी उसी हीरो को लिये डोल रही है उसको लगता है कि उसके कनेक्शन उसकी वजह से ही बढ़ रहे हैं।  पिछले साल पंद्रह अगस्त पर भी उसके नाम पर जोरदार शोर मचा था। अमेरिका में  हवाई अड्डे पर उसे रोका गया।  तब देश की इज्जत दांव पर लग गयी थी। यह चैनल वाले भूल गये थे कि इस देश में आजादी का पर्व मनाया जा रहा है। सारा दिन उसका नाम ही रटते रहे।  केवल दिल्ली दूरदर्शन ही आजादी के विषय पर आजादी से अकेले डटा रहा। 
‘अरे शाह’, ‘हाय शाह’, और ‘अपना शाह’ जैसा गाते हुए यह निजी चैनल  उस हीरो को शिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।  अब समझ में आया पंद्रह अगस्त का माजरा। हमें लगता है कि अमेरिका में हवाई अड्डे पर उसे  इसलिये ही रोका गया होगा  ताकि भारत के निजी टीवी चैनल उसका नाम जाप सकें-यह कल्पना अब की हालतों को देखकर ही पैदा होती है।   अब यकीन नहीं होता कि वह एक सच था-यकीनन वह प्रायोजित खबर रही होगी  ताकि पंद्रह अगस्त को घर बैठा भारतीय समुदाय अपने देश की आजादी के बारे में सोचने की बजाय उस बुढ़ा चुके हीरो के बारे में अधिक सोचे।  पंद्रह अगस्त को आता देखकर पहले ही यह योजना बनी होगी।
कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि अमेरिका में भी नववर्ष और क्रिसमस की छुट्टियों में लोगों के ध्यान को भटकाने के लिये ही अनेक ऐसी खबरें बनवायीं जाती हैं, भले ही उनमें सत्यता का पुट हो। सद्दाम हुसैन को फांसी और बेनजीर की हत्या के समय कुछ अंतर्जाल लेखकों ने ऐसी बातें लिखी थीं, पर उस पर यकीन नहीं हुआ। उनका आशय तो यही था कि कहीं एक नंबर एक तो कहीं दो नंबर वाले लोग इन प्रचार माध्यमों के छद्म साथी उनको प्रचार के अवसर उपलब्ध कराते हैं।   अब लगता है कि उन लेखकों ने शायद यही बात कहीं से देखी या सुनी होगी और परिस्थतियां उनको विश्वास करने योग्य लगती होंगी।  फिर अपने देश का आधुनिक बौद्धिक चल तो अमेरिकी शैली पर ही रहा है तब यह शक होना स्वाभाविक है।
यह आज महाशिवरात्रि का पर्व भी पहले से तय था। शायद फिल्म को इसी दिन पहली बार प्रदर्शित किया जाने की योजना बनी होगी और साथ में विवाद खड़े करने का कार्यक्रम भी बना होगा। इस कार्यक्रमं  के पीछे शिव के नाम धरने वाले गण भी लगाने का विचार हुआ होगा। पहले क्रिकेट पर उस हीरो का बयान फिर शिव नाम धारी कथित गणों का उस पर शाब्दिक हमला-अपने देश के प्रचार मसीहाओं की इस बात के लिये प्रशंसा तो करनी होगी कि उन्होंने सारे कार्यक्रम हवाई रूप से करवाये, जमीन पर खून खराबा नहीं हुआ।  फ्लाप हो रही क्रिकेट भी हिट तो  बुढ़ा राह हीरो भी जवान होने लगा था। 
बाजार के सौदागर और उसके प्रचार प्रबंधक लगातार इस बात का प्रयास करते  हैं कि सोने के अंडे देने वाली यह दोनों मुर्गियां-क्रिकेट और फिल्म-बुढ़ायें नहीं और अंडे देती रहें इसके लिये क्रीम पाउडर से अभिनेता अभिनेत्रियों और खिलाड़ियों का मेकअप होता है तो विवादास्पद घटनाओं से उनके व्यक्तित्व में निखार लाया जाता है।   इतना ही नहीं विदेशों में भी पैसा मिले इसके लिये भी कोशिश कम नहीं होती इसलिये उनका ऐजेंडा भी चलाया जाता है।  
आजादी के दिन अमेरिका को तो शिवरात्रि के दिन शिव जी के कलियुगी गणों को खलनायक बना दिया। बना क्या दिया! सभी खुद ही तैयार हुए होंगे यह अभिनय करने के लिये। अमेरिका हो या भारत, यहां सब बिकता है भले ही हर कोई आजाद दिखता है।
अब यह कौन समझाये कि फिल्मी और क्रिकेट दर्शक ही केवल देश नहीं होते।  बीसीसीआई -जो कि एक क्लब ही है-की टीम पिटे तो देश का कहीं सम्मान नहीं गिरता और  फिल्म दिखे या नहीं इससे देश की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा का कोई तारतम्य नहीं है। मगर वह गाये जा रहे हैं कि ‘फिल्मी दर्शकों फिल्म की अग्रिम टिकिट खरीदकर  दिया शिव के गणों को करारा जवाब।’
लोग देख रहे होंगे, कुछ सोचने की विलासिता भी में व्यस्त होंगे पर यह कौन पूछेगा  कि ‘अरे, भई यह बताओ तो सही यह मैच चल कहां रहा था?  बैठे ठाले पाकिस्तान को देश की अभिव्यक्ति और काम करने की स्वतंत्रता से जोड़ दिया है।  बुढ़ा रहा हीरो उनके लिये आजादी का नायक बन रहा है। बैठे ठाले शिव के गण भी मिल गये जिनकी प्रतिष्ठाा सूरज डूब रहा था और वह उसे बचाने आये। 
इससे भला तो दिल्ली दूरदर्शन लगा जिसने घर पर बैठे ठाले ही हरिद्वार के दर्शन कराये। भगवान शिवजी का गुणगान कर मन को प्रसन्नता प्रदान की।  गंगा के विषय पर अच्छी चर्चा सुनाई।  इसी दूरदर्शन की कभी लोग आलोचना करते थे पर आज हमें उसे देखना अच्छा लगा।  सच बात तो यह है कि निजी समाचार चैनल तो अब शाह परस्त हो गये हैं जो भ्रम का प्रतीक हैं। सत्य के प्रतीक शिव उनको नहीं सुहाते। देश के अनेक बुद्धिजीवी कहते थे कि दूरदर्शन तो जनता पर खबरें थोपता है पर यह निजी चैनल क्या कर रहे हैं?

दूरदर्शन के समाचारों पर महाशिवरात्रि के पर्व मनाने के समाचार भी अच्छे लगे।  ऐसा लग रहा था कि जैसे वाकई अपने देश का ऐसा चैनल है जिसे इस बात का पता है कि देश का दर्शक क्या देखना चाहता है? जबकि यह निजी चैनल देखते हैं कि कौन उनके विज्ञापन का नायक है उसी का नाम ऐसे लेते हैं जैसे कि वह कोई भगवान हो। इसलिये यह कहने को मन करता है कि ‘जय हो दूरदर्शन’।  निजी चैनल वाले अपनी आजादी का आनंद शाह नाम धारी  के साथ उठायें हमें आपत्ति नहीं। हम तो भगवान शिवजी का स्मरण कर उसका आनंद उठायेंगे। हमारा मानना है कि जो जैसा स्मरण करता है वैसा ही गुण उसमें आता है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Feb 6, 2010

खेल के खेल का विस्तार-हिन्दी व्यंग्य (game of cricket and sports-hindi article

क्रिकेट खेल की दृष्टि से प्रचार माध्यमों के लिये आज का दिन करुणामय रहा। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई)की टीम-यही इस टीम का वास्तविक परिचय है-के सदस्यों का मैदान में अभिनय अपेक्षानुरूप नहीं रहा। दक्षिण अफ्रीका के पेशेवर खिलाड़ियों के सामने बीसीसीआई के कमाऊ गेंदबाजों का गेंदबाजी अभिनय काम नहीं आया और पूरे दिन के 91 ओवर में वह केवल दो विकेट गिरा सके।  प्रचार माध्यम कल अपनी बीसीसीआई टीम के  कप्तान हीरो की रणनीति का खुलासा कर रहे थे कि उन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ अपने गेंदबाजों से ‘राउण्ड द विकेट’ गेंदबाजी करने की जो सफल रणनीति अपनाई थी वही दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध भी आजमायेंगे।  उद्घोषक ऐसा करते हुए ऐसी मुस्कराहट बिखरे रहे थे जैसे कि कोई बड़ा रहस्योद्घाटन कर रहे थे।  उनका मानना था कि इसी रणनीति की वजह से बांग्लादेश हारा था। उद्घोषक घोषणा कर रहे थे कि ‘इस रणनीति के आगे दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाज हवा हो जायेंगे।’
यह नहीं हुआ। बरसों से हम क्रिकेट का खेल देख रहे हैं और यह पता है कि ‘ओवर द विकेट’ गेंदबाजी हो या ‘राउण्ड द विकेट’ कुशल और पेशेवर बल्लेबाजों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
हमने मैच नहीं देखा मगर लोग है कि पुराने नशे को भूलने नहीं देते।  सुबह एक ने बताया कि ‘दक्षिण अफ्रीका के दो विकेट 17 रन पर ही गिर गये हैं।’
हमने सोचा कि शायद पटकथा ऐसी रही होगी। फिर भारत में पिचें स्पिन लेती हैं इसलिये संभव है कि सच में ऐसा हुआ हो।
शाम को टीवी चैनलों की नाराजगी साफ दिख रही थी। करुणामय प्रदर्शन पर श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति तो संभव भी नहीं थी।  वैसे यह कोई विश्व कप थोड़े ही है कि लोग नाराज होकर खिलाड़ियों द्वारा अभिनीत विज्ञापनों का बहिष्कार करेंगे।  मगर बाजार की चिंतायें हैं और प्रचारक भी उससे नहीं बच सकते।
बांग्लादेश से बीसीसीआई क्या जीती? आसमान सिर पर उठा लिया। रेटिंग में नंबर बन हो गयी-और हमारी टीम तो एक तरह से विश्व विजेता है जैसे जुमले सुनाये गये, मगर दक्षिण अफ्रीका टीम कोई ऐसी वैसी टीम नहीं है। शुद्ध रूप से पेशेवर खिलाड़ियों से सुसज्जित यह टीम केवल आस्ट्रेलिया से ही पीछे है।  दरअसल अब क्रिकेट में मजा रह गया है तो वह इन दोनों टीमों के आपसी मैचों में दिखता है।  वह एक दिवसीय मैच हमें अब तक याद है जिसमें चार सौ से अधिक रन आस्ट्रेलिया ने बनाया और दक्षिण अफ्रीका ने उसका पीछा किया। तमाम तरह के रोमांचक उतार चढ़ाव के बाद दक्षिण अफ्रीका ने मैचा जीता।  मेन आफ दि मैच के सम्मान के लिये आस्ट्रेलिया के कप्तान को जब बुलाया गया तो उन्होंने उसे ठुकरा कर अपने ही उस विपक्षी बल्लेबाज को देने के लिये कहा जिसने उनसे केवल एक रन कम बनाया था।  उनका मानना था  कि मैंने तो बिना किसी दबाव के बल्लेबाजी की पर उस विपक्षी खिलाड़ी ने तो दबाव में इतना जोरदार प्रदर्शन किया। क्या जोरदार मैचा था? ऐसे मैच कभी कभी ही देखने को मिल सकते हैं?
बहरहाल बीसीसीआई के  खिलाड़ियों पर जैसे पांच दिवसीय मैच एक बोझा है पर सच यही है कि इसी में खिलाड़ी की काबलियत का परिचय मिलता है।  देशी टीम का प्रदर्शन वालीवुड की फिल्मों की तरह ही लगता है।  जैसे वालीवुड कभी भी हालीवुड का सामना नहीं कर पाता वैसे ही बीसीसीआई की टीम पश्चिमी टीमों के सामने ढेर हो जाती हैं। इसका कारण यह भी है कि भारतीय खिलाड़ी अन्य देशों से अधिक अमीर है इसलिये इस साहबी खेल को अपने ही ढंग से खेलते हैं।  दो की जगह एक रन बनता है और कोई कैच हाथ में आ जाये तो ठीक, नहीं तो ‘अनिश्चिताओं के इस खेल में’ सब चलता है।  खिलाड़ियों का खेल कम अभिनय अधिक इसलिये दिखता है क्योंकि उनके रैम्प पर चलने के कार्यक्रम, विज्ञापन तथा रोमांस के किस्से फिल्म अभिनेताओं की तरह ही होने लगे हैं।  अनेक बार तो उनको टीवी चैनलों के साथ कार्यक्रम करते देखा जा सकता है। कुछ फिल्मी अभिनेत्रियों के साथ नाचते भी देखे जा सकते हैं।
एक पाठक ने इस संबंध में एक बार टिप्पणी करते हुए हमको समझाया था कि क्रिकेट को खेल की तरह देखो।’
हमने इसका जवाब नहीं दिया। देना चाहते थे। वही यहां दे रहे हैं कि क्रिकेट को हमने खेल की तरह उठते देखा है और व्यापार की तरह गिरते भी देखा है।  प्रचार माध्यम इस खेल पर फिदा है पर इसमें फिक्सिंग की आशंकायें भी यही जताते रहे हैं-अनेक बार तो सनसनीखेज स्टिंग आपरेशन इनके द्वारा ही प्रस्तुत किये गये हैं। कुछ खिलाड़ियों को खेल से निकालकर सजा भी दी गयी।  अब उसे माफ करने की बात भी चल रही है। अब यही प्रचार माध्यम मानते हैं कि सब ठीक हो गया है तो हम भी मानते हैं कि हो गया हो होगा, पर एक बार दिल टूटा तो टूट ही गया। अलबत्ता इस खेल को कभी कभार हम देखते हैं पर इससे अब प्रभावित नहीं होते।  यह खेल अब बहुत कुछ हो गया है। नहीं तो इस देश में होने वाली एक मामूली से क्रिकेट प्रतियोगिता में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के न आने पर इतना उत्पात नहीं मचता। एक ने तो यहां तक कह दिया कि ऐसा न होने से उन लोगों को परेशानी आयेगी जो दोनों देशों में कड़वाहट कम करने का प्रयास कर रहे  हैं।  ऐसे में इस खेल के खेल का विस्तार समझा जा सकता है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Feb 3, 2010

महानायक-हिन्दी व्यंग्य कविता (great actor-hindi comic poem)

पर्दे पर अभिनय करते हुए

कई लोग महानायक हो जाते हैं,

जमीन पर कभी नहीं पड़ते उनके पांव

कभी खेतिहर तो कभी मजदूरी का करते अभिनय

गरीब के हमदर्द की भूमिका में

बटोरते हुए तालियां

किसान प्रेमी होने का दिखावा करते 

पर देखा न होता कभी गांव,

फिर भी आम इंसानों की आखों में

फरिश्तों की तरह बस जाते हैं।

जमीन पर अब नहीं पैदा होते

अत्याचारों से जुझने वाले नायक,

दौलतमंदों की तारीफों में जुटे गायक,

हर कोई बस, पर्दे पर चमकने के लिये

जद्दोजेहद कर रहा है

सच में कारनामों को अंजाम देने की जगह

अफसानों में अदायें भर रहा है

बिना पसीना बहाये पैसा पाने की चाहत,

जल्दी कामयाबी से पाना चाहते दिल की राहत,

पूरा जमाना पका रहा है ख्वाबी पुलाव

इसलिये कागज के पन्नों पर

या पर्दे पर ही महानायक नज़र आते हैं।

जमीन का सच कड़वा है

उससे आम इंसान  भी मुंह फेर जाते हैं।

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आओ खूबसूरत चरित्रों की फिक्र करें-दीपकबापूवाणी (Aao Khubsurat charitron ki Fikra kahen-DeepakBapuwani)

जिससे डरे वही तन्हाई साथ चली , प्रेंमरहित मिली दिल की हर गली। ‘ दीपकबापू ’ हम तो चिंगारी लाते रहे अंधेरापसंदों को नह...