Feb 12, 2010

जय हो दूरदर्शन-हिन्दी हास्य व्यंग्य (jay ho doosrdarshan-hindi haysa vyangya)

अरे, हम क्या देखना चाहते हैं और यह क्या दिखा रहे हैं।
भइये यह क्या हुआ। हम टीवी पर देशभर के शिव मंदिरों में आज मनाये जा रहे शिवरात्रि पर्व को देखना चाहते हैं पर यह सभी चैनल वाले एक नायक शाह की फिल्म रिलीज होने का का शोर इस तरह दिखा रहे हैं जैसे कि उसने कोई युद्ध जीत लिया हो।
अब समझ में आया गड़बड़झाला। बुढ़ा चुका हीरो उनके विज्ञापन का भी आधार है! देश के सबसे बड़ी कपंनी  भारतीय संचार निगम की प्रतिद्वंद्वी एक टेलीफोन कंपनी उसी हीरो को लिये डोल रही है उसको लगता है कि उसके कनेक्शन उसकी वजह से ही बढ़ रहे हैं।  पिछले साल पंद्रह अगस्त पर भी उसके नाम पर जोरदार शोर मचा था। अमेरिका में  हवाई अड्डे पर उसे रोका गया।  तब देश की इज्जत दांव पर लग गयी थी। यह चैनल वाले भूल गये थे कि इस देश में आजादी का पर्व मनाया जा रहा है। सारा दिन उसका नाम ही रटते रहे।  केवल दिल्ली दूरदर्शन ही आजादी के विषय पर आजादी से अकेले डटा रहा। 
‘अरे शाह’, ‘हाय शाह’, और ‘अपना शाह’ जैसा गाते हुए यह निजी चैनल  उस हीरो को शिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।  अब समझ में आया पंद्रह अगस्त का माजरा। हमें लगता है कि अमेरिका में हवाई अड्डे पर उसे  इसलिये ही रोका गया होगा  ताकि भारत के निजी टीवी चैनल उसका नाम जाप सकें-यह कल्पना अब की हालतों को देखकर ही पैदा होती है।   अब यकीन नहीं होता कि वह एक सच था-यकीनन वह प्रायोजित खबर रही होगी  ताकि पंद्रह अगस्त को घर बैठा भारतीय समुदाय अपने देश की आजादी के बारे में सोचने की बजाय उस बुढ़ा चुके हीरो के बारे में अधिक सोचे।  पंद्रह अगस्त को आता देखकर पहले ही यह योजना बनी होगी।
कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि अमेरिका में भी नववर्ष और क्रिसमस की छुट्टियों में लोगों के ध्यान को भटकाने के लिये ही अनेक ऐसी खबरें बनवायीं जाती हैं, भले ही उनमें सत्यता का पुट हो। सद्दाम हुसैन को फांसी और बेनजीर की हत्या के समय कुछ अंतर्जाल लेखकों ने ऐसी बातें लिखी थीं, पर उस पर यकीन नहीं हुआ। उनका आशय तो यही था कि कहीं एक नंबर एक तो कहीं दो नंबर वाले लोग इन प्रचार माध्यमों के छद्म साथी उनको प्रचार के अवसर उपलब्ध कराते हैं।   अब लगता है कि उन लेखकों ने शायद यही बात कहीं से देखी या सुनी होगी और परिस्थतियां उनको विश्वास करने योग्य लगती होंगी।  फिर अपने देश का आधुनिक बौद्धिक चल तो अमेरिकी शैली पर ही रहा है तब यह शक होना स्वाभाविक है।
यह आज महाशिवरात्रि का पर्व भी पहले से तय था। शायद फिल्म को इसी दिन पहली बार प्रदर्शित किया जाने की योजना बनी होगी और साथ में विवाद खड़े करने का कार्यक्रम भी बना होगा। इस कार्यक्रमं  के पीछे शिव के नाम धरने वाले गण भी लगाने का विचार हुआ होगा। पहले क्रिकेट पर उस हीरो का बयान फिर शिव नाम धारी कथित गणों का उस पर शाब्दिक हमला-अपने देश के प्रचार मसीहाओं की इस बात के लिये प्रशंसा तो करनी होगी कि उन्होंने सारे कार्यक्रम हवाई रूप से करवाये, जमीन पर खून खराबा नहीं हुआ।  फ्लाप हो रही क्रिकेट भी हिट तो  बुढ़ा राह हीरो भी जवान होने लगा था। 
बाजार के सौदागर और उसके प्रचार प्रबंधक लगातार इस बात का प्रयास करते  हैं कि सोने के अंडे देने वाली यह दोनों मुर्गियां-क्रिकेट और फिल्म-बुढ़ायें नहीं और अंडे देती रहें इसके लिये क्रीम पाउडर से अभिनेता अभिनेत्रियों और खिलाड़ियों का मेकअप होता है तो विवादास्पद घटनाओं से उनके व्यक्तित्व में निखार लाया जाता है।   इतना ही नहीं विदेशों में भी पैसा मिले इसके लिये भी कोशिश कम नहीं होती इसलिये उनका ऐजेंडा भी चलाया जाता है।  
आजादी के दिन अमेरिका को तो शिवरात्रि के दिन शिव जी के कलियुगी गणों को खलनायक बना दिया। बना क्या दिया! सभी खुद ही तैयार हुए होंगे यह अभिनय करने के लिये। अमेरिका हो या भारत, यहां सब बिकता है भले ही हर कोई आजाद दिखता है।
अब यह कौन समझाये कि फिल्मी और क्रिकेट दर्शक ही केवल देश नहीं होते।  बीसीसीआई -जो कि एक क्लब ही है-की टीम पिटे तो देश का कहीं सम्मान नहीं गिरता और  फिल्म दिखे या नहीं इससे देश की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा का कोई तारतम्य नहीं है। मगर वह गाये जा रहे हैं कि ‘फिल्मी दर्शकों फिल्म की अग्रिम टिकिट खरीदकर  दिया शिव के गणों को करारा जवाब।’
लोग देख रहे होंगे, कुछ सोचने की विलासिता भी में व्यस्त होंगे पर यह कौन पूछेगा  कि ‘अरे, भई यह बताओ तो सही यह मैच चल कहां रहा था?  बैठे ठाले पाकिस्तान को देश की अभिव्यक्ति और काम करने की स्वतंत्रता से जोड़ दिया है।  बुढ़ा रहा हीरो उनके लिये आजादी का नायक बन रहा है। बैठे ठाले शिव के गण भी मिल गये जिनकी प्रतिष्ठाा सूरज डूब रहा था और वह उसे बचाने आये। 
इससे भला तो दिल्ली दूरदर्शन लगा जिसने घर पर बैठे ठाले ही हरिद्वार के दर्शन कराये। भगवान शिवजी का गुणगान कर मन को प्रसन्नता प्रदान की।  गंगा के विषय पर अच्छी चर्चा सुनाई।  इसी दूरदर्शन की कभी लोग आलोचना करते थे पर आज हमें उसे देखना अच्छा लगा।  सच बात तो यह है कि निजी समाचार चैनल तो अब शाह परस्त हो गये हैं जो भ्रम का प्रतीक हैं। सत्य के प्रतीक शिव उनको नहीं सुहाते। देश के अनेक बुद्धिजीवी कहते थे कि दूरदर्शन तो जनता पर खबरें थोपता है पर यह निजी चैनल क्या कर रहे हैं?

दूरदर्शन के समाचारों पर महाशिवरात्रि के पर्व मनाने के समाचार भी अच्छे लगे।  ऐसा लग रहा था कि जैसे वाकई अपने देश का ऐसा चैनल है जिसे इस बात का पता है कि देश का दर्शक क्या देखना चाहता है? जबकि यह निजी चैनल देखते हैं कि कौन उनके विज्ञापन का नायक है उसी का नाम ऐसे लेते हैं जैसे कि वह कोई भगवान हो। इसलिये यह कहने को मन करता है कि ‘जय हो दूरदर्शन’।  निजी चैनल वाले अपनी आजादी का आनंद शाह नाम धारी  के साथ उठायें हमें आपत्ति नहीं। हम तो भगवान शिवजी का स्मरण कर उसका आनंद उठायेंगे। हमारा मानना है कि जो जैसा स्मरण करता है वैसा ही गुण उसमें आता है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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1 comment:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सही लिखा है. महाशिवरात्रि पर्व की बधाई.