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Jun 9, 2011

हर शख्स अकेला हो गया-हिन्दी शायरी(har shakhs akela ho gaya-hindi shayari)

पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Aug 22, 2008

देखने वाले सच भूल जाते-हिंदी क्षणिका

टीवी धारावाहिकों के
पारिवारिक क्लेशों पर लोग बतियाते हैंें
असल जीवन में ऐसे खलपात्र नहीं मिलते
जिनको देखकर वह घबड़ाते
झूठी कल्पनाओं और कहानियों के
नायक नायिकाओं
खलनायक खलनायिकाओं
को असल समझ कर
अपना दिल बहलाते
झूठ के पांव नहीं होते
इसलिये जमीन पर नहीं चलता
पर इलैक्ट्रोनिक पंख उसे
रंग बिरंगे रूप में लोगों के आगे इस तरह बिछाते
देखने वाले सच भूल जाते

...............................
यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

Aug 21, 2008

गुलाम आजाद होकर भी मालिक के लिखे पर चलता है-हास्य व्यंग्य कविता

गुलाम और आजाद में
यही फर्क दिखा है
आजाद चलते हैं अपने ख्याल से
गुलाम आजाद होकर भी
चलता है उस रास्ते पर
जो उसके मालिक ने अपनी किताब में लिखा है
...................................
सर्वशक्तिमान ने
एक आजाद आदमी को
धरती पर भेजते हुए पूछा
‘तू वहां क्या करेगा
किसी की चाकरी या
मालिकी करेगा’
आजाद आदमी ने कहा
‘दोनों में ही गुलामी होगी
गुलामी तो है ही बुरी
मालिकी में भी अपनी संपत्ति की
देखभाल करना गुलामी से क्या कम है
इसलिये वहीं विचरण करूंगा
जहां मेरा मन कहेगा
सर्वशक्तिमान ने धरती पर जाते गुलाम से पूछा
‘क्या तू भी धरती पर
आजादी से विचरण करेगा’
गुलाम ने कहा
‘इस जन्म में आजादी बख्श दें
तो बहुत अच्छा है
पर मालिक का नाम पहले ही बता दें तो अच्छा
वहां जाकर ढूंढना नहीं पड़ेगा
.....................................


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Nov 11, 2007

उसकी दूसरी गलती-हिंदी कहानी

बोस का आदेश था कि मुझे उस कंपनी में एक 'आवश्यक सौदे ' के लिये जाना होगा। मैने मना किया और कहा कि-'मुझसे उंचे पद वाले अधिकारी जब इस कंपनी में हैं तो आप मुझे क्यों भेज रहें है और उस कंपनी की मैनेजिंग डायरेक्टर मुझ जैसे जूनियर से बात करना पसंद करेगी यह भी एक प्रश्न है।''
बोस ने मेरी राय को सिरे से ही नकारते हुए कहा-''नहीं! मैं तुम्हारी बात से एग्री नहीं करता क्योंकि तुम बहुत सीनियर हो, और रही अधिकारी होने या न होने की बात तो तुम इस शहर में बने रहने के लिये प्रमोशन नहीं लेते ताकि कहीं यहां से ट्रांसफर ना हो जाये। हैड क्वार्टर वाले भी इस बात को जानते है और इसलिए मुझे फोन पर तुम्हें ही इस काम के लिये भेजने को कहा है।"
आखिर मुझे वहां जाना ही पडा। मेरे इंकार के पीछे वह वजह नहीं थी जो मैने बोस को बताई थी। ऐक जैसे व्यवसाय होने के कारण उस कंपनी के संगठन और प्रबंधन की जानकारी मुझे होना स्वाभाविक थी कि ऐक एसा व्यक्ति वहां के प्रबंधन में था जो मेरे साथ पहले ऐक जगह काम कर चुका था और गबन के आरोप में वहां से निकला गया था। उसके इस कार्य की जानकारी उसके ही ऐक मित्र ने वहां के प्रबंधन को दी थी कि वह उसके साथ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं करेंगे। मगर प्रबंधन ने उसकी नहीं मानी और उसके खिलाफ़ पुलिस कार्रवाई की और वह कुछ दिन जेल में रहा और उसका मित्र उसे यह समझाने में सफ़ल रहा था कि यह सब मेरी वजह से हुआ था। वह जाते-जाते मुझसे बद्ला लेने की धमकी दे गया था-और वह जिस तरह का आदमी था उससे दूर रहना ही बेहतर था।
आखिर बोस के आदेश पर मैं वहां पहुंचा। मैं शंकित जरूर था पर डरा हुआ बिलकुल नहीं था। साथ ही मैं यह भी जानता था कि सब कुछ वैसा नहीं होगा जैसे बोस चाहते थे।
कंपनी की इमारत में घुसते ही वहां खडे चौकीदर को मैने अपना परिचय दिया तो उसने अंदर ऐक टेबल की तरफ़ जाने का इशारा किया जहां ऐक महिला बैठीं थी। मैं वहां पहुंचा और उसे अपना परिचय दिया तो उसने कहा-''आप अभी बैठिये।''
मैं उसके पास बैठ गया, कुछ देर बाद वह बोली-'' हमारी मेम साहब से मिलने के पहले उनके सचिव से मिलना होगा। वह अभी आते ही होंगे।"
मैने अभी बैठा ही था कि वह बोली-''लीजिये सर आगये।'' मैने पलट कर देखा और मुझे मिली जानकारी गलत नहीं थी। वही था और मुझे घूर रहा था। वह महिला उससे बोली-" सर, इनसे मिलिये, यह उस कंपनी से आये हैं जिसके लिये मेमसाहब कल बता रही थीं।''
वह मुझे घूर रहा था। मैं उससे उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था पर वह ऐसे ही चला गया।
मैने स्वागती महिला की तरफ देखा तो वह बोलीं-''वह उधर मेमसाहब के चेम्बर में पूछ्ने गये हैं।'' मुझे उसकी बात पर यकीन नहीं था। वह कुछ खेल करेगा यह मैं जानता था। थोडी देर बाद चपरासी आया और स्वागती से बोला-''वह कौन साह्ब हैं जो मेमसाहब से मिलने आये हैं। आप उनसे बोल दीजिये कि मेम साह्ब अपने ही समकक्ष किसी अधिकारी से बात करेंगी, मामूली कर्मचारी से नहीं।''
ऐसा कहकर वह चला गया, इस बीच स्वागती के पास फोन आगया और वह मुझसे बोली-''तुम तो कोई छोटे कर्मचारी हो। मेडम तुमसे नहीं मिलना चाहतीं। तुम अब यहां से तुरंत चले जाओ मेम साह्ब के सेक्रेटरी का आर्डर है।''
मैं जानता था कि कौन बोल रहा था , और मुझे उसके व्यवहार पर बिल्कुल गुस्सा नहीं आया क्योंकि मैं जानता था हमारी कंपनी से ज्यादा उस कंपनी को हमारी जरूरत थी। अगर मैं वहां से चला जाता तो किसी ऐक को जवाब देना ही था मुझे या उस कंपनी की डिप्टी डायरेक्टर को। मेरा इस तरह वहां से लौटना मेरी कंपनी स्वीकार नहीं कर सकती थी।
मैने स्वागती पर बैठी उस महिला कर्मचारी से कहा-''क्या मैं फोन कर सकता हूं।"
उसने एकदम शुष्क और कड़े स्वर में कहा-''नहीं। आपको यहाँ से जाने का आदेश है।''
मैंने बाहर निकल गया और बाहर से पीसीओ से अपने बॉस को फोन किया और उन्हें जानकारी दी। वह बोले-''उन्हें ग़लतफ़हमी है। तुमसे इस तरह का व्यवहार कर हमारी कंपनी से अनुबंध की उम्मीद छोड़ देना चाहिये, क्योंकि हमारा हेड क्वार्टर इस बहुत गंभीरता से लेगा। फ़िर भी मैं बात करता हूं। तुम दस मिनट बाद मुझे फोन करना।''
मैं वहीं खडा रहा। बरसात के दिन थे और मुझे पसीना आने के साथ प्यास भी बहुत लग रही थी, पर इससे ज्यादा इस बात की फिक्रथी कि दो कंपनियों के बीच मेरी वजह से विवाद छिड़ने वाला था। मैं ऐक होटल में गया और चाय्-नाश्ता करने के बाद फ़िर उसी पी.सी.ओ. पर आया। लगभग आधा घंटा गुजर गया था। मैने बॉस को फोन किया, मेरी आवाज सुनते ही बॉस बोले-''क्या कभी तुम किसी कंपनी में गबन करने के बाद जेल गए हो। क्या तुम्हें कभी नौकरी से निकाला गया। और क्या तुम इस कंपनी की तरफ़ से कांट्रेक्ट करने में अपना कमीशन खाते हो। क्यातुम ऐक बहुत बडे कमीशन खोर हो?''
मैने हंसकर कहा-'आपके मूंह से अपने बारे में यह कहानी सुनकर मुझे बिल्कुल ताज्जुब नहीं हुआ।' ''मैं जानता हूं!" बोस ने कहा-''तो तुम यह भी जानते हो कि किसने यह कहानी गढी होगी। मुझे उसका नाम बताओ। अभी तुम वहां जाओ मेडम तुमसे बात करने को तैयार हैं।''
पीसीओ उस कंपनी के दफ़्तर से ज्यादा दूर नहीं था। मैं जैसे ही वहां से बाहर निकला वैसे ही वह चपरासी मुझे मिल गया तो अंदर से मेरे लिये संदेश ले आया था और स्वागती ने मुझे बाहर जाने का आदेश दिया था। वह बोला-'सर, मेडम आपको बुला रहीं है।'
मैं उस कंपनी के इमारत की सीढियाँ चढ़कर उसी स्वागती के पास से गुजरा तो वह एकदम बोली-''सॉरी सर, मुझे मेडम के सेक्रेटरी साह्ब ने ऐसा करने को कहा था।"
मैं उसकी बात का जवाब दिये बिना ही डिप्टी मेनेजिंग की नेम प्लेट लगे कक्ष में दाखिल हो गया। वह काम कर रही थी और मेरी आहट सुनते ही उसने सिर ऊपर किया, मैं हतप्रभ रह गया वह एकदम मेरी तरफ़ देख रही थी। फ़िर बोली-''आप! नहीं मैं यकीन नहीं करती कि आप..................वह झूठ बोल रहा था।''
मैं उसे वहां देखकर आश्चर्य में था''तुम यहां कब आयी।'
वह बहुत खुश होकर बोली-''मैं तीन महिने से यहां हूं और आपका पता ढूंढ रही हूं और पता लगा कि अपने मकान बना लिया है। पहले तो आप बैठिये । मैं कुछ मंगवाती हूं। काम की बातें तो होती रहेंगी। मैं आपको ऐसे तो जाने नहीं दूंगी."
मैंने कहा-''हां। वैसे तुम्हें देखकर बहुत खुशी हो रही है, पर हमें काम पर भी बात करना चहिये क्योंकि बोस इस मामले में आज ही निर्णय करना चाह्ते हैं।"
-''आप बैठो तो सही-" काम की बाते तो होती रहेंगीं, मैं इस समय अपने हैड क्वार्टर से ओनलाइन बात कर रही हूं और उसमें आपकी कंपनी के बारे में भी चर्चा हो रही है। वैसे घर परिवार में सब ठीक है! मेरी प्यारी सहेली के हाल कैसे हैं। मैं उससे मिलना चाहती हूं। उसीको तो ढूंढ रही हूं और आज उसका पति हाथ आ गया तो अब उसे इतनी आसानी से नहीं छोडूंगी।"वह खुश होकर बोली.
मैं बैठ गया। वह ओन लाइन बात कर रही थी और मैं पिछली यादों में खो गया।
वह मेरी पत्नी की बचपन की सहेली थी और हमारे ऐक वर्ष बाद ही उसका विवाह भी हमारे शहर में हुआ। चूँकि दोनों ऐक ही शहर की थी इसलिए ऐक बार उसके विवाह के ऐक माह बाद दोनों अपने मायके भी साथ गयीं थीं । वह विवाह सेपहले ऐक कंपनी में कलर्क थी और यह आश्वासन मिलने के बाद कि उसकी कंपनी उसी शहर में उसका ट्रांसफर कर देगी लड़के वाले शादी को तैयार हुए थेक्योंकि वह कामकाजी लड़की चाह्ते थे। विवाह के बाद वह बहुत दिनों तक परेशान रही और इस दौरान मेरी पत्नी उसका हौसला बढाती , फ़िर ऐक दिन वह और उसका पति शहर छोड़ गये और उसके बाद कोई संपर्क नहीं हुआ पर यह जरूर पता लगा कि दोनों ने अपनी जिंदगी में आगे बहुत तरक्की की है। उसके बारे में जानकारी तभी मिलती जब मेरी पत्नि मायके जाती और उसके घर जरूर जाती और वहीं से जानकारी मिल जाती।
''मैं कल ही आपके घर आउंगी।"वह बोली तो मेरे विचारों कर क्रम टूटा-'आप अपना फोन नंबर दो तो मैं पहले अपनी सहेली से बात कर लूं। उसे यह बताऊँ तो सही मैं यहां हूं।"
हमारी कार्य सबंधित बात भी पूरी हो गयी थी और मैने उसे अपना फोन नंबर दिया और बाहर निकलने लगा तो वह बोली-''हां, आप यह तो बताओ वह मेरा सेक्रेटरी किसकी कहानी सुना रहा था। यकीनन आपकी तो है नहीं, क्योंकि आप जेल तो गये नहीं है क्योंकि मुझे पता पड़ जाती। कहीं अपनी तो नहीं सुना रहा था क्योंकि वह यहां बदनाम है।'
''यह तो उसी से ही पूछ लेना-"मैने कहा और बाहर निकल गया।
वह बाहर ही खडा था और उसका मूंह सूखा हुआ लग रहा था। मुझसे बोला-"वह तुम्हें जानती है?"
मैंने शुष्क स्वर में कहा-''वह मुझे बहुत मानती भी है पर मैने तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहा और न कहूंगा। मगर तुमने अपनी मुसीबत ऐक बार खुद बुलाई है। वह तुम्हें छोडेगी नही क्योंकि मेरी पत्नि से जब मिलेगी तो वह उसे जरूर बताएगी, आज से छह वर्ष पूर्व अपनी नौकरी खोने के बाद किस तरह धमकी दी थी। मैं कोशिश करूंगा वह इसे न बताये पर लगता है तुम्हारे पाप पीछा कर रहे हैं क्योंकि जिस कहानी को मैं भूल चुका था उसे तुमने खुद याद किया है, तुम्हें मेरी चर्चा उससे नही करनी थी, ताकि पुरानी बाते फिर एक बार हमारे सामने न आ सकें।"
मैं वहां से निकल आया और वह वहीं खडा आसमान में देख रहा था।शायद वह समझ गया था की उसने यह दूसरी गलती की है और लगभग वैसी ही जैसे पहले की थी जब उसने अपनी करिस्तानियों का जिक्र अपने मित्र से किया था जिसने प्रबंधन को पूरी बात बता दी थी।
नोट-यह मेरी मौलिक एवं स्वरचित हिंदी कहानी है।

Oct 30, 2007

भले लोगों का तलाश करें ठौर

सामने कुछ कहैं
पीठ पीछे कुछ और
ऐसे लोगों की बातों पर क्या करें गौर
बात काम करें मचाएँ ज्यादा शोर
बोले और पीछे पछ्ताएं
जैसे नाचने के बाद रोए मोर
जिनके मन में नही सदभाव
उनकी वाणी में होता है कटुता का भाव
अपनी पीठ आप थपथपापाएं
अपने दिल का मैल छिपाएं
क्या पायेंगे ऐसे लोगों को बनाकर सिरमौर
उनकी भीड़ में शामिल होने से बेहतर है
अकेले में समय गुजारें
उनके झुंड में रहने से अच्छा है
भले लोगों का तलाश करें ठौर

Sep 3, 2007

अपनी सोच से अपने को बचाओ

विश्वास, सहृदयता और प्रेम हम
ढूंढते दोस्तो, रिश्तेदारों और
अपने घर-परिवार में
अपने मन में कब और कहाँ है
कभी झांक कर देखा है
इस देह से बनी दीवार में

अपने अहं में खुद को जलाए देते हैं
इस भ्रम में कि कोई और
हमें देखकर जल रहा है
लोगों के मन में हमारे प्रति
विद्वेष पल रहा है
कभी अपने मन को साफ नहीं कर पाते
चाहे कितनी बार जाते
सर्वशक्तिमान के दरबार में

कुछ देर रूक जाओ
अपनी सोच को अपने से बचाओ
और फिर अपनी देह में सांस ले रहे
उस अवचेतन की ओर देखो
उससे बात करो
तब तुम्हारा भ्रम टूटेगा कि
कितना झूठ तुम सोच रहे थी
और सच क्या है इस संसार में
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Aug 24, 2007

ऐसा भी होता है-कहानी

उनके दोनो बेटे-बहु प्रतिवर्ष की भांति भी इस वर्ष अपने माता-पिता के पास रहने के लिए आये। अब पति-पत्नी अकेले ही रहते थे। पति अब रिटायर हो गये थे, और दोनों ही सुबह, दोपहर और शाम एक मंदिर में जाते थे। उनके दोनों लड़के पढने के बाद शहर से बाहर नौकरी कर रहे थे और उनकी अच्छी आय थी। अपने माता-पिता से मिलने वह साल में पांच-छ: बार जरूर आते थे पर विवाह के बाद पिछले तीन वर्षों में यह आगमन केवल एक वर्ष तक रह गया था। इधर उनके पिताजी भी रिटायर हो गये थे। रिटायर होने से पूर्व भी पति महोदय दिन में दो बार अपनी पत्नी को सुबह-शाम जरूर मंदिर गाडी पर बैठा कर जरूर ले जाते थे, अब वह क्रम तीन बार हो गया था। उनकी पत्नी अपने मंदिर जाने का प्रदर्शन पडोस में जरूर करतीं और बार-बार अपने धर्मभीरू होने की चर्चा अवश्य करती। और कभी-कभी बिना किसी आग्रह के ज्ञान भी देतीं देती थी। उनका मंदिर घर से दो किलोमीटर दूर था और किसी दिन गाडी खराब हो या पति महोदय का स्वास्थ्य ठीक न हो तो उन्हें अनेक ताने सुनने को मिलते। वह कभी घर से मंदिर तक पैदल नहीं गयीं।


उस दिन वह अपनी बहुओं पर अपना ज्ञान बघार रहीं थीं-"अपने शरीर को चलाते रहना चाहिए, वरना लाचार हो जाता है अब देखो तुम्हारे ससुर कभी नाराज होकर मंदिर नहीं ले जाते तो मैं पैदल ही चली जाती हूँ कभी भी झगडा नहीं करती- अपने पति से कभी भी झगडा नहीं करना चाहिए। बिचारे पुरुष तो जीवन भर कमाने में ही समय गंवाते हैं।"

वगैरह........वगैरह।इधर वह अपने पति के साथ मंदिर गयी और उधर उनकी बहुओं ने पडोसियों से बातचीत शुरू की और फिर उसने सासके दावे की इस तरह सत्यता का पता लगाने का प्रयास किया कि वह बिचारे समझ नहीं पाए ।

एक पडोसन बोली -"हमने तो कभी भी तुम्हारी सास को पैदल जाते हुए नहीं देखा, अगर गाडी खराब हो या उनका मन न हो या उनके कोई रिश्तेदार आ गये हौं तो मंदिर न ले जाने के लिए उनको हजार ताने देतीं हैं। तुम्हारे ससुर तो सीधे हैं सब सह जाते हैं।"

बहुओं की ऑंखें खुल गयीं, उन्हें अपनी सास पर वैसे भी यकीन नहीं था- और अब तो पडोसियों से भी पुष्टि करा ली थी। उन्होने अपने-अपने पतियों को उनकी माँ की पोल बतायी-हालांकि पडोसन ने आग्रह किया था कि वह ऐसा न करे क्योंकि उनके जाने के बाद उनकी सास उनसे लडेगी।

इधर उनके बहु-बेटे अपने घरों को रवाना हुए और उधर वह अपने पडोसियों पर पिल पडी-"तुम लोगों से किसी का सुख देखा नहीं जाता। मेरी बहुओं को भड़काती हो। अब देखना जब तुम्हारे घर में बहुएँ आयेंगी तो मैं भी यही करूंगी।"

एक पडोसन बोली-"हमें क्या पता था कि तुम्हारी बहुएँ चालाकी करेंगी। पता नहीं तुमसे क्या बात नमक मिर्च लगाकर कह गयीं हैं।"

मगर वह नहीं रुकीं और बोलतीं गयी-"तुम लोगों का क्या मतलब? मैं अपनी बहुओं से कुछ भी कहूं। तुन कौन होती हो बीच में दखल देने वाली ....." उन्होने और भी बहुत कुछ कहा और इस तरह सास-बहु का झगडा पडोसियों के मत्थे आ चूका था।

Aug 23, 2007

धूल का प्रतिरोध

बहुत दिन बाद ऑफिस में
आये कर्मचारी ने पुराना
कपडा उठाया और
टेबल-कुर्सी और अलमारी पर
धूल हटाने के लिए बरसाया
धूल को भी ग़ुस्सा आया
और वह उसकी आंखों में घुस गयी
क्लर्क चिल्लाया तो धूल ने कहा
'धूल ने कहा हर जगह प्रेम से
कपडा फिराते हुए मुझे हटाओ
मैं खुद जमीन पर आ जाऊंगी
मुझे इंसानों जैसा मत समझो
कि हर अनाचार झेल जाऊंगी
इस तरह हमले का मैंने हमेशा
प्रतिकार किया है
बडों-बडों के दांत खट्टे किये हैं
जब भी कोई मेरे सामने आया '
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Jun 29, 2007

याद आते हैं शराब के नशे में गुजरे पल

राहुल ने उसके लिए पूछा था-''आंटी, अंकल की आँखें हमेशा लाल क्यों रहती हैं? क्या वह शराब पीते हैं?

आंटी ने कहा-हाँ, बहुत पीते हैं। बेटा तुम ही उन्हें समझाओ न!

राहुल ने कहा-'आंटी, मैं उन्हें कैसे समझा सकता हूँ? वह तो मुझसे बडे हैं उन्हें खुद ही समझना चाहिए। उल्टे हम पीयें तो वह हमें समझायें।"

वह आकर अपने पति से लड़ने लगी-"देखो पड़ोस का बच्चा भी तुम्हें शराबी के तरह देखता है, कितने शर्म की बात है? हम लोगों को क्या समझाएं

वह चुपचाप सुनता रहा। उसने पीना नहीं छोडा। रोज शाम को काम से आने के बाद उसका पीना शुरू हो जाता था । बरसों तक वह दौर चला, परिवार और रिश्तेदारों में भी वह बदनाम हो गया था। एक बार राहुल ने उससे कहा था-" अंकल दिन-ब-दिन आपका चेहरा काला पड़ता जा रहा है । क्या आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, किसी डाक्टर को दिखाईये न !

वह उसका मंतव्य समझ गया, पर फिर भी अपने नशे से उसे इतना प्यार था कि वह हर बात को बेशर्मी से टाल जाता था।

मगर आज वह ऐसा नहीं था। आज राहुल ने उसे वायरलेस इयर फोन देते हुए कहा-"अंकल, लीजिये यह इयर फोन मैं आपके लिए लाया हूँ । अभी तक ईमेल के जरिये ही संपर्क रखते हैं , कितनी बार आपको चैट के लिए ट्राई किया पर आप लाईन पर होते है और अपने लिखने में इतना व्यस्त रहते हैं कि ध्यान ही नहीं देते। अब मैं यह आपके कंप्यूटर में लगा कर जा रहा हूँ , और आप और आंटी मुझसे बात करियेगा। में आपका लिखा इन्टरनेट पर पढता हूँ और चाहता हूँ कि आपसे बात भी करता रहूँ।"

फिर वह आंटी से बोला-"क्या बात है अंकल एकदम बदल गये हैं, कंप्यूटर पर लिखने लगे हैं , और चेहरा तो पहले से कहीं ज्यादा खिलने लगा है । मैं तो अंकल को देखकर हैरान रह गया।

वह बोलीं-"अब तुम्हारे अंकल ने शराब छोड़ दीं है और योग साधना और ध्यान में मस्त रहते हैं , और फिर आजकल यह इण्टरनेट पर लिखने लगे हैं और पीना तो भूल ही गये हैं। काम से वापस आते ही लिखने बैठ जाते हैं।

" हाँ, मैंने इनके लिखे लेखों को देखकर समझ लिया था, इतना लिखते हैं तो पीने के लिए समय ही कहॉ मिलता होगा। "राहुल खुश होकर अंकल की तरफ देखते हुए बोला।

उसने राहुल से वायरलेस इयर फोन हाथ में लिया और मैं उसे देख रहा था, मुझे याद आते हैं वह पल क्योंकि वह मैंने ही जिए थे। मैं खुद हैरान था और सोच रहा था 'क्या वाकई वह मैं ही था।'

Apr 21, 2007

बडे लोग ही करते हैं छोटी हरकतें

इस देश कि सबसे बड़ी समस्या क्या है? भ्रष्टाचार, बेकारी भुखमरी, पेयजल का संकट , बिजली की कमी या खाद्धान्न का अभाव । जीं नहीं यह समस्या नहीं हैं बल्कि हमारी अज्ञानता, संकीर्ण विचारों, अदूरदर्शिता और लापरवाही से उपजी उस समस्या का परिणाम है जिसने बोने चरित्र के लोगों को ऊंचे पदों पर पहुंचा दिया है और भले काम को संपन्न करने का ठेका निम्न चरित्र के लोगों को मिलने लगा है। इस देश की समस्या है सज्जनों की निष्क्रिय सज्जनता और बुद्धिजीवियों का यथास्थ्तिवादी रवैया है। सज्जन आदमी किसी भी घटना पर यह सोचकर चुप हो जाता है कि मेरे साथ कोई वारदात थोड़े ही हुयी है, और बुध्दिजीवी किसी घटना पर जो बहस करते हैं उसमें केवल सतही विचार व्यक्त करते हैं और आख़िर उनके वार्तालाप पर कोई निष्कर्ष नहीं निकलता।
अब तो यह हालत हो गयी है कि हर प्रकार के छोटे और बडे अपराध में तथाकथित बडे लोगों का हाथ निकलता है। मैं किसी घटना का जिक्र इसलिये नहीं करता क्योंकि उससे चिन्तन कि धारा संकीर्ण हो जाता है और वह एक घटना में सीमित होकर रह जाता है । मानव तस्करी, अनैतिक संबंध और अपराधियों से नजदीकी रिश्ते जैसे आरोपों से सभी तथाकथित बडे लोगों पर ही लगे हैं और आजकल लड़कियों की मोहब्बतों की कथाओं में जुटा मीडिया इन पर कभी खुलकर बहस नहीं करता । आख़िर विदेशों में बैठे अपराधी क्या केवल शासकीय कर्मचारियों और अधिकारीयों के दम पर ही सारा कारोबार चला रहे है? मीडिया में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह किसी का नाम ले सके, घर से भागी लड़कियों को अपने माता-पिता के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते दिखाने में उसे मजा आ रहा है । जिनके घर की लडकियां भाग जाती हैं उनके माता-पिता की क्या हालत होती है इसका ख़्याल उसे नहीं रहता । सज्जन लोग अपनी इज्जत के भय से दुबक जाता है, और मिडिया उसे इश्क का दुश्मन और जाने कौनसे शब्दों से नवाज्ता है। क्रिकेट में भारत की हार की समीक्षा करते समय कयी ऐसे पहलू मीडिया ने छुए तक नहीं जिनपर जनता को संदेह था। मैं उसे भी दोष नहीं देता क्योंकि उसमें भी वही लोग काम जिन्होंने मैकाले द्वारा रचित शिक्षा प्रणाली से अपना जीवन शुरू किया है और क़सम खा रखी है कि क्लर्क की तरह ही काम करेंगे ।
आजादी के बाद नारों की जो नयी संस्क्र्ती इस देश में बनना शुरू हुई तो उसने धीरे धीरे गंभीर चिंतन की प्रवृति को समाप्त ही कर दिया। जो लोग शिक्षित हुए उन्हें क्लर्क बनने की पंक्ति में लगा दिया और जो महत्वाकांक्षी थे उनके लिए बडे प्रशासकीय पदों का सृजन कर उन्हें सुशोभित किया गया। तब तक इस देश में परिवार वाद का भाव नहीं पनपा था और इसीलिये बडे लोगों ने अपना बड़प्पन बनाए रखने के लिए जनता के भलाई के लिया कम किया पर मैकाले ने जो सपना इस देश में जो क्लर्क पैदा करने का सपना देखा था उसे इस देश के शिक्षाविदों ने जारी रखा। जब बौध्दिक निष्क्रियता की प्रवृति स्थापित हो गयी तो शुरू हो गया परिवारवाद और भायी-भतीजावाद का दौर - और फिर उनकी रक्षा के लिए हर संभव प्रयास किये जाने लगे। बोने चरित्र के लोगों ने इसका लाभ उठाया और अब जो चित्र हमारे सामने है वह यह है कि भला आदमी सब तरफ से आतंक के साए में जीं रहा है और बोने चरित्र और विचार वाले लोग ऊंचे पदों पर पहुंच गये इसका एक ही उपाय है सज्जन अपनी सज्जनता को भय के साथ नहीं वरन हिम्मत के साथ जिए और बोने चरित्र वाले लोगों का सम्मान करना बंदकर दे ।