Apr 3, 2017

गज़ब उनकी खामोशी दिल को लुभाती है-हिन्दीक्षणिकायें (Gazab unki Khamoshi lubhati hai-ShortHindiPoem)

नाव चली लहरों से लड़ने
किनारा मिला नहीं
मांझी ने ही किया छेद
इसलिये डूबने का
हुआ गिला नहीं
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गज़ब उनकी खामोशी 
दिल को लुभाती है।
तारीफ  के काबिल
उनका नज़र डालना
जो फूल भी चुभाती है।
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नाम तो बड़े सुने
छोटे दर्शन से सिर धुने।
थक गये यह सोच
कब तक ख्वाब बुने।
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बंद कमरों की गप्पबाजी
कभी बाहर नहीं आती।
राई को ढके पर्वत
यही राजनीति बताती।
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घर से बाहर आते
पर दिमाग के द्वार बंद हैं।
ताजगी की अनुभूति में
उनकी संवेदनायें मंद हैं।


दिल पढ़ा नहीं
आंखें देखकर
श्रृंगार पद रच डाला
अर्थरहित स्पंदहीन
शब्द हुआ मतवाला।
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समाज सेवा के ठेके
वादों पर मिल जाते हैं।
नकली जुबानी जंग से
लोग यूं ही हिल जाते हैं।
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बंदर जैसी उछलकूद
करते रहो
लोग समझें बंदा व्यस्त है।
कुछ नहीं कर पाओगे तुम
इसलिये हौंसला बढ़ाओ
उन लोगों का
जो पस्त है।
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अपनी बात इशारों में
शेर कहकर लिखते हैं।
मन भी होता हल्का
शालीन भी दिखते हैं।
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विकास के रास्ते
तांगे से कार पर
सवार हो गये।
जज़्बातों से ज्यादा
सामानों के यार हो गये।
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एकांत मे भी अकेले
कहां होते हम
अपना अंतर्मन जो साथ होता।
मौन से मिलता वह
वरना कोने में बैठा रोता।


चांद और सूरज से
तुलना न कीजिये।
अंधेरा को चिराग ही पहचाने
रौशनी का मजा यूं ही लीजिये।
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घर सामान से भरे हैं,
दिल जज़्बात से डरे हैं।
शोर करते भीड़ में लोग
अकेलेपन से डरे हैं।

Mar 22, 2017

हर ताबूत में एक बुत भरा है-दीपकबापूवाणी (Har tabut mein ek but Bhara hai-DeepakBapuWani)

जहान के सहारे से अपनी जरुरत धरे, दिल में मदद का ख्याल रखे परे।
‘दीपकबापू’ बंजर जमीन पर खड़े होकर, श्रमहीन सोना पाने की चाह करे।।
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आमजन जन्मदिन याद नहीं रखता, खास की तरफ हर कोई तकता।
‘दीपकबापू’ लिख कथा मिटा देते, प्रेम शब्द कोई हिसाब नहीं रखता।।
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घुमाफिरा कर अपनी बात कहते हैं, सच के साथ डरकर रहते हैं।
‘दीपकबापू’ कायरों के जमघट में, सभी मुर्दों की कहानी कहते हैं।।
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हर ताबूत में एक बुत भरा है, जिंदगी में हारने से हर कोई डरा है।
‘दीपकबापू’ मस्ती खरीदें बाज़ार से, फिर भी दिल बोरियत में मरा है।।
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सच है लातों के भूत बातों से न माने, जब प्यार करो तो घूंसा ताने।
‘दीपकबापू’ मानवाधिकारों के चिंतक, भले बुरे इंसान में फर्क न माने।।
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तिलक लगाकर चलें भक्त कहलाते, नृत्य गायन से दिल आसक्त बहलाते।
‘दीपकबापू’ भक्ति की पहचान रंग बनाये, तस्वीर दिखा सदा वक्त टहलाते।।
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उनके अपने दिमाग एकदम हिले हैं, दूसरे इंसानो से बहुत शिकवे गिले हैं।
‘दीपकबापू’ घर से निकले लालच के साथ, सामने ताकतवर लुटेरे मिले हैं।।
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जीतें तो  तेजी से अपना कोष  बढ़ायें, हारें तो मैदान पर रोष चढ़ायें।
‘दीपकबापू’ खिलाड़ी होकर अक्ल खो दी, कर्म का भाग्य पर दोष मढ़ायें।
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सिंहासन पाने के लिये चलाते अभियान, जलकल्याण पर देते नये बयान।
‘दीपकबापू’ पांव पर चलाते बितायी जिंदगी, दर्द भूल जाते चढ़ते ही यान।।
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Feb 12, 2017

सौदे की वफादारी एक साल-हिन्दी व्यंग्य कविता (saude ki vafadaari ek saal-HindiSatirePoem)


सामानों से शहर सजे हैं
खरीदो तो दिल भी
मिल जायेगा।

इंसान की नीयत भी
अब महंगी नहीं है
पैसा वफा कमायेगा।

कहें दीपकबापू बाज़ार में
घर के भी सपने मिल जाते
ग्राहक बनकर निकलो
हर जगह खड़ा सौदागर
हर सौदे की वफादारी 
एक साल जरूर बतायेगा।
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एक दूसरे पर
सब लफ्जों से बरसे हैं।
जुबान पर गालियों के 
एक से बढ़कर एक फरसे हैं।

नासमझों की भीड़ खड़ी
कब जंग होगी 
कब बहेगा लहू
दूश्य देखने के लिये
सभी बहुत तरसे हैं।
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Jan 16, 2017

फिल्म और क्रिकेट में सब चलता है यार-हिन्दी व्यंग्य (Everithing good in Hindi Film and Cricket Match-Hindi Satire Article)

            पहलवानी पर बनी फिल्म में नायिका का अभिनय करने वाली ने कहा है कि ‘मुझे कश्मीर के युवा अपना आदर्श न समझें।’
           उसने इस फिल्म को नारी विषयों पर प्रेरक मानने वाले लोगों के गाल पर करारा तमाचा जड़ा है। हमने टीवी, अखबार तथा सामाजिक जनसंपर्क पर इस फिल्म के गुणगान करने वालों पर तरस आ रहा है।  बिचारे क्या कह रहे थे कि इस प्रेरणा से नारियों को प्रेरणा लेनी चाहिये और अभिनय करने वाली नायिका ने ही कहा दिया कि ‘इस फिल्म को भूल जाओ।’
          उसने बहुत समय बाद यह बात कही है। अब तक भारतीय दर्शक अपना पैसा खर्च कर चुके हैं।  निर्माता निर्देशक पैसा वसूल कर चुके हैं। यही लोग दांव पैंच लगाकर उसे पुरस्कार भी दिलाते रहेंगे। इस फिल्म का चाकलेटी नायक अंतर्राष्ट्रीय पहुंच वाला है इसलिये संभावना है कि यह ऑस्कर भी चली जाये।  हमें शुरु से ही पर्दे पर अभिनय करने वालों की वक्तव्यकला के साथ बौद्धिक क्षमता पर भरोसा नहीं है। वह दूसरे का लिखा पढ़ते हैं जिसकी कीमत भी वसूल करते हैं। उनमें आदर्श या प्रेरणा ढूंढने वाले भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में वर्णित सिद्धांतों को नहीं जानते। हम तो देह सहित उपस्थित मनुष्य को ही कल्पित मानते हैं तो फिर पर्दे के पात्रों में सत्य ढूंढने की तो सोच भी नहीं सकते। 
                  उस नायिका ने वहां की मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद-जिसके बाद सामाजिक संपर्क प्रचार माध्यमों में उस पर छींटाकसी हुई थी-उठे बवाल पर उसने माफी मांगी है। दरअसल उसने वहां की मुख्यमंत्री से मुलाकात पर माफी मांगी है-जिसे प्रचार माध्यमों के विद्वान अपने अपने ढंग से ले रहे हैं। तय बात है कि हम भी अपनी ढंग से ही लेंगे।
              हमें उसका माफीनामा उसकी फेसबुक पोस्ट की तरह  शुद्ध रूप से राजनीति से प्रेरित लगता है। अगर कश्मीर के युवा युवतियां उसे आदर्श मान रहे थे तो  वहां उपस्थिति धार्मिक विघटनकारियों के लिये चिंता की बात हो सकती -जिन्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिये  भारत में मौजूद तत्वों से भी मदद मिलती है। वह एक सफल फिल्म की अभिनेत्री है अतः उसके पास इतना धन तो आ गया होगा कि वह मुंबई में बस जाये पर जैसा कि उसने माना कि वह आयु में छोटी है इसलिये माता पिता के बिना यह संभव नहीं है।  यकीनन उसके माता पिता पर भी कहीं से दबाव आया होगा-अब भले ही उस नायिका के बयान में कहा जाये कि उस किसी का दबाव नहीं है। उसने अपने बयान में पिछले छह महीनों की हालत का जिक्र किया है-अधिक विवरण नहीं दिया-जिससे यह साफ लगता है कि पत्थरबाजी की घटना के बाद वहां जो तनाव व्याप्त हुआ है वह उसकी तरफ इशारा था।
                 इस बात की संभावना भी लगती है कि उसके संरक्षक अब फिल्म उद्योग को अप्रत्यक्ष रूप से यह समझा रहे हों कि अब दूसरी फिल्में भी दो वरना हमारी अपनी एक मौलिक विचाराधारा भी है जिस पर हम चल सकते हैं। उसे कोई दूसरी फिल्म मिली है इसकी जानकारी नहीं है इसलिये अनुमान के आधार पर यह हम कह रहे हैं।  पहलवानी में भारत के लिये नाम रौशन करने वाली जिस वास्तविक नायिका की कहानी पर यह फिल्म बनायी गयी थी उसने भी मामला समझे बिना पर्दे की नायिका को समर्थन दिया पर हमारी समझ में नहीं आया कि इसकी जरूरत क्या थी जो प्रचार प्रबंधकों ने उससे सवाल किये। धरातल के यह वास्तविक नायक पर्दे के अभिनेताओं का खेल नहीं जानते-यह बात तय है। 
               हमें तो फेसबुक पर पहले पोस्ट डालने फिर उसे हटाने के प्रकरण में नारियों की समस्याओं से अधिक राजनीति  के साथ ही व्यवसायिक कौशल की चाल भी दिख रही है और भाई लोग इसे परंपरागत ढंग से वहीं ले जा रहे हैं। अभी बताया जा रहा है कि उसने फेसबुक से अपनी इस संबंध में सारी पोस्ट हटा ली है। तब सवाल आता है कि दबाव पहले था या अब है।  समझना मुश्किल हो रहा है कि अगर पहले यह दबाव नहीं होता तो फेसबुक पर माफीनामें वाली  पोस्ट डालती क्यों? या अब यह समझाया जा रहा है कि अब दबाव पड़ा तो हटाई है। वरना अगर पहले दबाव इतना प्रभावी होता तो अब हटाती क्यों?  कहीं यहां प्रचार माध्यमों में अपना नाम लाने की कोशिश नहीं है। सच यह है कि हम इस फिल्म की नायिका का नाम तक नहीं जानते थे। न फिल्म देखी न देखने का इरादा है।  ज्यादा माथापच्ची करने पर हमारे दिमाग में एक ही नारा आता है जिसके जनक हम ही हैं-फिल्म और क्रिकेट में सब चलता है यार!


Nov 4, 2016

भक्तगण ट्रम्प की हिलेरी पर बढ़त का आनंद लेकर अपने भारी मन हल्का कर सकते हैं (Bhakt now Enojoy Trumb Lead on Hilary in Preapol Sevrve)


                             आत्महत्या के कारण प्रतिकूल वातावरण से घबड़ाये भक्तगणों को अब ट्रम्प की तरह अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिये जो राष्ट्रपति चुनाव के पूर्व सर्वेक्षणों आगे चल रहे हैं। भक्तगण सीमित दायरे में रहते हैं इसलिये देश के हालतों में जब प्रचार प्रतिकूल होता है तो गुस्सा और दुःखी होते हैं पर उन्हें पता नहीं कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस समय वातावरण ऐसा ही है।  ट्रम्प अगर जीतते हैं तो सबसे ज्यादा परेशानी सऊदी अरब को आनी है जो पाकिस्तान के लिये संकट की बात होगी।  उधर पाकिस्तान का दूसरा सहयोगी तुर्की भी रूस से पंगा ले चुका है। यह पहला अवसर है कि रूस खुलकर अमेरिकी चुनाव में दखल देते हुए ट्रम्प को राष्ट्रपति के रूप में देखना चाहता है क्योंकि वह अरेबिक विचारधारा के खुले विरोधी हैं-प्रसंगवश उन्हें हिन्दूजीवन शैली में सकारात्मक दिलचस्पी है-और ऐसे में सऊदीअरब तथा तुर्की अमेरिका के बिना ज्यादा आक्रामक नहीं रह पायेंगे। इधर इन दोनों का पसंदीदा आतंकवादी संगठन आईएस भी तबाही की तरफ बढ़ रहा है पर उसके बाद अपने पापों के जो नतीजे इन दोनों देशों को भोगने ही होंगे तब इनका कथित आतंकवादी वैचारिक सम्राज्य भी टूटेगा जो हमारे देश के लिये अब एक खतरा बन चुका है। 
          याद रहे ट्रंप हिन्दुओं के समर्थक हैें और जिस तरह उनका समर्थन अमेरिका में हिलेरी के मुकाबले बढ़ रहा है उस पर भारत के पंथनिरपेक्ष की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है क्योंकि मानवाधिकारों के मामले में तब उसे आदर्श नहीं मान पायेंगे।
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                      भारत के समाचार चैनलों लाशों पर राजनीति के समाचार और फिर उन पर बहस के बीच विज्ञापनों का धंधा देखकर बोरियत हो रही है।  अब यह साफ लगने लगा है कि समाचारों के व्यापार का आरोप नेता खुले में नहीं लगाते क्योंकि कहीं न कहीं सभी प्रचार प्रबंधकों के ग्राहक हैं। यही कारण है कि प्रचार प्रबंधक इस बात की परवाह नहीं करते कि जनता किस तरह के समाचार चाहती है बल्कि वह इसका प्रयास अधिक करते हैं कि अपने ग्राहकों के समाचार जनता को देखने के लिये बाध्य करें।  सभी चैनल फ्री हो गये हैं और उन्हें बेतहाशा विज्ञापन मिल रहे हैं। विज्ञापनदाता भी राज्यप्रबंधकों का प्रचार चाहते हैं ताकि यह नहीं तो वह पद पर विराजे ताकि उनका काम चलता रहे।  यह एक चक्र हैें जिसमें आम आदमी की स्थिति केवल वोट देने से अधिक नहीं है।

Oct 15, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक का मजा खत्म, अब पेट्रोल व डीज़ल के भाव पर चर्चा करो-हिन्दी व्यंग्य आलेख (End of Enjoyment of Surgicla Strike,Now Start disscusion on rate hike in Petrol and Diesal-Hindi Satire Article)

                     सर्जिकल स्ट्राइक का मजा अब खत्म! पेट्रोल और डीज़ल के भाव बढ़े अब चैनल वाले इस पर चर्चा करेंगे। पेट्रोल और डीजल के भावों का महंगाई से अजीब संबंध है। इनके भाव बढ़ें तो सभी चीजों के भाव बढ़ते हैं पर कम होें तो कोई कमी नहीं आती।  अब पेट्रोल के भाव बढ़े हैं तो यकीनन अनेक लोग अपनी चीजों के भाव बढ़ा देंगे।  स्थिति यह है कि पेट्रोल पर एक या दो रुपया बढ़ता है लेकिन चीजों के भाव एकदम पांच से सात और सात से दस हो जाते हैं।  तमाम तरह की बहसें चलती हैं पर मध्यम वर्ग के लिये कहीं सुविधाजनक स्थिति नहीं है।  मध्यम वर्ग के अनेक लोग निम्न वर्ग में पहुंच गये हैं पर  मानते नहीं, अभी भी अपने मान सम्मान के लिये कर्जा लेकर संघर्ष कर रहे हैं।  यही वर्ग बहसों का मजा लेता है और अब उसके  लिये सर्जीकल स्ट्राइक की खबर बासी हो गयी है।
         कुछ देर पहले हम पार्क में थे। वहां एक सज्जन दूसरे से सर्जीकल स्ट्राइक पर चर्चा कर रहे थे कि एक तीसरा आदमी आया और बोला-‘भईये, भूल जाओ सर्जिकल स्ट्राईक। आज पेट्रोल और डीजल के दामों ने आगे बढ़कर अपने बजट पर सर्जीकट स्ट्राईक कर दिया। फिर सारी चीजों के दाम बढ़ेंगे।’
            हम जैसे व्यंग्यकार बहुत सुनते हैं पर कम गुनते हैं पर कभी कभी कम सुनकर भी अधिक बुन लेते हैं।  सर्जिकल स्ट्राइक, तलाक, समान नागरिक संहिता जैसे विषय तो नेपथ्य में चले ही जायेंगे। इधर ब्रिक्स सम्मेलन के समाचार भी आभा खो बैठेंगे-भले ही आप इसमें पाकिस्तान को कितना जलील कर लो पर कल तो खबर के साथ जनचर्चा का विषय पेट्रोल और डीजल के दाम ही होंगे। आप लाख देशभक्ति और धर्म रक्षा का पाठ पढ़ाओ पर अगर मध्यम वर्ग की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होगी तो उसका प्रभाव क्षणिक रहता है-उसमें मन में स्थाई भाव नहीं रहता।
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Sep 27, 2016

वाह री माया तेरा खेल, महल के बाद भेजे जेल-हिन्दी रचना (Vaah ri maya tera khel,mahal ke bad Bheje jail-HindiRachana)

                               जिस तरह दीपक के नीचे अंधेरा होता है ठीक उसी तरह माया के पीछे वीभत्स सत्य भी होता है। अपने आकर्षण में फंसाकर सदैव मनुष्यों को अपनी पीछे दौड़ाती है पर जब किसी को अपने पीछे का भयानक सत्य दिखाती है तो वह डर जाता है। बड़े बड़े तपस्वी राम का दर्शन नहीं कर पाते पर भोगी भी कहां माया को देख पाते हैं। एक से दस, दस से सौ, और सौ से हजार के क्रम में माया इंसान को अपने मोहपाश में फंसाकर भगाती जाती है। आदमी हमेशा ही यह सोचता है कि माया अभी उसके हाथ नहीं आयी। कभी कभी माया ऐसा प्रहार भी करती है कि पूरा का पूरा परिवार चौपट हो जाता है।
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                          नोट-भ्रष्टाचार की चर्चा हमारे यहां बहुत होती है। ऐसे लोग भी भ्रष्टाचार को लेकर रोते हैं जो स्वयं ही इसमें लिप्त हैं। अनेक लोग अनाधिकृत पैसा अधिकार की तरह लेते हैं। जो पकड़े नहीं गये वह तो साहुकार होते हैं पर जो रंगे हाथों पकड़े जाते हैं उन्हें सभी चोर कहते हैं। आत्मग्लानि या कुंठा से चौपट हुए एक परिवार की कहानी देखकर तमाम विचार आये। कहना पड़ता है कि-
वहा री माया तेरा खेल,
घी चखे जिसने देखा न तेल।
रास्ते से उठाकर पहुंचाये महल
कभी कभी पहुंचाती जेल।
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नोट-अगर कोई टीवी चैनल वाला  किसी विषय पर हमें आमंत्रित करना चाहे तो हम कभी  भी दिल्ली आ सकते हैं।
संपर्क-.दीपक राज कुकरेजा
Mobil Number-8989475264,9993637656,8984475367

गज़ब उनकी खामोशी दिल को लुभाती है-हिन्दीक्षणिकायें (Gazab unki Khamoshi lubhati hai-ShortHindiPoem)

नाव चली लहरों से लड़ने किनारा मिला नहीं मांझी ने ही किया छेद इसलिये डूबने का हुआ गिला नहीं ---- गज़ब उनकी खामोशी  दिल को लुभ...