अंधविश्वास के विरुद्ध
जंग करते हुए उनका दावा है कि
वह लाना चाहते हैं समाज में चेतना,
कोई ढोंगी न ले पैसा
भले ही हर ले लोगों की मुफ्त में वेदना।
कहें दीपक बापू
एक तरफ है ढोंगी
जो अंधे विश्वास पर रोटी पका रहे हैं,
दूसरी तरफ भी हैं पाखंडी
कल्याण के वादे करते हैं
फिर अपनी तिजोरी भरते हैं
बरसों से उम्मीद का रास्ता दिखते हुए थका रहे हैं,
भोंपू बजाने वालों की दोनों तरफ चाँदी है,
प्रसिद्धि के लिए चलती चारों तरफ विज्ञापन कि आँधी है,
अंधविश्वास से लड़ रहे हैं वह लोग ज़ंग,
प्रचार जगत में खड़े खड़े उड़ गए जिनके रंग,
क्रिकेट, फिल्म और धारावाहिकों में पकने वाले
खयाली पुलाव अब बासी हो गए हैं,
एक अंधविश्वासी के कारोबारी की कामयाबी में
सपने बेचने के सौदे कहीं खो गए हैं,
ढोंग पर चलती बहस में रुक रुककर
सरल हो जाता हैं पाखंड बेचना,
मुश्किल है अंधविश्वास और पाखंड के गठजोड़ को
किसी भी हाल में भेदना।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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