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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


Aug 3, 2016

नारों पर पका रहे खाना-हिन्दी कविता(Naron par Paka rahe Khana-Hindi kavita

देख था उनका चेहरा
लगा कि वह
चमका देंगे ज़माना।

उनके बोल सुनकर लगा
जिंदगी में हो जायेगा
आसान सांस पाना।

कहें दीपकबापू नारों पर
पका रहे सभी का खाना
बांट रहे कल्याण का दाना
उनके फैलाये यकीन के
जाल में कभी दिल न फसाना।
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Jul 18, 2016

भावनाओं की मौत-हिन्दी शायरी (Bhavnaon Ki Maut-HindiShayari)


उनके घर का दरवाजा
अधिकतर बंद रहा था
फिर भी आंखें
उसकी तरफ ताकती थीं।

वह कभी नहीं आयेंगे
इस खबर ने
हृदय की भावनाओं को
मौत की नींद सुला दिया
जो उनका चेहरा 
देखने की प्रतीक्षा में
बाहर झाकती थीं।
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Jul 17, 2016

समय की चाल पहचानी न जाये-दीपकबापू वाणी (Samay ki Chal Pahchani n jaye-DeepakBapu Wani)

एक इंसान तोड़ता भरोसा दूसरा आता है, साथ अपने नया भरोसा लाता है।
वफा से ज्यादा कीमती हो गयी बेवफाई, ‘दीपकबापू’ जो समझा मजा पाता है।
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पल पल में आदमी का बदलता मन, दुःख में कुम्हलाये सुख में फूले तन।
‘दीपकबापू’ किसी से न करें प्रेम या बैर, मिट्टी के बोलते बुत सभी जन।।
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समय की चाल पहचानी न जाये, इंसान की अक्ल मतलब पर जाये।
‘दीपकबापू’ न अमृत देखा न विष, जीभ तो दाना देखकर ललचाये।।
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संपूर्ण जीवन कमाने में लगाते, भूख की सीमा रोटी से आगे बढ़ाते।
‘दीपकबापू’ अपना अस्तित्व खोकर, फिर जिंदा रहने के सबूत जुटाते।।
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दोनों हाथ से मुद्रा का स्वाद चखते, घड़ी में बीते पल याद नहीं रखते।
‘दीपकबापू’ सूंघते स्वार्थ का फल, पेट खाता कम बाग में ज्यादा पकते।।
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सहन करते जीवन अगर युद्ध होता, शत्रु भी सह लेते अगर शुद्ध होता।
‘दीपकबापू’  ज्ञानियों की सभा में बैठे, सुन लेते अगर कोई प्रबुद्ध होता।।
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धरती आसमान के हिस्से किये, टुकड़ों के राजा अपने किस्से जिये।
‘दीपकबापू’ इतिहास रखा मौन, आमजन ने जो खून के हिस्से दिये।।
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समाज सेवकों का जमघट लगा है, नींद लेते हर कोई जगा है।
‘दीपकबापू’ बहरुपिये का वेश बनाया, नैतिक ठेकेदारों ने ठगा है।।
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Jul 1, 2016

भिखारी और राजा-हिन्दी कविता (Begger and King-HindiPoem,Bhikhari aur Raja-Hindi Kavita)

वह भिखारी मंदिर के बाहर
चप्पल के सिंहासन पर बैठा
पुण्य क्रेता ग्राहक की
प्रतीक्षा में बैठा
आनंदमय दिखता है।

वह बादशाह महल में
सोने के सिंहासन पर
प्रजा की चिंता में लीन
असुरक्षा के भय से दीन
चिंतामय दिखता है।

कहें दीपकबापू मन से
बनता संसार पर नजरिया
आंखों से केवल दृश्य दिखता है।
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Jun 16, 2016

चैतन्य का साझीदार-हिन्दी व्यंग्य कविता (Chaitnya ka Sajhidar-Hindi Satire poem)


नशे में जिंदगी
ढूंढने वालों पर
तरस आता है।

मस्त रहते
मानो मदहोशी में
स्वर्ग बरस जाता है।

कहें दीपकबापू दिल के दर्द से
छूटकारा दिला सके
ऐसी दवा बनी नहीं
चैतन्य का साझीदार
अंदर ही रस पाता है।
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