भारत चीन सीमा पर गोली चलाने की खबर सात दिन बाद आये तो समझ लो वहां नित कुछ बड़ा चल
रहा है।
------------------
विरोधी नेता एवं पत्रकार एकदम चीन का मोर्चा संभाल रहे
हैं। मोदी कभी चीन का नाम नहीं लेते? सीमा में चीन अंदर घुस आया है उसे बाहर कब
करोगे? सरकार सीमा की सही स्थिति क्यो नहीं बताती? इन सवालों का जवाब चीन उगलवाना
चाहता है। आज विदेशमंत्रालय ने साफ किया कि छह माह से चीन की तरफ से भारतीय सीमा
में घुसपैठ नहीं हुई। अब बताईये अगर यह सरकार आधिकारिक रूप से यह बात बाहर कहेगी तो
दूसरे सवाल आयेंगे। हमारा मानना है कि भारतीय सेना कुछ ऐसा कर रही है जिसे
सार्वजनिक करना शायद अभी ठीक नहीं है। उसने चीन की ताकत सूंघ ली है। चीनी सोशल
मीडिया रूस को कोस रहा है, इसका मतलब यह कि कुछ ऐसा हुआ है कि जो चीन के लिये
कष्टदायी है। सच यह है कि 1़962 में चीन ने भारतीय नेताओं का दबाकर चीन के सामने
घुटने टिकवाये थे वही अब चीन से कह रहा है कि तुम घुटने टेको। उसका हुकुम मानने की
ताकत चीन में नहीं है। नहीं मानेगा तो भारत से होने वाली पिटाई से उसकी पूरी इज्जत
खराब होगी। कम से कम वह इस बार कैलाश मानसरोवर जरूर गंवायेगा। उसे पहले तय सीमा से
काफी पीछे जाना पड़ेगा। शीजिनपिंग के सैनिक अधिकारी उन्हें सही जानकारी नहीं दे रहे।
भारतीय सेना बहुत दूर तक निकल गयी है या पहुंचने वाली है। इसका कारण यह है कि स्वयं
को एकमेव सर्वोच्च मानने वाले जिनपिंग अपनी सेना और पार्टी के पदाधिकारियों की
पदोन्नति के अवसरों को अवरुद्ध कर दिया है वही चाहते हैं कि शीजिनपिंग पिटे तो
हमारा रास्ता खुले। भारत में विरोधी सवाल पूछ रहे हैं पर भारत का कोई अधिकारी कैसा
बता सकता है कि उसके सैनिक कैसे लड़ रहे हैं? विश्व में सौम्य दिखना है तो अपनी
आक्रामकता छिपानी पड़ती है। मोदीजी की जिनपिंग से 18 मुलाकातें की हैं, और वह समझ
गये हैं कि इस आदमी का सच क्या है? तानाशाही का यही परिणाम होता है कि एक व्यक्ति
सबकुछ होता है उसके दोष का कोई भी फायदा उठाकर पूरे देश को जीत सकता है।
--------------------
भारत चीन विवाद में भारत के रणनीतिकार प्रतिकियात्मक बयान दे
रहे हैं। सेना से कहते हैं कि आक्रामक रहो स्वयं सुरक्षात्मक रहना चाहते हैं। मोदी
जी चीन को यह बता दें कि भारत तिब्बत को उसका हिस्सा नहीं मानता। अभी अरूणांचल के
लिये जूझ रहा चीन सीधा हो जायेगा। याद रहे चीन तभी से आक्रामक हुआ है जब से भारत ने
तिब्बत पर चीन का आधिपत्य स्वीकार किया है। यह शुभ कार्य स्वयगीय प्रधानमंत्री
राजीवगांधी ने किया था। आजतक लोगों का यह समझ में नहीं आया था यह उन्होंने क्यों
किया? समझौत में लिया दिया जाता है पर उन्होंने तो सबकुछ दे दिया। चीन को पस्त करने
के विषय में एक समस्या मोदी जी के सामने दूसरी भी है। भारत के वार्ताकार नयी शिक्षा
से सराबोर हैं। धर्मनिरपेक्ष दिखना चाहते हैं। चीन तो चार पांच सो साल पुराने कागज
ले आता है पर यह वार्ताकार हिन्दूत्ववादी होने के डर से प्राचीन भारतीय ग्रंथ नहीं
ले जा सकते जिसमें मानसरोवर स्पष्टत भारत का हिस्सा माना जाता है। एक बार मोदी जी
चीन को बता दें कि यह तो हमारे भगवान शिव का स्थाई वास है यह हमारा है पर शायद न कह
पायें। इस पर पूरी दुनियां में उन पर हिन्दुत्ववादी होने ठप्पा लग जायेगा। भारत के
ही उदारवादी चिल्लायेंगे कि यह कल्पना है। मगर मोदी मोदी हैं। उनके तरकश में उससे
ज्यादा वैचारिक तीर हैं जो शायद आज किसी अन्य देश के राष्ट्रध्यक्ष के पास नहीं
होंगे। भारत-चीन प्रचार युद्ध में ऐसा पहली बार हो रहा है कि चीन के गलवान टाइम्स
की धमकियों का प्रभाव बौद्धिक जनमानस पर नहीं पड़ रहा है। पहले उसकी एक टिप्पणी से
यहां लोग सिहर जाते थे। बहरहाल गलवान टाईम्स के बयानों से हम यह समझ में आ रहा है
कि चीन भारत से वाकई डर गया है। दोनों में युद्ध अनवरत युद्ध चल रहा है। जिस तरह
भारतीय नेता बयान दे रहे हैं वह बड़े ठंडे स्वर में पर गहरी मार वाले हैं। वरना
गरजने वाले राजनाथसिंह इतने ठंडे स्वर में चीन पर आरोप नहीं लगाते।
No comments:
Post a Comment