Showing posts with label व्यंग्य. Show all posts
Showing posts with label व्यंग्य. Show all posts

Jul 15, 2013

बच्चों का शराब पीना-लघु हिन्दी व्यंग्य (bachcho ka sharab peena-hindi vyangya or satire on sex and smoke parti chiled and student's)



          करीब सौ  बच्चे एक मॉल में शराब की पार्टी में शामिल होने पर पकड़े गये।  यह पार्टी फेसबुक के संपर्कों का उपयोग कर आयोजित की गयी।  पुलिस को पता चला कि अवैध ढंग से यह आयोजन हो रहा है तो वह इन बच्चों का सुधारने के लिये पहुंची।  मॉल के जिस बार में शराब पार्टी थी उसके स्वामी और प्रबंधकों को पुलिस ने पकड़ लिया पर बच्चों के विरुद्ध मामला न दर्ज कर अभिभावकों को  बुलाकर उन्हें सौंपा। हमारे टीवी चैनलों के लिये यह बाल सामग्री अत्यंत उपयोगी थी और तय बात है कि उन्होंने समाज के स्थिति पर किराये के आंसु भी बहाये। चिंता जताई।
            पुलिस ने बच्चों पर प्रकरण दर्ज न कर उनके अभिभावकों को सौंपा यह अच्छी बात है।  तर्क यह दिया कि सभी बालक बालिकायें पंद्रह  से बीस वर्ष तक की आयु वर्ग से संबंधित हैं इसलिये उनके उज्जवल भविष्य की संभावनायें खत्म नहीं की जानी है।  यह तर्क भी ठीक है। प्रचार माध्यमो में-टीवी चैनल और अखबार-कुछ चर्चा सामाजिक अंतर्जालीय संपर्क पर हुई तो कुछ समाज में व्याप्त व्यसनों की बढ़ती प्रवृत्ति  पर भी चिंता जताई गयीं। हिन्दुस्तान बिगड़ रहा है जैसे नारे भी पढ़ने और सुनने  को मिले।  हमने इस घटना के दृश्य टीवी चैनलों पर देखे।  इन दृश्यों में पकड़े गये बच्चों के अभिभावकों में कुछ अपने हाथों से अपनी संतानों पर बरस रहे थे।  इस दृश्य को देखकर हमारे अंदर यह विचार आया कि आखिर यह अभिभावक अपने बच्चों को पीट क्यों रहे हैं? इसकी कुछ वजहें हमारी समझ में आयीं।
            1-अभिभावकों को इस बात का अफसोस था कि बच्चे शराब पीते पकड़े गये न कि इसका कि उनके बच्चे शराब पीते हैं।
            2-पुलिस के हत्थे न चढ़ें इसलिये अपने बच्चों पर हाथ बरसाकर उन्हें बचा रहे थे।
             3-यह बताने के लिये बच्चे बिगड़े जरूर है पर हम तो ठीक प्रकार के अभिभावक हैं।
            यह तीनों बातें कम से कम हमें तो जमती हैं। घर के बच्चे रात को घर से गायब हों और माता पिता उनकी उपस्थिति के स्थान की जानकारी नहीं रखें तो उनको दोषमुक्त नहीं किया जा सकता।  दरअसल हमारे समाज में आज कमाने की प्रवृत्ति ने लोगों को हर तरफ से अंधा कर दिया है।  अभिभावक स्वयं पैसा कहां से कमा रहे हैं यह वह जानते हैं पर खर्च कैसे हो रहा है इस पर अनेक उनकी दृष्टि नहीं जाती क्योंकि पैसा तो उनके पास बाढ़ की तरह चला आता है। चाणक्य कहते हैं कि अधिक धन हो तो उसे निकालना चाहिये।  हमारे लोग यह नहीं मानते तो पैसा स्वयं ही आगे निकलने लगता है।  जिस तरह बाढ़ का पानी अपने किनारे तोड़ता है उसी तरह पैसा भी अपने ही घर उखाड़ता हैं।  धनलोलुपों का  लक्ष्य एक ही है कि अपने बच्चों को इतना कमा कर दें कि आगे की सात पीढ़ियों तक उनका नाम चलता जाये।  आप अगर किसी से पूछें कि ‘‘आप किसके लिये कमा रहे हैं?’’
           वह फट से जवाब देगा कि ‘‘बच्चों के लिये कमा रहा हूं!’’
            हमारे देश के किसी पुराने दार्शनिक का कहना है कि पुत्र अगर सुयोग्य है तो वह स्वयं कमा लेगा। अगर नालायक है तो सब गंवा देगा, इसलिये उतना ही कमाओ जितना आवश्यक हो। बेकार में अपनी जिंदगी क्यों केवल सासंरिक विषयों में बर्बाद हो।  सच बात तो यह है कि बच्चों का नाम लेना तो  बहाना है। लोग अपनी सामाजिक स्थिति में चार चांद लगाने के लिये कमाते हैं।  कुछ लोग अपनी विलासिता के लिये कमाते हैं पर नाम बच्चों का लेते हैं।
       बहरहाल उन बच्चो को अपनी भाग्य समझना चाहिये कि पुलिस ने उन्हें वह सबक सिखाया है जिसकी जिम्मेदारी उनके माता पिता की थी। पुलिस वालों को तारीफ करना चाहिये कि वह अपना सामाजिक दायित्व समझने लगे हैं।  हमारा दर्शन तो कहता है  कि शिक्षा के दौरान विलासित से दूर रहना चाहिये पर मुश्किल यह है कि आधुनिक शिक्षा प्रबंधक शिक्षा के दौरान ही छात्रों  को संपूर्ण व्यक्तित्व का स्वामी बनाने का दावा करते हुए उनको अपनी संस्थाओं के अंतर्गत होने  पर्यटन और पिकनिक कार्यक्रमों में शामिल होने के लिये बाध्य करते हैं।  शिक्षा के लिये निर्धारित पाठ्यक्रम  से अलग अन्य  विषयों की जानकारी देकर शिक्षा के स्वामी और प्रबंधक अपने अधिक से अधिक कुशल शैक्षणिक व्यवसायी होने का प्रमाण देना चाहते हैं।  ऐसे में अभिभावक भी यह सोचते हैं कि हमें क्या चिंता  पूरी फीस दे रहे हैं हमारे बच्चे को तो विद्यालय और महाविद्यालय के शैक्षणिक ठेकेदार अपने आप ही एक आदर्श व्यक्तित्व का स्वामी बना देंगे।  ऐसे में  मद्यपान और ध्रुमपान से संयुक्त ढेर सारे आयोजन होने ही जिसमें नवयुवक शामिल हों।  सौ बच्चों को पकड़कर पुलिस ने उन्हें एक सबक सिखाया पर उसे जीवन भर कितने बच्चे याद रखेंगे या इस घटना से पूरे देश कितने भविष्य में ऐसा न करने या होने देने की छात्र और अभिभावक कसम खायेंगे कहना कठिन है।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Dec 29, 2012

शोक, बहस और विज्ञापन-लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य (shok, bahas aur vigyapan-laghu hindi hasya vyangya,short hindi satire article

                     दो प्रचार प्रबंधक एक बार में सोमरस का उपभोग करने के लिये   गये। बैरा उनके कहे अनुसार सामान लाता और वह उसे उदरस्थ करने के बाद इशारा करके पास दोबारा बुलाते तब फिर आता। दोनों आपस में अपने व्यवसाय से संबंधित बातचीत करते रहे।  एक प्रचार प्रबंधक ने दूसरे से कहा‘-‘‘यार, मेरे चैनल का मालिक विज्ञापनों का भूखा है।  कहता है कि तुम समाचार अधिक चलाते हो विज्ञापन कम दिखाते हो।’’
      दूसरा बोला-‘‘यार, मेरे चैनल पर तो समाचारों का सूखा है।  इतने विज्ञापन आते हैं कि समझ में नहीं आता कि समाचार चलायें कि नहीं। जिन मुद्दों पर पांच मिनट की बहस होती है  हम पच्चपन मिनट के विज्ञापन चलाते हैं।  हालांकि इस समय मुसीबत यह है कि हर रोज कोई मुद्दा मिलता नहीं है।’’
      पहला बोला-‘‘अरे, इसकी चिंता क्यों करते हो? हम और तुम मिलकर कोई कार्यक्रम बनाते हैं। राई को पर्वत और रस्सी को सांप बना लेंगे। अरे दर्शक जायेगा कहां? मेरे चैनल  या तुम्हारे चैनल पर जाने अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है।
   इतने में बैरा उनके आदेश के अनुसार सामान ले आया।  उसकी आंखों में आंसु थे। यह देखकर पहले प्रचार प्रबंधक ने उससे पूछा कि ‘‘क्या बात है? रो क्यों रहे हो? जल्दी बताओ कहीं हमारे लिये जोरदार खबर तो नहीं है जिससे हमारे विज्ञापन हिट हो जाये।’’
            बैरा बोला-‘‘नहीं साहब, यह शोक वाली खबर है।  वह मर गयी।’’
           दोनों प्रबंधक उछलकर खड़े हुए पहला बोला-‘‘अच्छा! यार तुम यह पैसा रख लो। सामान वापस ले जाओ। हम अपने काम पर जा रहे है। आज समाचार और बहसों के लिये ऐसी सामग्री मिल गयी जिसमे हमारे ढेर सारे विज्ञापन चल जायेंगे।’’
           दूसरा बोला-‘‘यार, पर शोक और उसकी बहस में विज्ञापन! देखना लोग बुरा न मान जायें।’’
           पहला बोला-‘‘नहीं यार, लोग आंसु बहायेंगे। विज्ञापन देखकर उनको राहत मिलेगी। हम फिर उनको रुलायेंगे। देखा नहीं उसके  बस से लेकर उसके अस्पताल रहने तक  हमने समाचार और बहस में कितने विज्ञापन चलाये।’’
            दूसरा बोला-‘‘पहले यह तो इससे पूछो मरी कौन है?’’
           पहले ने बैरे से पूछा-‘‘यह तो बताओ मरी कौन है?’’
          बैरा रोता रहा पर कुछ बोला नहीं। दूसरे ने कहा-‘‘यार, यह तो मौन है।’’
               पहला बोला-‘‘चलो यार, अपने विज्ञापन का काम देखो।  यह हमारा कौन है?’’
दोनों ही बाहर निकल पड़े। पहले ने एक विद्वान को मोबाइल से फोन किया और बोला-‘‘जनाब, आप जल्दी आईये।  अपने साथ अपनी मित्र मंडली भी लाना। सभी अच्छा बोलने वाले हों ताकि दर्शक अधिक से अधिक हमने चैनल पर बने रहें। हमारा विज्ञापन का समय निकल सके।’’
            दूसरे ने भी मोबाईल निकाला और अपने सहायक से बोला-‘‘सुनो, जल्दी से विज्ञापन की तैयारी कर लो। एक खबर है जिस पर लंबी बहस हो सकती है। इसमें अपनी आय का लक्ष्य पूरा करने में मदद मिलेगी।’’
दोनों अपने लक्ष्यों की तरफ चल दिये। उन्होंने यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि ‘मरी कौन है’। इससे उनका मतलब भी नहीं था।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Jan 10, 2012

सेवक और पहरेदार-हिन्दी हाइकु (sewak aur paharedar-hindi haiku or kaivta)

उनके पेट
कभी नहीं भरेंगे
जहरीले हैं,

रोटी की लूट
सारे राह करेंगे
जेब के लिए,

मीठे बोल हैं
पर अर्थ चुभते
वे कंटीले हैं।
--------------

फिर आएंगे
वह याचक बन
कुछ मांगेंगे,
दान लेकर

वह होंगे स्वामी

हम ताकेंगे,

हम सोएँ हैं
बरसों से निद्रा में
कब जागेंगे,

सेवक कह
वह शासक होते
भूख चखाते

पहरेदार
अपना नाम कहा
लुटेरे बने

लूटा खज़ाना
आँखों के सामने है
कब मांगेंगे।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Jun 9, 2011

हर शख्स अकेला हो गया-हिन्दी शायरी(har shakhs akela ho gaya-hindi shayari)

पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
-----------

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Jan 24, 2011

सुबह इंसान को क्या करना चाहिए-हिन्दी रचना (subah aur insaan-hindi rachna)

प्रातः आठ बजे का समय था। हम सुबह घर से बाहर चाय पीकर निकले। पार्क में घूमने जाना था। चाय पीकर बाहर घूमने का यह रोज का हमारा नियम वैसे पुराना है, पर ब्लाग पर लिखने की वजह इसमें व्यवधान आ गया था। जब पहले बिजली कटौती नहीं थी तब यह समय ब्लाग लिखने में लगाते जिससे लिखना बंद हो गया। हालांकि सुबह केवल भारतीय अध्यात्म से संबंधित विषय पर ही हम लिखते थे पर अब सुबह कभी चार तो कभी तीन बजे से सुबह दस बजे तक बिजली कटौती ने हमारी इस अध्यात्मिक साधना को करीब करीब समाप्त कर दिया है। मगर इससे एक लाभ यह हुआ है कि प्रातःकाल घूमना हमारी दिनचर्या में शामिल हो गया है। जब सुबह घूमने जाते हैं तो राह चलते हुए अनेक दृश्य और लोगों की बातें हमारी आंखों और कानों पर प्रभाव डालती पड़ती हैं जो अब अलग से एक नयी अनुभूति देती थी है। शायद यह अध्यात्मिक साधना का परिणाम भी हो सकता है।
बहरहाल प्रातःकाल घूमने में स्वर्ग जैसा आनंद है। कहना चाहिए कि स्वर्ग में अगर इंसान जाये और दोपहर तक सोता रहे तो उसे वहां भी धरती पर भोगे गये नरक की अनुभूति होगी, यह हमारा दावा है। स्वर्ग एक कल्पना है पर सुबह का भ्रमण अगर नियमित कर उसकी अनुभूति को अपने मन में उतारा जाये तो यकीनन स्वर्ग की कल्पना मिथ्या साबित होगी। शायद अनेक महापुरुष इसलिये यही कहते हैं कि स्वर्ग और नरक इसी धरती पर हैं। यकीनन वह महापुरुष सुबह उठकर ज्ञान तथा ध्यान में संलग्न रहने वाले थे तभी उन्होंने इस सत्य की अनुभूति की। उन्होंने यह सिखाया कि अपने कर्म, आचरण, व्यवहार, तथा दिनचर्या में से यहीं इसी धरती पर स्वर्ग को भोगा जा सकता है।
उस दिन एक सज्जन ने हमसे कहा-‘आप देर से घूमने क्यों निकलते हैं? घूमना तो एकदम सूर्य निकलने से पहले होना चाहिए। यह क्या कि आठ बजे घूमने निकले हैं। इस समय तो चाय और नाश्ते करने का समय है।’
हमने कहा-‘हां, मैं चाय पीकर तफरी करने निकला हूं।’
वह बोले-‘इससे क्या लाभ? सुबह घूमिये तो जरा स्वास्थ लाभ होगा।’
हमने कहा-‘हां, कोशिश करूंगा कि सुबह निकलें, मुश्किल यह है कि हमारा सुबह का एक से डेढ़ घंटा योग साधना, स्नान, पूजा तथा चाय पीने में लग जाता है। योग साधना का समय लंबा हो जाये तो दो घंटे भी ऐसे ही निकल जाते हैं। आपकी राय पर विचार करेंगे और कुछ समय पहले ही उठा करेंगे।’
वह सज्जन हमारी तरफ आंखें फाड़कर देखने लगे और बोले-‘आप वाकई योग साधना करते हैं, मगर आप का पेट बहुत बाहर निकला है। यह देखकर नहीं लगता।’
हमने कहा-‘इसलिये ही सुबह घूमने निकलते हैं ताकि पेट कम हो।’
वह बोले-‘योग साधना वालों के पेट तो अंदर होते हैं। आपने बाबा रामदेव को देखा होगा कितने पतले और सुंदर लगते हैं। आपका पेट तो बहुत बाहर है।’
हमने कहा-‘दरअसल हम खान पान में थोड़े लापरवाह हैं। यह उसी का नतीजा है।’
वह बोले-‘फिर योग साधना करने से क्या फायदा? उसमें तो संयम रखना चाहिए।’
हमने कहा-‘हां, अब रखेंगे।
यह कहकर आगे चल दिये तो पीछे से फिर उन्होंने आवाज दी और कहा-‘मगर आप मोटे नहीं लगते। आपके शरीर का बाकी हिस्सा फिट लगता है। वैसे आप कौनसे आसन करते हैं।’
हमन कहा कि ‘बहुत सारे! पद्मासन, सर्वांगासन तथा सूर्यनमस्कार तथा बहुत सारे आसनों में साथ प्राणायाम भी करते हैं।’
वह बोले-‘आप हमें कोई ऐसा आसन बताईये जिससे हमारी कमर का दर्द चला जाये। कमबख्त, बहुत परेशान हैं।’
हमने कहा-‘उष्टासन करिये।’
वह बोले-‘यह कैसे होता है?’
हमने कहा-‘यह सड़क पर करके कैसे बता सकता हूं।’
वह बोले-‘आपका पद्मासन लगता होगा, इस पर यकीन नहीं होता।’
हमने कहा-‘चलिये, पार्क में करके दिखा देते हैं। पर हां उष्टासन नहीं करके बतायेंगे क्योकि हमारे पास अब चद्दर और दरी नहीं है।’
वह बोले-‘फिर कभी देखेंगे। कल मैं पार्क में आऊंगा तब आप पद्मासन लगाकर बताईयेगा।’
हमने कहा-‘बात तो हमने आज और अभी की कही है। कल की कल देखेंगे।
वह सज्जन चले गये।
उनके जाने के बाद हमें इस बात पर पछतावा हुआ कि किसलिये अपने कीमती दस मिनट उनसे वार्तालाप में बरबाद किये। इससे तो हां जी, हां जी, करते हुए निकल जाना चाहिए था। सारा दिन तो लोगों से बात करते और सुनते हुए बीतता है। मौन रहकर घूमने का आनंद तो प्रातःकाल घूमने में ही हैं।
उस दिन रास्ते पर पड़ने वाले एक मकान के पास से गुजर रहे थे तो एक सज्जन अखबार पढ़ते दिखेे। हमें देखकर बोले-‘नमस्कार, श्रीमान, इधर कैसे निकले हैं।’
हमने कहा-‘‘ जरा तफरी करने निकले हैं।’’
वह बोले-‘हां, अब तो हवा ही रह गयी है खाने को! हर चीज महंगी होती जा रही है। अनाज, सब्जी, दूध और और बिजली भी महंगी हो रही है। देखिए अखबार में क्या दर्दनाक खबरें लिखी हैं। आपने तो अखबार पढ़ा होगा?’
हमने कहा-‘अखबार तो अब जाकर पढ़ेंगे। सुबह क्या दर्दनाक विषयों में अपना कोमल हृदय फंसायें, वह तो सारा दिन ही झेलनेे हैं।’
वह बोले-‘अखबार पढ़ने का मजा तो सुबह ही है।’
हमने कहा-‘आप भी कमाल करते हैं। भला, दर्दनाक खबरों में मजा आता है? यह सब चीजें महंगी हो रही हैं उनको रोकना अपने बस में नहीं है, फिर उनसे उपजा संकट झेलना ही है तब क्यों सुबह का यह कीमती समय इन पर नष्ट करें।’
वह बोले-‘ऐसी बात नहीं है। नई जानकारी भी मिलती है। देखिए, आज मंत्रिमंडल में विस्तार होना है। इधर विश्व कप के लिये क्रिकेट टीम भी घोषित हो गयी है। यह तो रुचिकर विषय हैं।’
हमने कहा-‘हां, यह सही है। कल से सुबह ही अखबार पढ़ा करेंगे।’
हम थोड़ा आगे ही गये होंगे कि बच्चों को ले जानी वाली एक बस हमारे पास से तीव्र गति से धूल उड़ाती हुई निकली जिससे हमारे कानों, आंखों तथा नाक पर बुरा प्रभाव पड़ा। जितनी देर उन सज्जन से हम बात कर रहे थे उतने में हम उस सड़क से पार्क में पहुंच गये होते। मतलब उस वार्तालाप की वजह से धूल ने हम पर प्रहार किया। ऐसे में रुमाल से हमने मुंह ढंका, फिर पौंछा। किसी तरह पार्क में पहुंच गये। मन में पछतावा हो रहा कि बेकार की बातों में क्यों अपना वक्त लगाया।
पार्क में खिले फूलों को देखकर यह लगा कि किस तरह यह इस आशा में खड़े हैं कि लोग उनको देखें। लोग फूलों की पैंटिंग से घर में सजाते हैं। नकली फूलों से गुलदस्ते भी भरते हैं। असली फूल के पास खड़े होकर उसे निहारने का जो आनंद है कितनों के नसीब में होता है। यह जरूरी नहीं है कि फूलों के पास से जो निकले वह उसकी उपस्थिति के आनंद को अनुभव करे, क्योंकि आनंद लेना भी एक कला है जिसके लिये मौन होना जरूरी है। उससे ज्यादा अपने को हमेशा ही अभिव्यक्त होने के भाव से भी मुक्त होना पड़ता है। यह मैं करूं, वह देखूं, वह सुनूं, या मैं किसी से कुछ कहूं-आशय यह है कि अपनी दैहिक सक्रियता का मोह छोड़कर अपना ध्यान अंतर्मन में लगाना पड़ता है। आप सोचते रहिये कि ‘यह करें, वह करें’, मगर यह भी सोचें कि दूसरा उसको कितना भाव देता है। मतलब आपका सुनाना बेकार है क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि सामने वाला आपके विषय को रुचि के साथ सुन रहा है। जैसे कि हमने सुना पर तत्काल उस विषय से निवृत हो गये थे कि ‘सुबह इंसान को क्या करना चाहिए।
कई बार लोगों को यह अनुभव होता है कि हम उनकी बात सुन रहें तो यह भ्रम है और हम सुनकर याद रखेंगे यह तो महाभ्रम है। तय बात है यह बात हमारे कहने पर भी लागू होती है क्योंकि सामने वाले की प्रतिक्रिया ऐसी ही होती है।
-----------------

कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

४.हिन्दी पत्रिका
५.दीपकबापू कहिन
६. ईपत्रिका 
७.अमृत सन्देश पत्रिका
८.शब्द पत्रिका

Sep 2, 2009

राहत का उदघाटन करायेंगे-हिंदी हास्य कविता

बेटे ने मां से कहा
‘‘मां, मुझे पैसा दो तो
कार खरीद कर लाऊं
कालिज उससे जाकर अपनी छबि बनाऊं
पापा, नोटों की भरी पेटी रखकर
दौरे पर गये हैं
मुझे अपने दोस्तों में रुतवा दिखाना है
क्योंकि सभी नये हैं
पता नहीं पापा कब आयेंगे
तब तक अपनी इस मोटर साइकिल पर जाऊंगा तो
सभी मेरी हंसी उड़ायेंगे।’

सुनकर मां गद्गद्वाणी में बोली
‘बेटा, तुम्हारे पापा समाज सेवक है
सभी जानते हैं
उनको इसलिये मानते हैं
यह पेटी उन्हीं चंदे के नोटों से भरी है
जो सूखा राहत बांटने के लिये यहां धरी है
माल तो यह सभी अपना है
सूखा पीड़ितों के लिये तो बस एक सपना है
पर तुम्हारे पापा कागज पत्रक पूरे करने के लिये
दौरे पर गये हैं
उनका नया होना जरूरी है
क्योंकि यह नोट भी नये हैं
यह दौरा कर वह राहत बंटवा रहे हैं
सच तो यह है कि
बांट सकें जिनको
उन मरे लोगों के नाम छंटवा रहे हैं
अगर अभी पैसा खर्च कर ले आओगे
अपने पापा पर शक की सुई घुमाओगे
इसलिये आने दो उनको
इस भरी पेटी से तुम्हारी कार का पैसा निकालकर
तुम्हारे हाथों से इसका
और तुम्हारी राहत का उद्घाटन करायेंगे।

..............................
यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Aug 27, 2009

छह गल्तियां-हिंदी हास्य कविता (six merrige or mistake-hindi hasya kavita)

छह शादियां करने वाला
पकड़ा गया
पहरेदार उसे जब
हथकड़ियां लेकर जा रहे थे
तब एक हास्य कवि ने उनसे कहा
‘भई, इसे कैद में नहीं बल्कि
मनोचिकित्सक के पास ले जाओ।
यह बदमाश नहीं लगता क्योंकि
कभी एक के बाद एक छह
गल्तियां नहीं करता
यहां तो एक शादी में ही
मैं हास्य कवि बन गया
अपनी उस गलती पर
व्यंग्य कसने लग गया
दूसरी का विचार भी नहीं करता
इसने छह शादियां की हैं
इसका मतलब यह है कि
यह मानसिक रूप से अस्थिर है
पेशे से इंजीनियर
कमाता है कुल अस्सी हजार महीना
कैसे हो सकता है इसमें
छह बीबियों का खाना पीना
यहां तो करोड़पति भी
एक बार शादी जैसी गलती कर
फिर दूसरी की नहीं सोचता
इसे मानसिक चिकित्सा की जरूरत है
इस पर जरा तरस खाओ।

..............................................

यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Dec 11, 2008

किसी के दिल से मत खेलना-हिन्दी शायरी

दूसरों पर फब्तियां कसना
कितना आसान लगता है
पर दर्द उठता है तब
जब हमारे सच का बयाँ
कोई सामने करता है

ओ लफ्जों के खिलाड़ियों
अपनी जुबाँ से बोलकर
हाथ से लिखकर
आँखों से इशारे कर
चलाते रहना अपनी दुनियाँ
पर किसी के दिल से मत खेलना
टूटे बिखरे लोगों पर हंसना
अपने लिए भी महंगा पड़ता है
जब उनकी बददुआओं से
तुम्हारे अरमानों का शिकार
वैसा ही हादसा करता है

------------------------------
यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Apr 17, 2008

तस्वीरों को दिखाकर मत बहलाओ-हिन्दी शायरी

तस्वीरों को दिखाकर मत बहलाओ
जो छिपा रहे हो
पहले वह सच बताओ
आहिस्ता-आहिस्ता अपने शब्दजाल में
लोगों को फंसाने की कोशिश करते हुए
दूसरों की सोच को न भूल जाओ
सामने से सभी तस्वीरें
दिल को छू जातीं है
पर अपने पीछे से
कभी किसी को सूंदर नहीं लगतीं
इसलिये सामने ही लगायी जातीं हैं
शब्दों के अर्थ भी कई होते हैं
तुम खुद हो एक भ्रम में
दूसरों को न उलझाओ

.....................................................

ऊंची इमारतों, होटलों और पार्कों की तस्वीर
नहीं होती किसी शहर की तकदीर
भूख, गरीबी और बीमारी की
बस्तियां सभी जगह होती हैं
जिन पर टिकी है शहर की चमक
गरीब के अंधेरे भी वहीं होतें
लिखें किसी शहर की तारीफ में जो शब्द
उसमें क्यों नहीं आया किसी गरीब का दर्द
यह तुम्हारी चालाकी है या अनजानापन
तुम्हारी तस्वीर और शब्दों में
कभी पूरी हकीकत बयान नहीं होती है
..........................................................

Apr 13, 2008

फिर गुरु की भूमिका में आते हैं-कविता

कई बस्तियां बसीं और उजड़ गईं
राजमहल खडे थे जहाँ
अब बकरियों के चरागाह हो गए

सर्वशक्तिमान अपनी कृपा के साथ
कहर का हथियार नहीं रखता अपने साथ
तो कौन मानता उसे
कई जगह उसका भी प्रवेश होता वर्जित
नाम लिया जाता
पर घुसने नहीं दिया जाता
नरक और स्वर्ग के दृश्य यहीं दिखते
फिर कौन ऊपर देख कर डरता
खडे रहते फ़रिश्ते नरक में
शैतानों के महल होते सब जगह
जो अब इतिहास के कूड़ेदान में शामिल हो गए
--------------------------------------

चंद किताबों को पढ़कर
सबको वह सुनाते हैं
खुद चलते नहीं जिस रास्ते
वह दूसरे को बताते हैं
उपदेश देते हैं जो शांति और प्रेम का
पहले वह लोगों को लडाते हैं
फिर गुरु की भूमिका में आते हैं
---------------------------------------

Aug 24, 2007

ऐसा भी होता है-कहानी

उनके दोनो बेटे-बहु प्रतिवर्ष की भांति भी इस वर्ष अपने माता-पिता के पास रहने के लिए आये। अब पति-पत्नी अकेले ही रहते थे। पति अब रिटायर हो गये थे, और दोनों ही सुबह, दोपहर और शाम एक मंदिर में जाते थे। उनके दोनों लड़के पढने के बाद शहर से बाहर नौकरी कर रहे थे और उनकी अच्छी आय थी। अपने माता-पिता से मिलने वह साल में पांच-छ: बार जरूर आते थे पर विवाह के बाद पिछले तीन वर्षों में यह आगमन केवल एक वर्ष तक रह गया था। इधर उनके पिताजी भी रिटायर हो गये थे। रिटायर होने से पूर्व भी पति महोदय दिन में दो बार अपनी पत्नी को सुबह-शाम जरूर मंदिर गाडी पर बैठा कर जरूर ले जाते थे, अब वह क्रम तीन बार हो गया था। उनकी पत्नी अपने मंदिर जाने का प्रदर्शन पडोस में जरूर करतीं और बार-बार अपने धर्मभीरू होने की चर्चा अवश्य करती। और कभी-कभी बिना किसी आग्रह के ज्ञान भी देतीं देती थी। उनका मंदिर घर से दो किलोमीटर दूर था और किसी दिन गाडी खराब हो या पति महोदय का स्वास्थ्य ठीक न हो तो उन्हें अनेक ताने सुनने को मिलते। वह कभी घर से मंदिर तक पैदल नहीं गयीं।


उस दिन वह अपनी बहुओं पर अपना ज्ञान बघार रहीं थीं-"अपने शरीर को चलाते रहना चाहिए, वरना लाचार हो जाता है अब देखो तुम्हारे ससुर कभी नाराज होकर मंदिर नहीं ले जाते तो मैं पैदल ही चली जाती हूँ कभी भी झगडा नहीं करती- अपने पति से कभी भी झगडा नहीं करना चाहिए। बिचारे पुरुष तो जीवन भर कमाने में ही समय गंवाते हैं।"

वगैरह........वगैरह।इधर वह अपने पति के साथ मंदिर गयी और उधर उनकी बहुओं ने पडोसियों से बातचीत शुरू की और फिर उसने सासके दावे की इस तरह सत्यता का पता लगाने का प्रयास किया कि वह बिचारे समझ नहीं पाए ।

एक पडोसन बोली -"हमने तो कभी भी तुम्हारी सास को पैदल जाते हुए नहीं देखा, अगर गाडी खराब हो या उनका मन न हो या उनके कोई रिश्तेदार आ गये हौं तो मंदिर न ले जाने के लिए उनको हजार ताने देतीं हैं। तुम्हारे ससुर तो सीधे हैं सब सह जाते हैं।"

बहुओं की ऑंखें खुल गयीं, उन्हें अपनी सास पर वैसे भी यकीन नहीं था- और अब तो पडोसियों से भी पुष्टि करा ली थी। उन्होने अपने-अपने पतियों को उनकी माँ की पोल बतायी-हालांकि पडोसन ने आग्रह किया था कि वह ऐसा न करे क्योंकि उनके जाने के बाद उनकी सास उनसे लडेगी।

इधर उनके बहु-बेटे अपने घरों को रवाना हुए और उधर वह अपने पडोसियों पर पिल पडी-"तुम लोगों से किसी का सुख देखा नहीं जाता। मेरी बहुओं को भड़काती हो। अब देखना जब तुम्हारे घर में बहुएँ आयेंगी तो मैं भी यही करूंगी।"

एक पडोसन बोली-"हमें क्या पता था कि तुम्हारी बहुएँ चालाकी करेंगी। पता नहीं तुमसे क्या बात नमक मिर्च लगाकर कह गयीं हैं।"

मगर वह नहीं रुकीं और बोलतीं गयी-"तुम लोगों का क्या मतलब? मैं अपनी बहुओं से कुछ भी कहूं। तुन कौन होती हो बीच में दखल देने वाली ....." उन्होने और भी बहुत कुछ कहा और इस तरह सास-बहु का झगडा पडोसियों के मत्थे आ चूका था।

Jun 20, 2007

लड़ते रहो, हमें अपने ब्लोग हिट कराना है

लड़ते रहो दोस्तो
ख़ूब लड़ो
किसी तरह अपनी रचनाएं
हिट कराना है
बेझिझक छोडो शब्दों के तीर
गजलों के शेर अपने
मन की किताब से
निकल कर बाहर दौडाओ
कुछ कवितायेँ हौं
तुम्हारे हृदय पटल पर
उन्हें भी यहां ले आओ
किसी तरह अपना नाम
दुनिया में चमकाना है


निडर होकर लड़ो
इस प्रचार की रणभूमि में
इतना लड़ो कि
तुम्हारे लिखे को पढने के लिए
लोगों की भीड़ जुट जाये
तुम्हारे लिखे डायलाग
शोले की तरह
जनमानस में छा जाये
किसी तरह
अपने निज-पत्रक
घर-घर पहुंचाना है


पर शब्दों के तीर से
किसी अपने का मन घायल न करना
गजलों के शेरों की दहाड़ से
किसी का दिल विचलित न करना
लड़ना मिलजुलकर (नूरा कुश्ती )
पर अपने मन मैले न करना
अभी तो शुरूआत है
हमें बहुत दूर जाना है
-------------------
कुछ तुम कहो
कुछ हम कहें
खामोशी से तो अच्छा है
हम मिलजुलकर लड़ने लगें

जो नहीं देखते हमें
वह भी देखने लगें
बदनाम होंगे तो क्या
नाम तो होगा
आओ मुकाबला फिक्स करने लगें

कभी तुम जीतो कभी हम
खिलाडियों में नाम तो होगा
अन्दर हंसो
पर बाहर दिखो गंभीर
ऐसा न हो लोग
असलियत समझने लगें
जब फीका हो आकर्षण
लोग हमसे बोर होने लगें
हम अपनी लडाई के
ढंग बदलने लगें
-----------
(यह व्यंग्य कविता काल्पनिक हैं और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है)