Jul 31, 2014

शतरंज की बिसात पर-हिन्दी कविता(sahatranj ki bisat par-hindi poem)




कौन सोचता है जिस जमीन पर
आज हम खड़े हैं
कल पाताल में धंस जायेगी।

चलते है चाल शतरंज की बिसात पर
पता नहीं लगता
कौनसी हमें हार के कगार में फंसायेगी।

ख्वाहिशों की फेहररिसत बढ़ी है जमाने की
नहीं जानते लोग
अधूरी रहने पर वही सतायेगी।

कहें दीपक बापू बिखरे हैं सभी लोग
 सपनों को साकार करने के लिये
तानाबाना बुनने में लगे हैं
खौफ भी बसा है दिल में
पता नहीं कौनसी डोर  कब टूट जायेगी।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Jul 22, 2014

जिनके हिस्सें आया संघर्ष-हिन्दी व्यंग्य कविता(jinke hisse aayaa sangharsh-hindi satire poem's)



मिल गये जिनको भोगने के साघन
युद्ध में कभी वीरता नहीं दिखातो,
विकास पथ पर चल कर पा गये शिखर
देशभक्तों मे पैसा खर्च कर अपना नाम लिखाते।

रोटियों से पेट भर कर
जिनसे चला नहीं जाता एक कदम भी
लंबी दूरी तय करने के गुर वही सिखाते।

गद्दे पर थक जाते सोते हुए जो शौहरतमंद
वही कमरे से बाहर आकर
लोगों को मेहनत करने  के नुस्खे सिखाते।

कहें दीपक बापू  जिंदगी में जिनके हिस्से आया संघर्ष
मूक भाव से पकड़े रहते अपनी राह
जीवन पथ पर चलते अपने पांव पर
अपने आसरे गैरों पर नहीं टिकाते।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Jul 12, 2014

नहीं सुधरेगा समाज-हिन्दी हास्य कविता(nahin sudhrega samaj-hindi hasya kavita)



रास्ते में मिलने पर फंदेबाज बोला
‘‘दीपक बापू, मैली धोती और कुचला कुर्ता पहनकर
इस पुराने थैले में कविताओं के साथ
कुछ रुपया भी साथ में धरा करो
राहजनी बढ़ गयी है कोई घेरेगा तो
कुछ माल न मिलने पर नाराज हो सकता है
इसलिये तुम डरा करो,
सामानों के दाम जितने चढ़े हैं,
अपराध भी उस पैमाने पर बढ़े हैं,
टीवी के पर्दे पर विकास देखकर
कहीं इस धरती पर स्वर्ग का अहसास न करना,
विकास के मसीहाओं की अगर चली चाल
नरक में सांस लेने पर भी पड़ेगा शुल्क भरना,
तुम्हारी फ्लाप कविताओं से नहीं सुधरेगा समाज
चाहे शब्दों में गोलियों जैसा अहसास भरा करो।’’
सुनकर हंसे दीपक बापू और बोले
खौफ के साये में तुम जी रहे हो,
हालातों के कारण कड़वे घूंट पी रहे हो,
लगता है तुमने ज्यादा कमा लिया है,
कुछ रकम खाते में कुछ माल तिजोरी में जमा लिया है,
हम बेफिक्र हैं क्योंकि राहजनों से
ज्यादा लुटने वाले अभी बहुत लोग हैं,
जिनमें दौलत शौहरत और ओहदे पाने के लगे रोग हैं,
विकास ने अपराधियों को  भी बढ़ा दिया है,
अपने शिकारों में बड़े नामों को भी उन्होंने चढ़ा लिया है,
हमारा मानना है कि मालदार के मुकाबले
लुटेरों की संख्या कम है,
उनकी शिकार सूची मे हमारा क्रम अभी नहीं आयेगा,
जब तक बढ़ेंगे अपराधी तब तक विकास भी बढ़ जायेगा,
मानते हैं कि हादसे के अंदेशे बहुत हैं
जब तक न हो तब तक तुम अपने अंदर
कोई खौफ न भरा करो।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Jul 3, 2014

भक्ति के नाम पर धंधा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(bhakti ke nam par dhandha-hindi vyangya kavitaen)



हर कोई बैठा है हाथ में लेकर मूर्तियां पुजवाने के लिये,
जिसकी नहीं पुजे लग जाता दूसरे की तुड़वाने के लिये।
किसी ने लगाया ने अपने माथे पर चंदन की टीका
किसी ने अपने चेहरे पर स्थापित दाढ़ी बढ़ा ली,
चाहे जहां सर्वशक्तिमान के नाम पर शब्दों की जंग लड़ा ली,
कहें दीपक बापू भक्ति का मसला दिल से जुड़ा है
धर्म के ठेकेदारों ने बना लिया धंधा कमाने के लिये।
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सर्वशक्तिमान की  भक्ति करने पर वह इतराते हैं,
दिल है खाली जुबान पर नाम लेकर इठलाते हैं।
कहें दीपक बापू पाखंड से पहचानी जा रही आस्था,
सत्य के नाम पर सत्ता का बना रहे रास्ता,
ज्ञान की राह कभी सभी समझी नहीं
रट लिये शब्द अब दूसरों को सिखलाते हैं।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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मन के खेल पर भारी धन का चक्कर-दीपकबापूवाणी (man ke khet par dhan ka Chakkar-DeepakBapuwani)

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर, वैभव रथ पर सवार देव से लेता टक्कर। ‘दीपकबापू’ आदर्श की बातें करते जरूर, रात के शैतान दिन में बनते फक्कड़।।...