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May 23, 2007

सागर की तरह होता है मन

NARAD:Hindi Blog Aggregator
सागर की तरह मन है मेरा
जब भी लहरों से खेलता है
कुछ शेर ही जुबान से
कहला कर दम लेता है
मैं भी उसे नहीं रोक पाता
बहने देता हूँ उसके भावों को
दिमाग मेरा किनारा कर लेता है
मैं जानता हूँ कि मन चंचल होता है
शेरों से अठखेलियां करता है
तो क्या बुरा करता है
बस चन्द अल्फाजों की
ख़ुराक ही तो लेता है
मैं उसे तड़पाऊंगा
वह मुझे भटकाएगा
मैं शेर नहीं लिखूंगा
वह व्यसनों की तरफ भगाएगा
मैं मन को काबू में रखने की बात
कभी नहीं मानता
दिमाग से उसकी दिशा तय
करना संभव है
पर मन को मारकर भला
कौन जीवन जीं लेता है
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सब कुछ पाकर भी मन
खुश क्यों नहीं होता
हर पल भटकाए जाता है
दौलत और शौहरत के
हिमालय पर पहुंचकर भी
उसे चेन क्यों नहीं आता है
वह उदास क्यों हो जाता है
कुछ सवाल उससे करो
कुछ करो अपने से
उत्तरों में ही रास्ता नज़र आता है
जब तुम स्वार्थ पूरा करते हो
वह परमार्थ चाहता है
जब तुम दुश्मन बनाते हो ज़माने को
वह दोस्त बनाना चाहता है
वह तड़पता है तुमसे बात करने को
तुम उसे अपनी ख्वाहिशों से ढक लेते हो
और वह उदास हो जाता है