Aug 30, 2009

हर बच्चा ज्ञान पा जाता है-हास्य कविता (child and knowledge -hindi hasya kavita)

आज के बच्चे
अपने माता पिता के बाल्यकाल से
अधिक तीक्ष्ण बुद्धि के पाये जाते
यह सच कहा जाता है।
किस नायिका का किससे
चल रहा है प्रेम प्रसंग
अपने जन्मदिन पर नायक की
किस दूसरे नायक से हुई जंग
कौन गायक
किस होटल में मंदिर गया
कौन गीतकार आया नया
कौनसा फिल्मी परिवार
किस मंदिर में करने गया पूजा
कहां जायेगा दूजा
रेडियो और टीवी पर
इतनी बार सुनाया जाता है।
देश का हर बच्चा ज्ञान पा जाता है।

.................................
यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Aug 27, 2009

छह गल्तियां-हिंदी हास्य कविता (six merrige or mistake-hindi hasya kavita)

छह शादियां करने वाला
पकड़ा गया
पहरेदार उसे जब
हथकड़ियां लेकर जा रहे थे
तब एक हास्य कवि ने उनसे कहा
‘भई, इसे कैद में नहीं बल्कि
मनोचिकित्सक के पास ले जाओ।
यह बदमाश नहीं लगता क्योंकि
कभी एक के बाद एक छह
गल्तियां नहीं करता
यहां तो एक शादी में ही
मैं हास्य कवि बन गया
अपनी उस गलती पर
व्यंग्य कसने लग गया
दूसरी का विचार भी नहीं करता
इसने छह शादियां की हैं
इसका मतलब यह है कि
यह मानसिक रूप से अस्थिर है
पेशे से इंजीनियर
कमाता है कुल अस्सी हजार महीना
कैसे हो सकता है इसमें
छह बीबियों का खाना पीना
यहां तो करोड़पति भी
एक बार शादी जैसी गलती कर
फिर दूसरी की नहीं सोचता
इसे मानसिक चिकित्सा की जरूरत है
इस पर जरा तरस खाओ।

..............................................

यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Aug 10, 2009

नकली आंसू फूटे नहीं-हिंदी शायरी (naqli ansu-hindi shayri)

जिंदगी के सफर में
कई बार अपनों ने ही गिराया
फिर भी टूटे नहीं।
काम निकालकर भूल गये
फिर भी हम रूठे नहीं।
हमारे अरमानों को लगाई गयी आग
फिर भी अपने दूसरे के सपने फूंके नहीं।
कभी कभी लगता है
गलती दर गलती करते गये
लोगों को झूठे दर्द
अपने समझ कर सहते गये
पर फिर सोचते हैं कि
भला वह लोग भी तो
इतनी दगा के बावजूद
अपनी जिंदगी में उठे नहीं।
यूं ही खड़े हैं जिंदगी में
सलामत हैं हाथ पांव क्या यह कम है
जुटा लेते अपने लिये
हम भी नकली हमदर्द
पर इन आंखों से कभी नकली आंसू फूटे नहीं।

..............................
यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Aug 8, 2009

नये इंसान के उड़ने की चाहत-हास्य व्यंग्य (insan ki chahat-hasya vyangya)

सर्वशक्तिमान ने एक नया इंसान तैयार किया और उसे धकियाने से पहले उसके सभी अंगों का एक औपचारिक परीक्षण किया। आवाज का परीक्षण करते समय वह इंसान बोल पड़ा-‘महाराज, नीचे सारे संसार का सारा ढर्रा बदल गया है और एक आप है कि पुराने तरीके से काम चला रहे हैं। अब आप इंसानों का भी पंख लगाना शुरु कर दीजिये ताकि कुछ गरीब लोग धनाभाव के कारण आकाश में उड़ सकें। अभी यह काम केवल पैसे वालों का ही रह गया।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘पंख दूंगा तो गरीब क्या अमीर भी उड़ने लगेंगे। बिचारे एयरलाईन वाले अपना धंधा कैसे करेंगे? फिर पंख देना है तो तुम्हें इंसान की बजाय कबूतर ही बना देता हूं। मेरे लिये कौनसा मुश्किल काम है?
वह इंसान बोला-‘नहीं! मैं इंसान अपने पुण्यों के कारण बना हूं इसलिये यह तो आपको अधिकार ही नहीं है। जहां तक पंख मिलने पर अमीरों के भी आसमान में उड़ने की बात है तो आपने सभी को चलने और दौड़ने के लिये पांव दिये हैं पर सभी नहीं चलते। नीचे जाकर आप देखें तो पायेंगे कि लोग अपने घर से दस मकान दूर पर स्थित दुकान से सामान खरीदने के लिये भी कार पर जाते हैं। ऐसे लोगों पर आपकी मेहरबानी बहुत है और पंख मिलने पर भी हवाई जहाज से आसमान में उड़ेंगे। मुद्दा तो हम गरीबों का है!’

सर्वशक्तिमान ने कहा-‘वैसे तुम ठीक कहते हो कि पांव देने पर भी इंसान अब उसका उपयोग कहां करता है पर फिर भी पंख देने से तुम पक्षियों का जीना हराम कर दोगे। अभी तो तुम उड़ते हुए पक्षी को ही गुलेल मारकर नीचे गिरा देते हो। फिर तो तुम चाहे जब आकाश में उड़ाकर पकड़ लोगे।’

उस इंसान ने कहा-‘ऐसा कर तो इंसान आप का ही काम हल्का करता है। वरना तो आपका यह प्रिय जीव इंसान हमेशा हीं संकट में रहेगा। इनकी संख्या इतनी बढ़ जायेगी कि इंसान भाग भाग कर आपके पास जल्दी आता रहेगा।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘अरे चुप! बड़ा आये मेरा काम हल्का करने वाले। वैसे ही तुम लोगों की वजह से हर एक दो सदी में अहिंसा का संदेश देने वाला कोई खास इंसान जमीन पर भेजना पड़ता है। वैसे तुम इंसानों ने वहां पर्यावरण इतना बिगाड़ दिया है कि नाम मात्र को पशु पक्षी भेजने पड़ते हैं। अधिक भेजे तो उनके लिये रहने की जगह नहीं बची है। सच तो यह है मुझे सभी प्रकार के जीव एक जैसे प्रिय हैं इसलिये सोचता हूं कि कुछ पशु पक्षी वहां मेरा दायित्व निभाते रहें। वह बिचारे भी मेरे नाम पर शहीद कर दिये जाते हैं इस कारण उनको अपने पास ही रखना पड़ता है। कभी सोचता हूं कि उनको दोबारा नीचे भेजूं पर फिर उन पर तरस आ जाता है। वैसे मैंने तुम इंसानों को इतनी अक्ल दी है कि बिना पंख आकाश में उड़ने के सामान बना सको।’
वह इंसान बोला-‘वह सामान तो बहुत है पर वहां पेट्रोल की वजह से एयर लाईनों में किराये बढ़े गये हैं और उसमें अमीर ही उड़ सकते हैं या आपके ढोंगी भक्त! गरीब आदमी का क्या?’

सर्वशक्तिमान ने कहा-‘गरीब आदमी जिंदा तो है न! अगर उसे पंख लगा दिये तो भी उड़ नहीं सकेगा। अभी गरीब आदमी को कहीं बैल की तरह हल में जोता जाता है और कहीं उसे घोड़े की जगह जोतकर रिक्शा खिंचवाया जाता है। अगर पंख दिये तो उसे अपने कंधे पर अमीर लोग ढोकर ले जाने पड़ेंगे। इंसान को इंसान पर अनाचार करने में मजा आता है और इस तरह तो गरीब पर अनाचार की कोई सीमा ही नहीं रहेगी। वैसे तुम क्यों फिक्र कर रहे हो।
वह इंसान बोला-‘महाराज, मैं तो बस जिंदगी भर आकाश में उड़ना चाहता हूं।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘अब तो बिल्कुल नहीं। तुम इंसानों को अक्ल का खजाना दिया है पर तुम उसका इस्तेमाल पांव से चलने पर भी नहीं कर पाते तो उड़ते हुए तो वैसे ही वह अक्ल कम हो जाती है। इतनी सारी दुर्घटनाओं के शिकार असमय ही यहां चले आते हैं और जब तक उनके दोबारा जन्म का समय न आये तब तक उनको भेजना कठिन है। उनसे पूरा पुराना अभिलेखागार भरा पड़ा है। अगर तुमको आकाश में उड़ने के लिये पंख दिये तो फिर ऐसे अनेक पुराने अभिलेखागार बनाने होंगे। अब तुम जाओ बाबा यहां से! कुछ देर बाद कहोगे कि सांप की तरह विष वाले दांत दे दो। अमीर तो अपनी रक्षा कर लेता है गरीब कैसे करेगा? जबकि उससे अधिक विष अंदर रहता ही है भले दांत नहीं दिये पर उसने तुम इंसान कहां चूकते हो।’
सर्वशक्तिमान ने उस जीव को नीचे ढकेल दिया।
...................................
यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Aug 1, 2009

एक अलबेला कौवा, नारियों के लिये हौवा-हिंदी हास्य व्यंग्य (ek albela kauva-hindi hasya vyangya)

एक टीवी समाचार चैनल पर प्रसारित यह समाचार अत्यंत दिलचस्प था कि एक गांव में एक अलबेला कौवा नारियों को चोंच मारकर परेशान कर रहा है। हालांकि उसमें एक तरफ तो यह कहा जा रहा था कि नारियों को परेशान किया जा रहा है दूसरी तरफ कह रहे थे कि वह युवा नारियों को छेड़ रहा है। अलबत्ता खबर से यह लगा कि वह चैंच मारकर भाग जाता है।
दरअसल उस कौवे ने एक पेड़ पर अपने अंडे रखे हैं और उस मोहल्ले की लड़कियां जब वहां से निकलती हैं तो वह उन पर हमला कर भाग जाता है।
एक स्त्री कहना था कि ‘उसने उस पेड़ पर अपने अंडे रखे हैं और शायद वह इस डर से हमले करता है कि लड़कियां उसके अंडे न उठाकर ले जायें।’
वहां महिलायें परेशान होने के बावजूद उसे एक मनोरंजक घटना भी मान रहीं थी। मजे की बात यह है कि वह कौवा पुरुष वर्ग के बारे में निश्चित है कि वह उसके अंडे नहीं ले जायेंगे।
एक महिला ने कहा-‘अगर वह कोई लड़का होता तो उसकी शिकायत करते पर इस छिछोरे कौवे की भला कहां शिकायत की जा सकती है।’
कहने को तो सभी कौवे काले रंग के होते हैं पर उनमें कुछ मादा भी होती/होते हैं-यह हम अनुमान से कह रहे हैं क्योंकि हमारी जानकारी में ऐसी कोई बात नहीं आई कि कौवे समलैंगिक होते हैं। जब मादा होगी तभी तो उसे बच्चे पैदा होते होंगे। इंसानों की तरह पशु पक्षियों में भी नारी जाति बच्चे की रक्षा करने के लिये तत्पर रहती है। कुछ पशु पक्षियों के बारे में कहा जाता है कि अपने बच्चे को खतरा देखकर उनकी मादा खूंखार हो जाती है। जैसे बिल्ली के बारे में कहते हैं कि वह किसी आदमी से अपने बच्चे को खतरा देखती है तो उसकी आंखों में पंजे गाड़ देती है।
जिस तरह यह समाचार प्रसारित हो रहा था उसमें सनसनी कम मनोरंजन अधिक नजर आ रहा था। ऐसे मनोरंजक प्रसारण भी समाचारों की श्रेणी में आते हैं जो सीधे निर्मित होते हैं न कि फिल्मी या खेल के वह समाचार जो बनते हैं कमाई के लिये और उनका विज्ञापन मनोरंजन के नाम पर किया जाता है।
बहरहाल उस कौवा की चर्चा बहुत दिलचस्प लगी। आखिर वह नारी जाति पर के लिये हौव्वा क्यों रहा है? क्या पिछले जन्म में वह कोई ऐसा नर था जिसे नारी ने धोखा दिया। वैसे कौवे द्वारा नारियों को छेड़ने की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले इंद्रपुत्र जयंत ऐसी खुराफात भगवान श्रीराम जी की अर्धांगिनी श्रीसीता जी से कर चुका है जिसमें उसने अपनी आंख गंवा दी थी। संभव है कि यह कौवा फिर प्रकट हुआ हो पर अब यहां इस धरती पर श्रीराम जैसा कोई चरित्र तो है नहीं जो उसकी दूसरी आंख निकाल सके। फिर जैसे वह चैदह पंद्रह वर्ष की युवतियों को छेड़ रहा है उससे यह भी संदेह हो रहा है कि वह उस इतिहास को पढ़ चुका है या स्वयं संबद्ध रहा है इसी कारण जिस युवती के पीछे पति रूपी रक्षक न हो उन्हीं पर अपनी चैंच संभवतः गड़ा रहा है।
बहरहाल इस तरह दूसरे कौवे भी करने लगे तो महिलाओं के लिये परेशानी और मनोरंजन दोनों ही होगा ं। कहते हैं कि झूठ बोले कौवा काटे! अगर दूसरी महिला को काट गया तो कह सकती हैं कि देखो झूठ बोलती होगी।’
खुद को काट जाये तो फिर सोचती होंगी-हाय! मैं तो कभी नहीं झूठ बोलती!’
मगर जमाने का क्या? वह तो यही कहेगा कौवा काट गया तो इसका मतलब यही है कि झूठ बोलती होंगी।’
वैसे दूसरे कौवे भी यह करने लगें तो आश्चर्य नहीं होगा। हो सकता है कि वह कौवा पूर्वाभ्यास कर रहा हो। आजकल झूठ बोलने का रिवाज बढ़ गया है। कौवा किसी को काट नहीं रहा है। ऐसे में समस्त कौवों को अपनी छबि की चिंता होगी। इसलिये संभव है कि वह कौवा अपनी जाति का दूत होकर विचर रहा हो कि देखें मनुष्य की तरफ से किस तरह की प्रतिक्रिया होती है। वह अपना प्रतिवेदन कौवा महासम्मेलन में प्रस्तुत कर सकता है और फिर उसके निष्कर्षों के आधार पर बाकी कौवे भी सक्रिय हो जायें तो कोई आश्चर्य नहीं है।
आजकल मोबाइल आ गया है। लोग अधिक ही झूठ बोलते हैं।
लड़की ने मोबाईल उठाया। बात की और रख दिया। मां ने पूछा-‘किसका फोन था?’
‘फैंड्स का था-’कहीं भी ऐसा जवाब सुनने को मिल सकता है।
अब यह फैं्रड्स लड़का भी हो सकता है और लड़की भी! मां यह सोचकर चुप हो जाती है कि ‘लड़की का होगा’। लड़कीे चालाकी दिखाती है। उसने मां से झूठ न बोलकर अपने दिल को तसल्ली दी कि ‘मां से झूठ नहीं बोलकर मैंने अपना धर्म निभाया।’
यही स्थिति लड़के की भी है। फोन उठाता है। बात कर मोबाइल अपने हाथ पकड़ कर चल देता है। बाप पूछता है कि-‘कहां जा रहे हो?’
‘फैं्रड्स से मिलने।’यह भी जवाब अक्सर सुनने को मिलता है।’
अभी तक माता पिता यही मानकर चलते हैं कि वह समलैंगिक मित्र से मिलने जा रहा है-हालांकि इसका आशय अभी तक अच्छा था पर आगे यह बुरा लगने लगेगा। जो पाठक इस पाठ को पचास वर्ष बाद पढ़ें तो यह बात ध्यान रखें कि समलैंगिक से आशय केवल इतना ही है कि लड़का अपने मित्र लड़के और लड़की अपनी सहेली से केवल वार्तालाप करने जा रही है। पचास वर्ष बाद तो समलैंगिक शब्द ही खतरनाक होने वाला है यह हमें आज ही पता है।
आप सोच रहे होंगे कि लड़के भी झूठ बोलते हैं तो कौवा उनको शायद नहीं काटेगा तो यह भ्रम भी निकला दीजिये। इसी कार्यक्रम में एक दूसरे कौवे का जिक्र भी था जिसमें वह एक ग्रामीण को परेशान कर रहा है। वह ग्रामीण तमाम तरह के तंत्र मंत्र कर चुका है पर वह कौवा उसका पीछा नहीं छोड़ रहा है। यह कौवा बड़ा चालाक पक्षी है। यह तो पता नहीं कि दोनों घटनाओं में वह झूठ बोलने के कारण हमले कर रहा है या नहीं पर हो सकता है कि यह केवल अभ्यास हो बाद में कौवा जाति केवल झूठ बोलने वालों पर ही हमला करे।
दरअसल यह कौवा इस देश में ही इसलिये बचा हुआ है कि अभी भी इस देश में पुरानी अध्यात्मिक वृत्ति के लोग अधिक हैं। अगर देश से कहीं बाहर होता तो अभी तक दोनों कौवों को मारकर उनका मांस खा लिया जाता। तिस पर नारी जाति पर आंख डालने पर तो पूरी कौवा कौम ही मिटा दी जाती। हमारा अध्यात्मिक दर्शन सभी प्रकार के जीवों के साथ सहिष्णुता से जीना सिखाता है पर यह सभी जगह नहीं है। बाकी जगह तो इंसान के लिये पशु पक्षी क्या दूसरे ऐसे इंसान को भी मिटा दिया जाता है जो समूह के कायदे और कानून नहीं मानता या विद्रोह करता है।
................................................
यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

जेब में पैसा कम पर सपने अमीरी से सजे हैं-हिन्दीक्षणिकायें (zeb mein paisa kam par sapne se saje hain-HindiShort poem}

हमारा विश्वास छीनकर उन्होंने अपनी आस खोई है। अपने ही पांव तले तबाही वाली घास बोई है। ------ जेब में पैसा कम पर सपने अमीरी से स...