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Apr 7, 2018

पाप पुण्य कभी नहीं मरें, इंसान का पीछा बछड़े जैसे करें-दीपकबापूवाणी (Paap punya kabhi nahin maren-DeepakBapuWani)


अमन का पसंद नहीं उनको राग
वैमनस्य की लगा रहे आग।
कहें दीपकबापू सब देते दगा
मिलजुलकर छिपा रहे अपने दाग।
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घोटाले पर आंदोलन का घेरा है,
अपना हिस्सा मिले तो मुंह फेरा है।
कहें दीपकबापू सच्चा साधु वही
कहें जो माया मेरी राम भी मेरा है।
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माथे पर लगाये हुए चंदन
मन में माया के लिये क्रंदन।
कहें दीपकबापू त्यागी बने पाखंडी
बांध रहे गले राजसी बंधन।
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पाप पुण्य कभी नहीं मरें,
इंसान का पीछा बछड़े जैसे करें।
कहें दीपकबापू बता गये चाणक्य
सच सामने आता झूठ से डरें।
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Feb 11, 2018

नये ताजा चेहरे समय से पुराने हो गये-दीपकबापूवाणी (naye taza chehahe samay se purane ho gaye-DeepakBapuWani)

आंखें तरेरे मुट्ठी भींचे जंग के लिये दिखें तैयार, थोड़े देर में बनेंगे अमन के यार।
‘दीपकबापू’ वीरता के लंबे चौड़े बयान करें, नकली गुस्सा बेचकर करते झूठ से प्यार।।
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शब्दों का जाल श्रोताओं को फांस रहे हैं, दर्द का इलाज करने वाले खांस रहे हैं।
‘दीपकबापू’ भावनाओं का व्यापार करते, जिंदादिल मतलबपरस्ती में ले सांस रहे हैं।
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नये ताजा चेहरे समय से पुराने हो गये, प्यार के रिश्ते बिछड़कर अनजाने हो गये।
‘दीपकबापू’ जिंदगी में यादों का भंडार भरा है, भुलाने के भी बहुत बहाने हो गये।।
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इधर लात मारे उधर प्यार की माया बुने माला, पीछे लगे बहुत हाथ किसी ने नहीं डाला।
‘दीपकबापू’ झाड़ू घुमायें रोज दीवार पर, मकड़ियां इधर उधर बना लेती फिर नया जाला।
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सफेद वस्त्र भी स्वच्छ चरित्र की पहचान कहां, भरे भंडार पर दानी की शान कहां।
‘दीपकबापू’ ज्ञानचक्षु बंद कर देखें सब, पांव न धरें लालची का होता सम्मान जहां।।
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Mar 22, 2017

हर ताबूत में एक बुत भरा है-दीपकबापूवाणी (Har tabut mein ek but Bhara hai-DeepakBapuWani)

जहान के सहारे से अपनी जरुरत धरे, दिल में मदद का ख्याल रखे परे।
‘दीपकबापू’ बंजर जमीन पर खड़े होकर, श्रमहीन सोना पाने की चाह करे।।
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आमजन जन्मदिन याद नहीं रखता, खास की तरफ हर कोई तकता।
‘दीपकबापू’ लिख कथा मिटा देते, प्रेम शब्द कोई हिसाब नहीं रखता।।
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घुमाफिरा कर अपनी बात कहते हैं, सच के साथ डरकर रहते हैं।
‘दीपकबापू’ कायरों के जमघट में, सभी मुर्दों की कहानी कहते हैं।।
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हर ताबूत में एक बुत भरा है, जिंदगी में हारने से हर कोई डरा है।
‘दीपकबापू’ मस्ती खरीदें बाज़ार से, फिर भी दिल बोरियत में मरा है।।
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सच है लातों के भूत बातों से न माने, जब प्यार करो तो घूंसा ताने।
‘दीपकबापू’ मानवाधिकारों के चिंतक, भले बुरे इंसान में फर्क न माने।।
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तिलक लगाकर चलें भक्त कहलाते, नृत्य गायन से दिल आसक्त बहलाते।
‘दीपकबापू’ भक्ति की पहचान रंग बनाये, तस्वीर दिखा सदा वक्त टहलाते।।
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उनके अपने दिमाग एकदम हिले हैं, दूसरे इंसानो से बहुत शिकवे गिले हैं।
‘दीपकबापू’ घर से निकले लालच के साथ, सामने ताकतवर लुटेरे मिले हैं।।
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जीतें तो  तेजी से अपना कोष  बढ़ायें, हारें तो मैदान पर रोष चढ़ायें।
‘दीपकबापू’ खिलाड़ी होकर अक्ल खो दी, कर्म का भाग्य पर दोष मढ़ायें।
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सिंहासन पाने के लिये चलाते अभियान, जलकल्याण पर देते नये बयान।
‘दीपकबापू’ पांव पर चलाते बितायी जिंदगी, दर्द भूल जाते चढ़ते ही यान।।
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