Mar 30, 2015

इंसान जैसे मौसम के तेवर-हिन्दी कविता(insanon jaise mausam ke tewar-hindi poem)

कभी धूप से तपता शहर
पल भर मे बादल बरस जाते हैं।

मौसम ने शायद इंसान से
तेवर उधार लिये हैं
उसका कहर ऐसा कि
इंसान दया के लिये
तरस जाते हैं।

कहें दीपक बापू जमीन पर
धूप दिन बिताकर
चली जाती है
बादलों को भी कहां
यहां बस्ती बसाना है
तबाही के गीत
वह इसलिये सरस गाते हैं।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Mar 25, 2015

जीवन तत्व-हिन्दी कविता(jivan tatva-hindi poem)




 कहीं बादल ऐसे बरसे
धरती पर उगा सोना
राख कर गये।

कहीं बूंद बूंद को
इंसान इतना तरसे
आकाश से निकले
दिल खाक कर गये।

कहें दीपक बापू जिंदगी टिकी है
धूप हवा और पानी की
दरियादिली पर
इंसान ने जब भी
दिखाई धरती से  बेरुखी
जीवन तत्व तब मुंह फेरकर
अपनी धाक कर गये।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Mar 20, 2015

प्रचार के सौदागर-हिन्दी कविता(prachar ke saudagar-hindi poem)



प्रचार के सौदागर
ज़माने पर लगे जख्म भी
सामान की तरह
सजा लेते हैं।

दिल के ग्राहक का
दिमाग जीतने के लिये
मातमी धुन भी बजा लेते हैं।

कहें दीपक बापू ताली बजाकर
जितवा देते हैं
जिंदगी की हर जंग,
भौंपू की आवाज से
सोच कर देते तंग,
कहीं कत्ल हो
कहीं हो जाये जश्न
अपनी तिजोरी भरने का
वही मजा लेते हैं।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Mar 14, 2015

भूख की ताकत-हिन्दी कविता(bhookh ki taqat-hindi poem)


यह भूख की ताकत है
टूटे बर्तन में
सूखी रोटी भी
हजम हो जायेगी।

अभाव से लड़ती देह की
परिश्रम करने में
शरम खो जायेगी।

कहें दीपक बापू हमदर्दी से
चलता है जिनका रोजगार
उनसे आशा करना व्यर्थ है,
पाखंड में ही उनका अर्थ है,
अपने पसीने की
बहती धारा पर यकीन रखना
वही मरहम हो जायेगी।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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आओ खूबसूरत चरित्रों की फिक्र करें-दीपकबापूवाणी (Aao Khubsurat charitron ki Fikra kahen-DeepakBapuwani)

जिससे डरे वही तन्हाई साथ चली , प्रेंमरहित मिली दिल की हर गली। ‘ दीपकबापू ’ हम तो चिंगारी लाते रहे अंधेरापसंदों को नह...