Feb 28, 2008

किसी को रात डराती है तो किसी को दिन-हिन्दी शायरी

हमने देखा था उगता सूरज
उन्होने देखा डूबता हुआ
वह कर रहे थे चंद्रमा की रौशनी में
जश्न मनाने की तैयारी
पर हमने देखा था पूरा दिन
हमारा मन भी था डूबा हुआ
वह आसमान में टिमटिमाते तारों की
बात करते हुए खुश हो रहे थे
जबकि हमारा बदन था
तब भी पसीने की बदबू लिया हुआ
सबकी जमीन और आसमान
अलग-अलग होते हैं
किसी को रात डराती है तो किसी को दिन
किसी को भूख नहीं लगती किसी को सताती है
इसलिए सब होते हैं अकेले
क्योंकि कोई किसी का नहीं हुआ
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Feb 1, 2008

क्या तुमने यह ख्वाब देखा है-कविता साहित्य

जाने-पहचाने सफर पर तो
रोज चलते हैं
पर कभी अनजाने सफर पर
चलकर भी देखा है
जान-पहचान के लोगों से
मिलकर तो रोज
कभी जानी हुई बात करते हैं
पर क्या कभी अनजान लोगों से
अपने को अनजानी बाते करते देखा

रोज वही चेहरे और वही स्वर
मन को नहीं लुभा सकते
चाहे कितने दिल और देह के करीब हों
कभी अपने मन को
अनजानों में एक अनजान की तरह
घूमने के लिए तरसते देखा है
जाने-पहचाने लोगों की महफ़िल में
भला कहाँ प्यार मिल पाता है
कभी अनजान चेहरों में
तुमने हमदर्दी का भाव देखा है

दुनिया उससे बहुत बड़ी है
जितनी तुम देखते हो
इस छोर से उस छोर तक
बहुत कुछ है देखने लायक
पर क्या तुमने उसको अपने से
दूर तक देखने का ख्वाब देखा है

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर-दीपकबापूवाणी (man ke khet par dhan ka Chakkar-DeepakBapuwani)

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर, वैभव रथ पर सवार देव से लेता टक्कर। ‘दीपकबापू’ आदर्श की बातें करते जरूर, रात के शैतान दिन में बनते फक्कड़।।...