Sep 24, 2013

नैरोबी के मॉल पर हमलाःफिल्म और धारावाहिकों के लिये सामग्री बन ही गयी-हिन्दी लेख(ataick on nerobi in mol:Narobi ke mol par hamla:film aur tv episond ke liye samagri ban he gayee-hindi lekh or article)



                        कीनिया के नैरोबी में मॉल पर आतंकवाद हमले के जो समाचार प्रचार माध्यमों में देखने, सुनने और पढ़ने को मिले उससे तो यही लगता है कि आने वाले दिनों में इस पर अनेक फिल्में बन जायेंगी और जमकर व्यवसाय करेंगी।  इसका मुख्य कारण उसकी खलपात्र एक खूबसूरत महिला के होने का जमकर प्रचार होना  है जो ब्रिटेन की गौरवर्ण वर्ग से संबंध रखती थी।  विश्व में आतंकवाद एक पेशा बन गया है।  हम जैसे लोगों का इस बात पर यकीन करना अत्यंत कठिन काम है कि बिना लोभ और लालच के कोई इसमें शामिल हो सकता है। अगर धर्म के लिये युद्ध करते हुए मर जाने पर स्वर्ग मिलने की चाहत है तो वह भी एक भ्रम है पर अंततः वह एक लालच ही है। बहरहाल हम इस मसले पर सामान्य से कुछ हटकर सोच रहे हैं। हमारी सोच का आधार ऐसे मसलों पर होने वाली बहसें तथा अन्य ऐसे समाचार हैं जो कुछ अलग सोचने को विवश करते हैं।
                        पहली बात तो यह है कि कीनिया के इस मॉल पर हमला होते ही इजरायल के कमांडो वहां कार्यवाही के लिये पहुंच गये। उन्होंने बाकी बंधकों को हानि पहुंचे बिना उनको मुक्त करवाने के साथ ही  अंदर मौजूद आतंकवादियों को परास्त किया।  अभी तक ऐसी घटनाओं में कभी इजरायल के ऐसे मामलों में शामिल होने की बात सामने नहीं आयी थी।  मुंबई पर हमले के समय इजरायल से अपने कमांडो भेजने का प्रस्ताव भारत को दिया था पर उसे नहीं माना गया।  उस प्रसंग में यहूदियों को भी लक्ष्य किया गया था और इजरायल अपने धर्म का दुनियां भर में खैरख्वाह होने का दंभ भरता है इसलिये उसने ऐसा प्रस्ताव दिया होगा।  अब इजरायल ने अपनी भड़ास निकाली।  क्या इजरायल किसी ऐसे अवसर के इंतजार में था या फिर उसकी खुफिया एजेंसियों ने कहीं न कहीं अपने सूत्रों से इस तरह की संभावित घटना का अनुमान कर लिया था पर बताया नहीं क्योंकि वह चाहते थे कि उनके देश को अपना पराक्रम दिखाने का अवसर मिले।  वैसे अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि विश्व भर में फैले आतंकवादियों को कहीं न कहीं खुफिया एजेंसियों का संरक्षण मिलता हैै। अफगानिस्तान में अमेरिका की खुफिया एजेंसी ने तो बकायदा रूस के खिलाफ ऐसे ही आतंकवाद की मुहिम चलायी थी।  इजरायल की खुफिया एजेंसी का नाम कम आता है  पर कहीं न कहीं वह भी अमेरिका के साथ तालमेल करती रही है।
                        एक तरह से एक धर्म विशेष के आतंकवादी दावा तो यह करते हैं कि वह अमेरिका तथा इजरायल के विरुद्ध हैं पर हम देखते हैं कि उनकी वारदातों के बाद इन दोनों देशों को अपना पराक्रम दिखाने का अवसर मिल ही जाता है। ऐसे में अनेक प्रकार के संदेह तो होते ही हैं खासतौर से तब जब  इतिहास इन्हीं आतंकवादियों के साथ उनके रिश्ते होने की बात को प्रमाणित करता है।  इन दोनों देशों के पास नित नये प्रकार के हथियार बनते हैं जिनकी प्रयोगशाला ऐसी ही आतंकवादी घटनायें साबित होती हैं। संभव है इस प्रकार के आतंकवादियों में कुछ  इनकी खुफिया एजेंसियों से जुड़े हों जो समय आने पर इस तरह के छोटे छोटे युद्धों की पटकथा लिखते हों।  दूसरी बात यह है कि पूरे विश्व में काले और सफेद धंधे वालों का समन्वय बन गया है।  सफेद धंधे वाले भी अपनी अपनी शक्ति बढ़ाने के लिये काले धंधे वालों से संबंध बना ही लेते हैं।  फिल्म बनाने का धंधा आजकल चोखा है।  फिल्म न बने तो धारावाहिक भी बन ही जाते हैं। ऐसे में एक खूबसूरत सफेद विधवा के आतंकवादी बनने पर ढेर सारी कहानियां बन सकती है। यह अलग बात है कि अब उसे प्रमाणित करना कठिन काम है। यह अलग बात है कि फिल्म और टीवी धारावाहिकों के लिये एक कीमती मसाला तो मिल ही गया है जिसका लाभ अंततः इन धनपतियों को ही होगा।
            जिस महिला का जिक्र हो रहा है वह ब्रिटेन की है।  उसका पति किसी आतंकवादी घटना को अंजाम देते ही मारा गया था।  उसे दो बच्चे भी हैं।  पति के मरने पर वह स्वतः भी आतंकवादी बनी बल्कि वह चाहती थी कि उसके बच्चे भी आतंकवादी बने।  उसकी सामग्री इंटरनेट पर है जो उसे आतंकवादी प्रमाणित करनी पड़ती है।  कहा गया कि इस हमले का संचालन वही महिला कर रही थी।  अब वह मारी गयी हैं।  मॉल के हमले के बाद उसमें मरे लोगों पर चर्चा कम उस सफेद विधवा की चर्चा अधिक हो रही थी।  एक अलग से कहानी चल रही थी।  प्रश्न यह है कि उस महिला को किसने देखा? क्या वही थी या किसी अन्य महिला के वहां होने पर ऐसा प्रचार किया गया? क्या इंटरनेट पर उसकी सामग्री को प्रमाणिम मान लिया जाये या फिर माना जाये कि उसे भविष्य की खलपात्रा के रूप में स्थापित करने के लिये सृजित किया गया? नैरोबी के मॉल में जब लोग मर रहे थे तब क्या मीडिया में बैठे कुछ बुद्धिमान लोग हॉलीवुड की फिल्म के लिये कोई सामग्री जुटा रहे थे? इस तरह संभावनायें इसलिये लगती हैं क्योंकि हॉलीवुड सत्य घटनाओं पर फिल्म बनाकर जमकर पैसा कमाता है।  वैसे भी पूरे विश्व में अमेरिका की पहचान  आधुनिक हथियारों और फिल्म के निर्माण के कारण ही है। दूसरे यह भी कि काले और सफेद धंधे वालों को कहीं न कहीं से पैसा चाहिये।  विश्व में आतंकवाद बढ़ा है तो हथियारों की बिक्री तथा उस पर बनी फिल्मों के व्यवसाय में वृद्धि हुई है। हम अपने देश में देख लें। मान लीजिये यहां बिल्कुल आतंकवाद न होता तो या कोई ऐसी फिल्में बनाता।  बनाता तो सामान्य एक्शन फिल्म होकर रह जाती।
                        शक का दूसरा कारण यह भी है कि प्रचार माध्यम इन खूंखार  आतंकवादियों को आकर्षण खलपात्र के रूप में प्रचारित करते हैं।  ऐसे प्रचारित करते हैं जैसे कि वह कोई आसमान से उतरे जीव हों।  हम जिस महिला का जिक्र कर रहे हैं वह मारी गयी। तय बात है उस पर अब कोई मुकदमा तो चलेगा नहंी कि यह साबित किया जा सके कि वही थी। प्रचार माध्यम जो कह रहे हैं उस पर इसलिये कोई प्रश्न उठाना संभव नहीं है क्योंकि उसकी प्रमाणिकता के लिये कोई सूत्र उपलब्ध नहीं है। मॉल का प्रसंग तीन दिन चला और उस पर कोई तीन घंटे की रोमांचक फिल्म बनाना कोई बड़ी बात नहीं है।
                        अगर हम देखें तो इस घटना में जो आतंकवादी मरे वह भी कोई संपन्न नहीं थे और जिन निर्दोष लोगों को मारा भी कोई बड़े लोग नहीं थे।  अगर होते तो क्या वह इस मॉल में खरीददारी करने जाते, घर पर ही सामान नहीं मंगवा लेते। इस तरह आम आदमी का आम आदमी के विरुद्ध  यह ऐसा युद्ध था जो अंततः धनपतियों को लाभ देगा।  इस घटना के कारण सुरक्षा के वह उपकरण अवश्य दूसरे देश खरीदेंगे जो इजरायल या अमेरिका बनाते हैं।  हम अपने ही देश में देखेंगे अनेक जगह मॉल, मंदिर और पुरात्तव स्थानों पर पहले अंदर जाने के लिये मेटल डिक्टेटर   लगे फिर जब आतंकवाद के साथ अन्य अपराध बढ़े तो  सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर  सीसीटीवी कैमरे लग गये हैं।  अगर आतंकवाद न आता तो क्या सब बिकते। भारत बड़ा देश है और यह किसी एक वस्तु का जब प्रचलन बढ़ता है तो वह खरबों रुपये का व्यवसाय करती है। यह कारण है कि कुछ बुद्धिमान लोग आतंकवादियों को मिलने वाले धन का पता लगाने की मांग करते हैं।  इस तरह के संदेहों को जन्म अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल के साथ ही उन देशों ने भी दिया है जो आतंकवादियों को अपने यहां पनाह देते हैं या फिर मानवाधिकारेां के नाम उनको संरक्षण प्रदान करते हैं।  अगर आतंकवाद पनपने के बाद हथियारों की बिक्री और उन पर बनी फिल्में खरबों रुपये का व्यापार नहीं करती तो यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण लग सकता था पर कछ बुद्धिमान लोग इसे सत्य वचन कहकर प्रचारित करते हैं।   बहरहाल यह हमारे अनुमान ही है सच क्या है कोई नहीं जानता?  जो जानते हैं वह बतायेंगे नहीं और जो जानते नहीं वह ऐसे अनुमान करते रहेंगे। यह सिलसिला चलता रहेगा।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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