Jun 11, 2017

गर्मी की तपती धूप देह को जलाती है-हिन्दी में छोटी क्षणिकायें (Garmi ki Tapti Dhoop deh ko jalate hai-ShortHindiPoem)

मौसम के साथ दिल के
मिजाज भी बदल जाते हैं।
जिंदगी से यूं ही निभायें
हालातों से ख्याल भी
बदल जाते हैं।

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जिंदगी के चलते दौर
हर बार साथी बदल जाते हैं।
कुछ की यादें साथ चलतीं
कुछ भूले में बदल जाते हैं।
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हर बार नयी काठ की हांडी
आग पर चढ़ जाती है।
नया रसोईया देखकर
स्वाद की उम्मीद जो बढ़ जाती है।
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बाज़ार लगा है
पशु पक्षी क्या
इंसान भी बिकते हैं।
दुकानों में अमीर
ग्राहक और विक्रेता
हमेशा ही दिखते हैं।
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नाम के राजा
काज तो ऊपरवाला ही
चला रहा है।
लोभियों ने शहर में लगाई आग
कहते हैं भूखा जला रहा है।

अपना हमारा दुश्मन
एक दिखाकर हाथ मिलाया।
हमारे कंधे पर शिखर चढ़े
उससे अपना गला मिलाया।
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कहीं जीतने की जंग
कहीं खरीद के रंग
जमीन की लड़ाई जारी है।
कभी बंदूकधारी जीते
कभी धनी की बारी है।
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गर्मी की तपती धूप
देह को जलाती है।
पीड़ा इतनी कि
दिल में पल रहे
दर्द को भी गलाती है।
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चिंताओं में डूबे हैं
चित्तक कहलाते हैं।
दुनियां का डर बेचकर
सबका दिल बहलाते हैं।
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उनके नाम के सहारे ही
जिंदगी भर चलते रहे।
हालात बिगड़े तब आया ज्ञान
भारी भ्रम में पलते रहे।

संगमरमर के पत्थर से बने
महलों में भी क्या रखा है।
जब शब्दज्ञान का हर रस
दिल दिमाग ने चखा है।
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पर्दे पर सपने बेचने वाले
हांका लगाते हैं।
लटकायें सुंदर पर खाली झोली
पर चालाकी का टांका लगाते हैं।
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मांगते तो सामनों का
ढेर जुटा लेते।
चाही दर्द की दवा
मिलती जाती बेबसों में
ढेर लुटा देते।
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पैसे पद प्रतिष्ठा के
तख्त पर बैठे
क्या गरीब का भला करेंगे।
वातानुकूलित कक्ष में पैदा ख्याल
धरा पर क्या चला करेंगे।
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आज भी पापों के घड़े
कभीकभी फूट जाते हैं।
यह अलग बात भरने वाले
जमानत पर छूट जाते हैं।
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फरिश्ता बनने की चाहत
बंदे को मसखरा बना देती है।
त्याग के तपयोगी को
आग सोना खरा बना देती है।
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छात्र किसान जवान के नाम
झंडा लगा देते।
भीड़ में इंसान जुटते
भेड़ की तरह
नारा लगाकर जगा देते।

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