Jun 25, 2017

चोर की बारात में प्रहरी में आते हैं-दीपकबापूवाणी (Chor ki barat mein prahari aate hain-DeepakBapuWani0

धन संपदा के लिये भक्ति करें, कामयाबी से अपने ही मन में आसक्ति भरें।
‘दीपकबापू’ चढ़े जाते महंगे मंच पर, स्वार्थ के सिद्ध प्रेम से अनासक्ति करें।।
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खेल में भी जुगाड़ चलने लगी है, सट्टे की झोली में हार जीत पलने लगी है।
‘दीपकबापू’ धरा छोड़ पर्दे पर देव बसाये, नजरों की ही अगरबत्ती जलने लगी है।।
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सलामत है हाथ जिसमें हथियार नहीं है, गद्दारी से बचा जिसके यार नहीं है।
‘दीपकबापू’ सोच रखीं जमीन पर सदा, आकाश का उनके कंधे पर भार नहीं है।।
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चोर की बारात में प्रहरी में आते हैं, फूहड़ों की महफिल अक्लमंद सजाते हैं।
‘दीपकबापू’ चरित्र का प्रमाण नहीं जांचते, सभी अपने गिरेबां से घबड़ाते हैं।।
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आशा निराशा के बीच लोग झूले हैं, बुलाते कमजोरियां अपनी ताकत भूले हैं।
‘दीपकबापू’ दलालों से करते सुलह, मन उड़े पर पांव चले नहीं पेट जो फूले हैं।।
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आतंक के व्यापार में बहुत लोग पलते, हर वारदात पर विज्ञापन के दिये जलते।
‘दीपकबापू’ हथियारों का खोला कारखाना, शांति कराने हवाई जहाज में चलते।।
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पसीने के मालिक खुले आकाश में सोये हैं, पूंजपति वह जो ठगी के बीज बोये हैं।
‘दीपकबापू’ पहरेदार नाम अपना धर लिया, मगर लुटेरों के आभामंडल में खोये हैं।।
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लोहे लकड़ी के सामान में आसक्ति रखते, ऊंचे दाम चुकाकर भक्ति रस चखते।
‘दीपकबापू’ रूप स्वर गंध की पहचान नहीं, चिंत्तन मे अहंकार का भाव रखते।।
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दिल में मजे की आग जला देते हैं, वासना में देशभक्ति भी चला देते हैं।
‘दीपकबापू’ सौदागरों के चालाक ढिंढोरची, इंसान की अक्ल गला देते हैं।।
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चाहतों में हर पल इंसानी मन डूबा है, बहला लो हर तरह फिर भी ऊबा है।
‘दीपकबापू’ विलासिता में सुख ढूंढता, भीड़ में खड़े फिर भी अकेले में डूबा है।
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बाज़ार में लगे खरीददारों के मेले, भीड़ दिखती पर स्वार्थ से खड़े सभी अकेले।
‘दीपकबापू’ जो मिले उसे यार कहें, जानते हुए कि दाम पर वफा के लगे हैं ठेले।।
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अपनी नाकामी पर कसूर पराया बतायें, मन में विष ज़माने का सताया जतायें।
‘दीपकबापू’ मतलब से संबंध जोड़ें तोड़ें, काली नीयत से अपनी काया ही सतायें।।
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