Aug 4, 2007

जीवन के खेल निराले

आँखों से देखने की चाहत में
कई लोगों को गर्त में
गिरते देखा है
बोलने के लिए चाहे जैसे
शब्द दूसरों पर पत्थर की
तरह फेंकने वालों को
अपने ही वाक जाल में
फंसते देखा है
झूठ और दिखावटी अभिनंदन के
लिए उठने वाले हाथों को
हाथकडी में बंधते देखा है

इन सबसे परे होकर
जो रखते हैं अपने
मन पर नजर
जीभ से निकले शब्दों में
जिनके होता है मिठास
हाथ उठते हैं
जिनके केवल सर्वशक्तिमान के आगे
उन्हें ही सहज भाव से
जीवन जीते देखा है
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