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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


08-Aug-2011

जनभक्षी-हिन्दी व्यंग्य शायरियाँ (janbhakshi-hindi vyangya shayriyan)

जन जन के भले की बात करते हुए
कई फरिश्ते जनभक्षी हो गए हैं,
दाने खिलाने के लिए हाथ फैलाते हैं
जिनको खिलाने के लिए
वही जन उनके लिए
शिकार करने वाले पक्षी हो गए हैं।
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नरभक्षियों का समय गया
अब खतरा जनभक्षियों का हो गया है,
चेहरे काले नहीं खूबसूरत हैं,
हाथों में तलवार की जगह
जुबान के हर शब्द में प्यार है,
मगर जन जन के भले की बात
करने वाले इन फरिश्तों के लिए
आम इंसान
शिकार करने लायक पक्षियों जैसा हो गया है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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