Dec 24, 2014

राजस्वी और तपस्वी-हिन्दी कविता(rajsvi aur tapasvi-hindi poem)



धनस्वी कभी मनस्वी नहीं होते
आत्मविज्ञापन से
यशस्वी जरूरी हो जाते हैं।

राजपद पर तपस्वी
कभी नहीं विराजते
मिलता है जिनको सिंहासन
आत्मविज्ञापन से
तपस्वी जरूर हो जाते हैं।

कहें दीपक बापू पीड़ा से
कवितायें बनती हैं,
प्रगति के वादे होते
पर दवा नहीं बनती हैं,
ज़माने का दर्द के व्यापार में
लगे लोग हो जाते राजस्वी
आत्म विज्ञापन में
तपस्वी  जरूर हो जाते हैं
------------------------
 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
Post a Comment

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर-दीपकबापूवाणी (man ke khet par dhan ka Chakkar-DeepakBapuwani)

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर, वैभव रथ पर सवार देव से लेता टक्कर। ‘दीपकबापू’ आदर्श की बातें करते जरूर, रात के शैतान दिन में बनते फक्कड़।।...