Aug 30, 2015

हमने भी बांची है किताबें-हिन्दी कविता(hamane bhi baanchi hai kitaben-hindi poem)

ढेर सारी किताबें
ज्ञान बेचना नहीं आया,
चेलों को सजा देते
हम भी दुकान पर
सच की तरह झूठ
बेचना नहीं आया।
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खत का ज़माना
अब कहां रहा
बेतार से बात
यूं ही हो जाती है।
ढेर सारे शब्द बहते
समझ के झरने में
अर्थ की बूंदें खो जाती हैं।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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