Sep 6, 2015

हृदय के भाव-हिन्दी कविता(hridya ki bhav-hindi poem)


जुबान चलती जब कैंची की तरह
अक्ल के दरवाजे
बंद हो जाते हैं।

मतलबपरस्त करते शोरशराबा
वफा चाहने वालों के शब्द
मंद हो जाते हैं।

कहें दीपकबापू भीड़ से दूर
 अकेले में सोच से होता अहसास
कौन कितने पानी में हैं
तब हृदय के भाव
धारा में बहकर
छंद हो जाते हैं।
--------------
कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
Post a Comment

आओ खूबसूरत चरित्रों की फिक्र करें-दीपकबापूवाणी (Aao Khubsurat charitron ki Fikra kahen-DeepakBapuwani)

जिससे डरे वही तन्हाई साथ चली , प्रेंमरहित मिली दिल की हर गली। ‘ दीपकबापू ’ हम तो चिंगारी लाते रहे अंधेरापसंदों को नह...