Oct 19, 2015

मन के पतंगे-हिन्दी कविता(Man ke Patange-Hindi Kavita)

चंद लोग नारे लगाते
भीड़ वहीं जमा हो जाती है।

भलाई का नारा सबसे महंगा
 बिकने के बाद
छद्म साफ नीयत भी
कमा सो जाती है।

कहें दीपकबापू मन के पतंगे
सपनों में गंवा देते जान
ढूंढते तबाही में शान
झुलसाने के बाद
शमा खो जाती है।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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