Feb 15, 2014

विदुर नीति-काम निकलने के बाद कोई पूछता नहीं है(vidur neeti-kam nikalne ke baad koyee poochhta nahin hai)



      इस रंगीबिरंगी दुनियां का खेल निराला है।  सकाम रूप से लिप्त लोग अनेक बार यह सोचकर संताप भोगते हैं कि हमने दूसरों के लिये बहुत कुछ किया पर हमें सभी ने धोखा दिया। अपनी संतान को लेकर भी लोग अनेक प्रकार के ऐसे अनुभव करते हैं कि उन्होंने जिनके लिये जीवन जिया वही उनको छोड कर बाहर चले़ गये।  निष्काम भाव से काम करने वालों को कभी संताप नहीं होता। जिन लोगों ने भारतीय अध्यात्म दर्शन में मन बसा लिया है उनके लिये तो बस ही सिद्धांत होता है कि नेकी कर और दरिया में डाल।
      सुबह का समय धर्म के लिये आरक्षित है। इस दौरान जिसने तन और मन की कमाई कर ली उसे धन की चिंता नहीं सताती।  दोपहर के अर्थकाल के दौरान वह अपना मन सांसरिक कार्यों में उतना ही लगाता है जिससे देह का सात्विक  व्यवसाय से भरणपोष हो सके। वह  अपने सांसरिक दायित्वों का यह सोचकर निर्वहन करता है कि उनको किसी दूसरे पर छोड़ना न मुमकिन है न उचित।  ऐसे दायित्व पूरे हो जायें तो बहुत अच्छी बात है भले ही उसका कोई प्रत्यक्ष लाभ न हो पर मन को शांति तो मिलनी चाहिए।

विदुरनीति में कहा गया है कि
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षडिमें षटसु जीवन्ति सप्तमो नीपलभ्यते।
चौराः प्रमत्ते जीवन्ति व्यधितेषु चिकित्सकाः।।
प्रमादा कामयानेषु यजमानेषु याजकाः।
राजा विवदमानेषु नित्यं मूर्खेषु पण्डिताः।।
     हिन्दी में भावार्थ-कोई भी मनुष्य छह दूसरे प्रकार के मनुष्यों अपनी जीविका चलाता है, सातवें की उपलब्धि नहीं है। चोर असावधान, चिकित्सक रोगी, मतवाली स्त्रियां कामी, पुरोहित यजमान, राजा झगड़ालू तथा विद्वान मूर्खों से अपनी जीविका चलाता है।
षडेते ह्यमन्यन्ते नित्यं पूर्वोपकारिणम्।
आचार्य शिक्षिताः शिष्यः कृतदाराश्च मातरम्।।
नारीं विगतकायास्तु कृतार्थाश्चि प्रयोजकम्।
नांव निस्तीर्णकांतारा आतुराश्च चिकित्सकम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-छह प्रकार के लोग अपने उपकारी का समय आने पर तिरस्कार करते हैं। शिक्षा समाप्त होने पर शिष्य गुरु, विवाहित पुत्र पालकों, कामवासना शांत होने पर पुरुष स्त्री, कार्य निकलने पर पूरुष सहायक, नदी पार करने पर सवार नाव तथा स्वस्थ होने पर रोगी चिकित्सक का तिरस्कार करते हैं।

      जिंदगी लंबी है और इसमें लोग मिलते और बिछड़ते हैं। कुछ लोग काम करवाने के लिये निकट आते हैं और उसके बाद पूछते भी नहीं।  किसी के साथ वर्षों तक साथ काम करते हुए मित्रता हो जाती है।  जब वह कहीं चला गया तो भूल जाता है। निष्कामी लोग जानते हैं कि इस जीवन में मनुष्य भले ही दैहिक रूप से वैसा ही रहे पर उसका भाव स्थान, अर्थ तथा समय के अनुसार बदलता रहता है। कहा जाता है कि जो चूल पर साथ ही वही दिल के पास है। अगर हम श्रीमद्भागवत गीता का संदेश समझें तो मनुष्य त्रिगुणमयी माया के वश में होकर ही सारे काम करता है।  ऐसे वह जिस सांसरिक विषय से जुड़ता है पूरी तरह से उसमें समर्पित हो जाता है।  यह संभव है कि इस दौरान ही किसी व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बने पर जब उस विषय से दूर हो जाये तो यकीनन हमें भी उससे दूर होना पड़ेगा। ऐसे में स्वयं को पीड़ा देने की बजाय हमें सच्चाई का ज्ञान करना चाहिए।
      जीवन में प्रतिदिन नये दृश्य घटित होते हैं किसी में हम नायक होते हैं किसी में दूसरा इसका श्रेय पाता है। हमें किसी की उन्नति देखकर स्वयं पीड़ित होने की बजाय अपने काम पर ध्यान रखना चाहिए।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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