Mar 17, 2018

सिंहासन मिला अपनों से मुंह फेरा, लगाया इर्दगिर्द चमचों को घेरा-दीपकबापूवाणी (Sinhasan mila apnon se moonh Fera-DeepakBapuWani)


चाहतों का ढेर मन में पड़ा है,
तंत्रमंत्र करें कहीं खजाना गड़ा है।
कहें दीपकबापू मायाजाल में
हर शख्स वीर कैदी जैसे खड़ा है।
----
चंद्रमा जैसा कोई मनस्वी नहीं
सूर्य जैसा कोई तेजस्वी नहीं।
कहें दीपकबापू अमीर बहुत मिलते
कुबेर जैसा कोई यशस्वी नहीं।
---
श्रृंगार रस में सब मस्त हुए
वीर रस के पियक्कड़ पस्त हुए।
कहें दीपकबापू आभासी संसार में
सत्य के साझेदार अब अस्त हुए।
---
सिंहासन मिला अपनों से मुंह फेरा,
लगाया इर्दगिर्द चमचों को घेरा।
कहें दीपकबापू अंधे होकर बांटे रेवड़ी
गाते जायें क्या तेरा क्या मेरा।
----
राजपद पर रोगी चेहरे विराजे हैं,
मेकअप ऐसे किया जैसे ताजे हैं।
कहें दीपकबापू क्या हिसाब मांगें
जिनकी सांसों में बेसुर ढोलबाजे हैं।
---
भलाई के नाम पर लूट मचायें,
मदद की आड़ बेईमान छूट पायें।
कहें दीपकबापू जो बने धर्मरक्षक
अर्थनीति से समाज में फूट लायें।
----

Post a Comment

जवानी भी नशे में चूर होती-दीपकबापूवाणी (Jawani Bhi nashe mein chooh hotee=DeepakBapuwani)

जवानी भी नशे में चूर होती किस्मत है कि जोश में भटके नहीं। ‘दीपकबापू’ साथ ईमान नाम भी खो देते वह भले जो इश्क में अटके नहीं। --- ...