Oct 23, 2007

अनुभूति

अपने अन्दर ही अपने पर
जब यकीन नहीं होता
तब किसी दूसरे पर
कोई कैसे भरोसा करेगा
जैसे मन में होगा खुद का चेहरा
वैसा ही दूसरे का भी लगेगा
तुम कितना चाहो
उधार की रौशनी से
तुम्हारा मन रोशन हो जाये
वह कभी संभव नहीं
क्योंकि जब तक तुम
खुद के नहीं बन सकते
तब क्या लगेगा गैर भी अपना
तुम्हें तो अपना भी गैर लगेगा
------------------------
Post a Comment

आओ खूबसूरत चरित्रों की फिक्र करें-दीपकबापूवाणी (Aao Khubsurat charitron ki Fikra kahen-DeepakBapuwani)

जिससे डरे वही तन्हाई साथ चली , प्रेंमरहित मिली दिल की हर गली। ‘ दीपकबापू ’ हम तो चिंगारी लाते रहे अंधेरापसंदों को नह...