Oct 19, 2008

कागज़ की हांडी में अनेक बार दाल पकाई जाती है-व्यंग्य कविता

काठ की हांडी में दाल
एक ही बार पकाई जाती है
इसलिए अब कोई नहीं चढाता
क्योंकि कागज़ की हांडी
बिना सिगडी पर चढाये
एक नहीं अनेकों बार दाल पकाई जाती है

कागज़ के टुकड़े पर लिख कर दे दो
ढेर सारे वादे और आश्वासन
फ़िर कही जमा लो अपने प्रभाव का आसन
दाल न कही रखनी हैं
भला किसे कभी चखनी है
ना हांडी कहीं दिखनी है
पर पकती रहने की अनभूति दिलायेगी
लोगों में बस उम्मीद जगायेगी
कागज़ की हांडी में दाल
बस ऐसे ही पकाई जाती है

फ़िर अवसर आते ही
दूसरे कागज़ की एक दूसरी हांडी बना लो
तारीखे और मज़मून बदल दो
कौन देखता है पिछला इतिहास
लोगों की याददाश्त कमजोर पाई जाती है
न सिगडी पर रखने का झंझट
अपने घर में रहे तो नहीं लग सकता कट
फाईलों में रखे रहो तो नहीं रही फट
इसलिए ही कागज़ की हांडी में
अनेक बार दाल पकाई जाती है

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