Aug 19, 2010

ऊंची जमात की दावत-हिन्दी व्यंग्य कविता (oonchi jamat ki davat-hindi vyangya kavita)

खज़ाना लूटकर लुटेरे
करने लगे व्यापार,
बांटने लगे उधार,
इस तरह साहुकारों और सौदागरों भी
ऊंची जमात में शामिल हो गये,
क्योंकि उन सामंतों को मिला अपना हिस्सा
जिनको ज़माने की जागीर मिली
विरासत में,
इंसानियत के कायदे रहे जिनकी हिरासत में,
उन्होंने दौलत और शौहरत की ख्वाहिश पूरी करने के लिये
दरियादिली के इरादे कब्र में दफन कर दिये,
और तसल्ली कर ली यह सोचकर कि
वह ऊंची जमात की दावतों में जाने के काबिल हो गये।
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Aug 13, 2010

खिलाड़ी नहायेगा क्या, निचोड़ेगा क्या-हिन्दी हास्य कविता (sport's lovers couple-hindi comic poem)

आशिक ने माशुका से कहा
‘तुम आज जाकर अपने माता पिता से
अपनी शादी की बात करना,
मेरी प्रशंसा का उनकी आंखों के सामने बहाना झरना,
उनको बताना
मेरा आशिक कई खेलों का खिलाड़ी है,
अपने प्रतिद्वंद्वियों की हालत उसने हमेशा बिगाड़ी है,
हॉकी में बहुत सारे गोल ठेलता है,
तो कुश्ती के लिये भी डंड पेलता है,
बहुत दूर तक भाला उछालता है,
तो बॉल भी उछल कर बॉस्केट में डालता है,
देखना वह खुश हो जायेंगे,
तब हम अपनी शादी बनायेंगे।’

जवाब में माशुका बोली
‘‘मैंने उनको यह सब बताया था,
पर उनको खुश नहीं पाया था,
उन्होनें मुझे समझाया कि
‘खिलाड़ी नहायेगा क्या
निचोड़ेगा क्या,
जो क्रिकेट नहीं खेले वह खिलाड़ी कैसा,
पैसा न कमाये वह होता अनाड़ी जैसा,
अगर खेल प्रतियोगिता का ठेकेदार होता
तो बात कुछ बनती,
कहीं मैदान बनवाता तो कहीं खरीदता खेल का सामान
तब कमीशन लेने पर ही जिंदगी उसकी छनती,
हमने तो बड़े बड़े खिलाड़ियों को सोने का पदक
पीतल के भाव बेचते देखा है,
कईयों को ठेला खींचते भी देखा है,
खेलने में मज़दूरी जितनी कमाई,
भला किसके काम आई,
अगर हो कोई खेल प्रबंधक तो ही
रिश्ता मंजूर है,
वरना उसके लिये दिल्ली अभी दूर है,’
इसलिये तुम खेलना बंद करो,
या मुझे भूल जाओ,
कहीं अपनी जुगाड़ लगाओ
इतने सारे संगठन हैं
कहीं सचिव या अध्यक्ष पद पर कब्जा कर
बढ़ाओ अपना सामाजिक सम्मान,
नामा और मिले और नाम,
वरना अपने सपने अधूरे रह जायेंगे।’’
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Aug 9, 2010

भूख का अक्स-हिन्दी कविता (bhookh ka aksa-hindi kavita)

दुबली, पतली और सांवली
उस गरीब औरत की काम के समय
मौत होने पर
पति ने हत्या होने का शक जताया।
पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिये
अस्पताल भेजा
और एक घर से दूसरे और वहां से तीसरे
घर में काम करती हुई
उस गरीब औरत की मौत को
संदेहास्पद बताया।
गरीब और बीमार की मौत का पोस्टमार्टम
सुनकर अज़ीब लगता है,
पति लगाये तो कभी नहीं फबता है,
एक औरत
जिसने दस दिन पहले गर्भपात कराया हो,
रोटी की आस में घर से भूखी निकली होगी
कमजोर लाचार औरत की क्या बिसात
उमस तो अच्छे खासे इंसान को वैसे ही बनाती रोगी,
हड्डियों के कमजोर पिंजरे से
कब पंछी कैसे उड़ा
उसकी जिंदगी का रथ कैसे मौत की ओर मुड़ा,
इन प्रश्नों का जवाब ढूंढने की
जरूरत भला कहां रह जाती है,
सारी दुनियां गरीबी को अपराध
औरत उस पर सवार हो तो अभिशाप बताती है,
जाने पहचाने सवाल हैं,
अज़नबी नहीं जवाब हैं,
भूख और मज़बूरी
पहले अंदर से तोड़ते हैं,
तब ही मौत से लोग नाता जोड़ते हैं,
क्या करेंगे सभी
अगर पोस्टमार्टम में
कहीं भूख का अक्स नज़र आया।
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Jul 31, 2010

स्वतंत्रता दिवस मनाने की छूट-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (ribet for indepandent day-hindi vyangya kavitaen)

कुछ लोगों ने अपनों को
गुलाम रखने की
स्वतंत्रता पाई है,
वरना तो अपने आकाओं की
अभी भी बजा रहे हैं
बस!
केवल स्वतंत्रता दिवस
हर साल मनाने की छूट उन्होंने पाई है।
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कहते हैं कि अंग्रेज छोड़ गये
पर अपनी अंग्रेजियत छोड़ गये हैं,
यही कारण है कि
गुलामों के सरदार आज भी बंधक है
उनके ख्यालों के
पर उनके प्रजाजन भी
अंग्रेज बनने की होड़ में लग गये हैं।
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वह मुक्तिदाता कहलाये
वरना तो गुलाम आज भी रखते हैं।
अब तलवार और तोप से नहीं
बल्कि खज़ाना अपने यहां रखकर
ख्यालों से दिमाग को ढंककर
गुलामों में भी सरदार बनाकर,
स्वतंत्रता के भ्रमजाल को अधिक घना कर
अपना शासन बनाये हैं,
साथ ही देवता होने का स्वांग भी रचते हैं।
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Jul 23, 2010

गुरू और चेले की योजना-हास्य व्यंग्य (guru chela ki yojana-hasya vyangya)

गुरुजी के पुराने भूतहे आश्रम  में आते ही चेले ने अपने बिना प्रणाम गुरु जी से कहा-‘गुरूजी जी आज आपकी सेवा में अंतिम दिन है। कल से नये गुरू की चेलागिरी ज्वाइन कर रहा हूं, सो आशीर्वाद दीजिये कि उनकी सेवा पूरे हृदय से कर सकूं और मुझे जीवन में मेवा मिल सके।’
सुबह सुबह यह बात सुनकर गुरूजी का रक्तचाप बढ़ गया। शरीर पसीने से नहा उठा। वह उनका इकलौता चेला था जिसकी वजह से लोग उनको गुरुजी की पदवी प्रदान करते थे। अगर वह इकलौता चेला उनको छोड़कर चला गया तो साथ ही उनकी गुरूजी की पदवी भी जानी थी। बिना चेले भला कौन गुरु कहला सकता है। उन्होंने चेले से कहा-‘यह क्या किसी कंपनी की नौकरी है जो छोड़कर जा रहा है। अरे, कोई  धर्म कर्म को व्यापार समझ रखा है जो नये गुरू की सेवा ऐसे ज्वाइन कर रहा है जैसे नई कंपनी प्रमोशन देकर बुला रही है। तू तो ऐसे बोल रहा है जैसे किसी कंपनी का प्रबंधक अपने प्रबंध निदेशक से बात करता है। सुबह सुबह क्या स्वांग रचा लिया है जो आज धमका रहा है। जो थोड़ी बहुत गुरु दक्षिण आती है उसमें से तुझे ईमानदारी से हिस्सा देता हूं। कभी कभी कोई दो लड्डू चढ़ाकर जाता है तो उसमें से भी आधा तेरे लिये बचा रखता हूं। अभी डेढ़ लड्डू खा जाता हूं अगर चाहूं तो पौने दो भी खा सकता हूं पर मैं ऐसा नहीं कर सकता। इतना ख्याल तेरा कौन रखेगा।’
चेला बोला-‘आपको इस नई दुनियां का नहीं पता। यह धर्म कर्म भी अब व्यापार हो गये है। आश्रम कंपनियों की तरह चल रहे हें। आपका यह पुराना आश्रम पहले तो फ्लाप था अब तो सुपर फ्लाप हो गया है। वह तो में एक था जो किसी नये अच्छे गुरू के इंतजार में आपकी शरण लेता रहा। अब तो फायदा वाले बाबा ने मुझे निमंत्रण भेजा है अपनी चेलागिरी ज्वाइन करने के लिये।’
गुरुजी हैरान रह गये-अरे, यह फायदा वाले बाबा तो बड़े ऊंचे हैं, भला तुझे कैसे निमंत्रण भेजा है? दूसरे हिट बाबाओं को चेले मर गये हैं क्या? सुन इस चक्कर में मत पड़ना। पहली बात तो उनके फाइव स्टार आश्रम में तेरा प्रवेश ही कठिन है फिर चेलागिरी ज्वाइन करने का तो सवाल ही नहीं।‘
चेले ने कहा ‘क्या बात करते हैं आप! इस गुरूपूर्णिमा के दिन वह मुझे दीक्षा देने वाले हैं। अब उनका धंधा बढ़ा गया है और उनको योग्य शिष्यों की जरूरत है। उनमें काले धन को सफेद करने का जो चमत्कार है उसकी वजह से उनको खूब चढ़ावा आता है। उसे संभालने के लिये उनको योग्य लोग चाहिऐं।’
गुरूजी ने कहा-‘भला तुझे काले धन को सफेद करने का कौनसा अभ्यास है?’
चेले ने कहा-‘धन है ही कहां जो सफेद कर सकूं। जब धन आयेगा तो अपने आप सारा ज्ञान प्राप्त होगा। कम से कम आपको इस बात पर थोड़ा शर्मिंदा तो होना चाहिए कि आपके पास कोई काला धन लेकर नहीं आया जिसे आप सफेद कर सकते जिससे मुझे भी अभ्यास हो जाता। वैसे मै वहां काम सीखकर आपके पास वापस भी आ सकता हूं ताकि आपकी गुरुदक्षिणा चुका सकूं।’’
चेला चला गया और गुरुजी अपने काम में लीन हो गये यह सोचकर कि ‘अभी तो फ्लाप हूं शायद लौटकर चेला हिट बना दे। कहीं गुरू गुड़ रह जाता है तो चेला शक्कर बनकर अपने गुरू को हिट बना देता है।’
कुछ दिन बात चेला रोता बिलखता और कलपता हुआ वापस लौटा और बोला-‘’गुरूजी, मैं लुट गया, बरबाद हो गया। आपके नाम पर मैंने अनेक लोगों से चंदा वसूल कर एक लाख एकत्रित किया था वह उस गुरू के एक फर्जी चेले ने ठग लिया। मुझे उसके एक चेले ने कहा कि गुरुजी को एक लाख रुपये दो और दो महीने में दो लाख करके देंगे। वह मुझे गुरूजी के पास ले भी गया। उन्होंने मुझे आशीवार्द भी दिया। बोले कुछ नहीं पर गुरूजी का चेला मुझसे बोला कि जब दो लाख देने के लिये बुलवायेंगे तभी से अपनी चेलागिरी भी प्रदान करेंगे। दो महीने क्या छह महीने हो गये। मैं आश्रम में गया तो पता लगा कि कोई ऐसा ही फर्जी चेला था जो आश्रम आता रहता था। फायदा वाले बाबा के पास कुछ अन्य लोगों को पास ले जाता और आशीर्वाद दिला देता। बाकी वह क्या करता है मालुम नहीं! हम सब बाबा के पास गये तो वह बोले‘कमबख्तों काले धन को सफेद करते उसका चूरमा बन जाता है। वह रकम बढ़ती नहीं घटकर मिलती है, ताकि उसे काग़जों में दिखाया जा सके। तुम लोगों के पहले के कौन गुरू हैं जो तुम्हें इतना भी नहीं समझाया’। अब तो आपकी शरण में आया हूं। मुझे चेलागिरी में रख लें।’’
गुरूजी ने कहा-‘फायदा वाले बाबा को यह नहीं बताया कि तुम्हारे गुरू कौन हैं?’
चेला बोला-‘‘बताया था तो वह बोले ‘कमबख्त! तुम्हारा धन तो काला ही नहीं था तो सफेद कैसे होता’, वैसे तुम्हारी ठगी का वैसा ठगी में गया’।’’
गुरूजी ने कहा-‘अब भई तू किसी तीसरे गुरू की शरण ले, तेरी जगह बाहर चाय की दुकान कााम करने वाले लड़के को पार्ट टाईम चेलागिरी का काम दे दिया है। वह भी मेरे नाम से इधर उधर से दान वसूल कर आता है पर कुछ हिस्सा देता है, तेरी तरह नहीं सौ फीसदी जेब में रख ले। वैसे वह कह रहा है कि ‘काले धन को सफेद करने का काम भी जल्दी शुरू करूंगा’, वह तो यह भी दावा कर रहा है कि इस आश्रम का सब कुछ बदल डालूंगा।’
चेले ने कहा-‘गुरुजी, कहीं वह यहां गुरूजी भी तो नहीं बदल डालेगा।’
गुरूजी एकदम करवट बदलकर बैठ गये और बोले-‘कैसी बातें कर रहा है। गुरूजी तो मैं ही रहूंगा।’
चेले ने कहा-‘गुरूजी, यह माया का खेल है। जब वह कह रहा है कि ‘सब कुंछ बदल डालूंगा तो फिर गुरूजी भी वही आदमी कैसे रहने देगा। ऐसे में आप मुझे दोबारा शरण में लें ताकि उस पर नज़र रख सकूं।’’
गुरूजी सोच में पड़ गये और बोले-‘मुश्किल यह है कि काले धन को सफेद करने का धंधा कभी मैंने किया नहीं। इसलिये उस पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। ठीक है तू अब उपचेला बन कर रह जा।’
चेले ने कहा-‘गुरूजी आप महान हैं जो उपचेला के पद पर ही पदावनत कर रख रहे हैं वरना तो मैं सफाई करने वाला बनकर भी आपकी सेवा करता रहूंगा। आपने न सिखाया तो क्या आपके नये चेले से काला धन सफेद करने का चमत्कार सीख लूंगा।’
इस तरह काले धन का सफेद करने के मामले पर दोनों ने अपने संबंध पुनः जोड़ लिये और उनको इंतजार है कि नया चेला कब से यह काम शुरू करता है।’
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Jul 21, 2010

दिल के घायल होने की शिकायत-हिन्दी शायरी (ghayal ke dil hone ki shikayat-hindi shayari)

जब तक मतलब था
दरियादिली उन्होंने दिखाई
फिर अचानक लापता हो गये,
हमने उनका पता ढूंढ निकाला
जब मिले दोबारा तो
उनकी तंगदिली देखकर हैरान हुए हम
इससे तो उनकी यादें बेहतर थी
पछताये जो फिर उनके पास गये।
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प्यार में धोखा नहीं होता तो
सच्चे प्यार की पहचान कैसे होती,
दौस्ती में गद्दारी न होती तो
वफा की कीमत भला क्या होती,
जिंदगी की असलियत जिसने जान ली
उसे दिल के घायल होने की शिकायत नहीं होती।
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Jul 17, 2010

कहीं काला अर्थशास्त्र तो नहीं रचा जा रहा-हिन्दी लेख (black economy and economics-hindi lekh)

किसी भी देश की मुद्रा पर अर्थशास्त्र में अनेक बातें पढ़ने को मिलती हैं पर उसके संख्यांक पर कहीं अधिक पढ़ने को नहीं मिलता अर्थात मुद्रा एक से लेकर एक हजार तक के अंक में छापी जाये या नहीं इस पर अधिक चर्चा नहीं मिलती। हम सीधी बात कहें तो डालर या सौ रुपये से ऊपर हो या नहीं इस पर अर्थशास्त्री अधिक विस्तार से विचार नहीं रखते। वजह शायद यह है कि आधुनिक अर्थशास्त्र की संरचना भी पुरानी है और तब शायद यह मुद्दा अधिक विचार योग्य नहीं था। इसलिये नये संदर्भ ंअब अर्थशास्त्र में जोड़ा जाना आवश्यक लगता है। हम बात कर रहे हैं भारत के सौ रुपये के ऊपर से नोटों की जिनका प्रचलन ऐसी समस्यायें पैदा कर रहा है जिनकी जानकारी शायद अर्थ नियंत्रण कर्ताओं को नहीं है। कभी कभी तो लगता है कि काली अर्थव्यवस्था के स्वामी अपने काला अर्थशास्त्र भी यहां चलाते हैं।
कुछ समय पूर्व योग शिक्षक स्वामी रामदेव ने बड़े अंक वाली मुद्रा छापने का मसला उठाया था पर उसे भारतीय प्रचार माध्यमों ने आगे नहीं बढ़ाया। एक दौ टीवी चैनल ने इस पर चर्चा की तो अकेले बाबा रामदेव के मुकाबले अनेक वक्ता थे जो भारत में पांच सौ और हजार के नोटों के पक्षधर दिखाई दिये क्योंकि वह सभी बड़े शहरों के प्रतिबद्ध तथा पेशेवर विद्वान थे जो संभवत प्रचार माध्यमों द्वारा इसी अवसर के लिये तैयार रखे जाते हैं कि कब कोई बहस हो और उनसे मनमाफिक बात कहलवाई जाये। यही हुआ भी! एक ऐसे ही विद्वान ने कहा कि ‘बड़े अंक की मुद्रा से उसे ढोने में सुविधा होती है और महंगाई बढ़ने के कारण रुपये की कीमत गिर गयी है इसलिये हजार और पांच सौ के नोट छापने जरूरी है।’
हैरानी होती है यह देखकर कि एक बहुत ही महत्व के मुद्दे पर कथित बुद्धिजीवी खामोश हैं-शायद कारों में घूमने, ऐसी में बैठने वाले तथा होटलों में खाना खाने वाले यह लोग नहीं जानते कि छोटे शहरों और गांवों के लिये आज भी हजार और पांच सौ का नोट अप्रासंगिक है। अनेक वस्तुऐं महंगी हुईं है पर कई वस्तुऐं ऐसी हैं जो अभी भी इतनी सस्ती हैं कि पांच सौ और हजार के नोट उससे बहुत बड़े हैं। टीवी, फ्रिज, कार, कंप्यूटर खरीदने में पांच सौ का नोट सुविधाजनक है पर सब्जियां तथा किराने का सामान सीमित मात्रा में खरीदने पर यह नोट बड़ा लगता है। दूसरा यह भी कि जिस अनुपात में आधुनिक सामानों के साथ उपभोक्ता वस्तुओं में मूल्य वृद्धि हुई है उतनी सेवा मूल्यों में नहीं हुई। मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि बहुंत कम होती है तथा लघू तथा ग्रामीण व्यवसायों में भी कोई बजट इतना बड़ा नहीं होता। वहां अभी भी सौ रुपये तक का नोट भी अपनी ताकत से काम चला रहा है तब पांच सौ तथा हजार के नोट छापना एक तरह से अर्थशास्त्र को चुनौती देता लगता है।
साइकिल के दोनों पहियों में हवा आज भी एक रुपये में भरी जाती है तो दुपहिया वाहनों के लिए दो रुपये लगते हैं। बढ़ती महंगाई देखकर यह विचार मन में आता है कि कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को हजार और पांच सौ नोटों के प्रचलन योग्य बनाने का प्रयास तो नहीं हो रहा है। कभी कभी तो लगता है कि जिन लोगों के पास पांच सौ या हजार के नोट बहुत बड़ी मात्रा मैं है वह उसे खपाना चाहते हैं इसलिये बढ़ती महंगाई देखकर खुश हो रहै हैं क्योंकि उसकी जावक के साथ आवक भी उनके यहां बढ़ेगी। दूसरी बात यह भी लगती है कि शायद पांच सौ और हजार नोटों की वजह से पांच तथा दस रुपये के सिक्के और नोट कम बन रहे हैं। इससे आम अर्थव्यवस्था में जीने वाले आदमी के लिये परेशानी हो रही है। आम व्यवस्था इसलिये कहा क्योंकि हजार और पांच सौ नोट उसके समानातंर एक खास अर्थव्यवस्था का प्रतीक हैं इसलिये ही अधिक रकम ढोने के लिये जो तर्क दिया जा रहा है जो केवल अमीरों के लिये ही सुविधाजनक है।
अनेक जगह कटे फटे पुराने नोटों की वजह से विवाद हो जाता है। अनेक बार ऐसे खराब छोटे नोट लोगों के पास आते हैं कि उनका चलना दूभर लगता है। उस दिन एक दुकानदार ने इस लेखक के सामने एक ग्राहक को पांच का पुराना नोट दिया। ग्राहक ने उसे वापस करते हुए कहा कि ‘कोई अच्छा नोट दो।’
दुकानदार ने उसके सामने अपनी दराज से पांच के सारे नोट रख दिये और
कहा कि ‘आप चाहें इनमें से कोई भी चुन लो। मैंने ग्राहकों को देने के लिये सौ नोट कमीशन देकर लिये हैं।’
वह सारे नोट खराब थै। पता नहीं दुकानदार सच कहा रहा था या झूठ पर पांच के वह सभी नोट बाज़ार में प्रचलन योग्य नहीं लगते थे। पुरानी मुद्रा नहीं मुद्रा को प्रचलन से बाहर कर देती है-यह अर्थशास्त्र का नियम है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि नयी मुद्रा पुरानी मुद्रा को प्रचलन में ला देती है पर इसके पीछे तार्किक आधार होना चाहिए। ऐसे पुराने और फटे नोट बाज़ार में प्रचलन में रहना हमारी बैकिंग व्यवस्था के लिये बहुत बड़ी चुनौती है।
हम यहां बड़ी मुद्रा के प्रचलन का विरोध नहीं कर रहे पर अर्थनियंत्रणकर्ताओं को छोटे और बडे नोटों की संरचना के समय अर्थव्यवस्था में गरीब, अमीर और मध्यम वर्ग के अनुपात को देखना चाहिए। वैसे यहां इस बात उल्लेख करना जरूरी है कि जितने भी विकसित और शक्तिशाली राष्ट्र हैं उनकी मुद्रा का अंतिम संख्यांक सौ से अधिक नहीं है। इसलिये जो देश को शक्तिशाली और विकसित बनाना चाहते हैं वह यह भी देखें कि कहंी यह बड़ी मुद्रा असंतुलन पैदा कर कहीं राष्ट्र को कमजोर तो नहीं कर देगी। कहीं हम आधुनिक अर्थशास्त्र को पढ़कर कहीं काला अर्थशास्त्र तो नहीं रचने जा रहे यह देखना देश के बुद्धिमान लोगों का दायित्व है।
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