Aug 28, 2012

अंतर्मन की धारा-हिंदी कविता (Antarman kee dhara-hindi kavita)

उनको समंदर की तरह
गहरा कहा जाता है,
इसलिये उनके घर से
हर कोई लौट जाता है प्यासा,
पानी उनकी तिजोरी में बंद है
खारा हो गया है,
मगर उनके मन में अभी तक बची पिपासा।
कहें दीपक बापू
 आम इंसान की भलाई की
जो शपथ उठा लेता है
हीरों का ताज पहनने के लिये वह नहीं  तरसता,
सिंहासन के लिये उस पर लोभ नहीं बरसता,
न नारे लगाता है,
न वादे बजाता है,
उसके अंतर्मन में बहती पवित्र जल की धारा
ज़माने का भला किये बिना
रहता है वह प्यासा।
-------------------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश




कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com




Post a Comment

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर-दीपकबापूवाणी (man ke khet par dhan ka Chakkar-DeepakBapuwani)

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर, वैभव रथ पर सवार देव से लेता टक्कर। ‘दीपकबापू’ आदर्श की बातें करते जरूर, रात के शैतान दिन में बनते फक्कड़।।...