Mar 13, 2014

लालच की ज़मीन पर उम्मीद का उगना-हिन्दी व्यंग्य कविता(lalacha ki zamin par ummeid ka ugana-hindi vyangya kavita)



जुबान उनकी धनुष की तरह टंकार करती पर नहीं छूटता कोई तीर,
हर वाक्य में दहाड़ते हैं पर फिर नहीं कह सकते उनको शब्दवीर।
आश्वासनों का ढेर सारा पुलिंदा उनके पास है चाहे लो जितने,
निभायी नहीं दोस्ती किसी से पर वफा के सुनाते किस्से कितने,
दूसरों के सपनों के जाल में फंसाकर अपने महल खड़े करते हैं,
सर्वशक्तिमान से अपने पाप छिपाने के लिये पुण्य भी बड़े करते हैं,
किसी को रोटी देने का वादा किसी का घर बसाने का उनका इरादा,
मजबूरों की भीड़ में कमजोर दिमाग के शिकार मिल ही जाते ज्यादा,
कहें दीपक बापू ताकत से ज्यादा पाने की ख्वाहिश करती बेबस,
 इसलिये लालच की ज़मीन पर उम्मीद उगाते मिलते  हर जगह पीर
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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