Sep 1, 2014

गुस्से की आग और विकास की हवा-हिन्दी व्यंग्य कविता(gusse kee aag aur vikas ki hawa-hindi satire poem)



विकास के पहिये पर
अपनी गाड़ी चलाने
सभी आ जाते हैं।

निर्बाध गति से चलते पहिये से
कुचल जाता जब पैदल इंसान
नाराज समूह गाड़ी पर
पथराव करने आ जाते हैं।

कुचला इंसान पड़ा इधर
विकास की प्रतीक
जलती गाड़ियां दिखती उधर
गुस्से की आग
विकास की हवा के बीच
यह जंग सभी जगह हम पाते हैं।

कहें दीपक बापू खाली आकाश
खड़े हम देखते ऊपर
नीचे विकास के बनते बिगड़ते
रूप देखकर हैरान रह जाते हैं।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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