Feb 25, 2011

योग गुरू स्वामी रामदेव पर योगमाता की कृपा और माया का घेरा-हिन्दी लेख (yog guru swami baba ramdev,yogmata aur maya ka ghera-hindi lekh)

योग साधकों को यह समझाना व्यर्थ है कि उनको क्या करना चाहिए और क्या नहीं! अगर कोई योग शिक्षक अपने शिष्य को योग के आठों अंगों की पूर्ण शिक्षा प्रदान करे तो फिर इस बात की आवश्यकता नहीं रह जाती कि उसे वह संसार में परिवार या समाज के संभालने के तरीके भी बताये। व्यापार और राजनीति के सिद्धांत समझाये। इसका कारण यह है कि योग साधना से आदमी की समस्त इंद्रियां बाहर और अंदर तीक्ष्णता से सक्रिय रहती है। उसके चिंतन  की धार इतनी तीक्ष्ण हो जाती है कि वह सामने दृश्य देखकर अपने मस्तिष्क उसकी अगली कड़ी का अनुमान तो कर ही लेता है भूतकाल भी समझ लेता है। उसे अपनी देह, मन और बुद्धि को कुछ करने का निर्देश देने की आवयकता भी नहीं  पड़ती क्योंकि योग साधक की सभी क्रिया शक्तियां स्वाभाविक रूप से सक्रिय हो जाती हैं। अपनी धारणा शक्ति से योगसाधक अपने सामने हर गतिविधि के पीछे छिपी शक्तियों को देख लेता है-या अनुमान कर लेता है। वह वैचारिक योग की ऐसी प्रक्रिया से गुजरता है जहां उसे अपने मस्तिष्क को अधिक कष्ट देना नहंी पड़ता। हालांकि इस प्रकार के गुण पाने के लिये यह जरूरी है कि योगसाधक पतंजलि योग दर्शन तथा तथा श्रीमद्भागवत्गीता का अध्ययन करे। ऐसे में आज विश्व के सबसे प्रसिद्ध शिक्षक बाबा रामदेव का जनजागरण अभियान बहुत दिलचस्पी और चर्चा का विषय बन गया है।
एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि योग शिक्षक स्वामी रामदेव अपने कार्यक्रमों में योग से इतर विषयों पर क्यों बोलते हैं? कभी राष्ट्रवाद तो कभी धार्मिक तथा सामाजिक गतिविधियों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्हें क्या इस बात का आभास होता है कि वह किसे और क्यों समझा रहे हैं? अगर स्वामी रामदेव इसे सामान्य ढंग से अपने जन जागरण का हिस्सा समझते हुए करते हैं तो कोई बात नहीं पर अगर वह अगर उनको लगता हैं कि उनके कथनों का प्रभाव हो रहा है तो गलती कर रहे हैं। पहली बात तो यह कि अगर वह उन लोगों को समझाते हैं जो योग साधना में नियमित रूप से संलग्न नहीं हैं तो शायद जरूर इस बात को न माने पर सच यह है कि ऐसे लोग इस कान से बात सुनते हैं और दूसरे कान से निकाल देते हैं। अगर लोग ऐसे ही समझने वाले होते तो आज शायद आज के संत लोग कबीर और तुलसी के दोहे पढ़ाकर उनको ज्ञान नहीं देते। मतलब योग साधना न करने वालों को अपना प्रवचन दिया कि नहीं, सब  बराबर है पर अगर योग साधक है तो उसे कुछ बताने या समझाने की आवश्यकता ही नहीं है वह सारी बातें स्वतः ही समझन की सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
हमारे देश में हर युग मे संत रहे हैं और आज भी हैं पर आमजन में कोई चेतना नहीं है। लोग अपने सांसरिक कामों में ही लिप्त रहते हुए सुख की कामना करते हैं। उनको अपने घर में कल्पित स्वर्ग के वह सुख चाहिये जिनकी कल्पना कुछ ग्रंथों में बताई गयी है। ज्ञान को वह केवल सन्यासियों की संपत्ति मानते हैं। एक अरब के इस देश को प्रचार माध्यमों के दम पर व्यापार, उद्योग राजनीति तथा फिल्म में रूढ़ता का दौर इसलिये चल रहा है क्योंकि चंद परिवार अपने ही समाज को मूढ़ समझते हैं। उनको कोई चुनौती नहंी दे सकता। हर स्तर पर वंशवाद फैला हुआ है। समाज का निचला तबका स्वयं को असहाय अनुभव करता है। स्पष्टतः इस चेतना विहीन समाज में योग साधना ही जान फूंक सकती है और बाबा रामदेव को अगर समर्पित बुद्धिजीवियों का सतत समर्थन मिल रहा है तो केवल इसलिये कि वह इस बात को समझते हैं कि लगभग बिखर रही सामाजिक परंपराओं को बचाने या नवीन समाज बनाने की जिम्मेदारी उन्होंने ली है शायद उससे कोई विकास का दीपक प्रज्जवलित हो उठे।
अपने को देश में मिल रहे समर्थन ने योग गुरु स्वामी रामदेव को प्रोत्साहित किया है जिससे उनके तेवर आक्रामक हो गये हैं। इसका प्रभाव भी हो रहा है क्योंकि प्रचार माध्यमों में उनके कथन सर्वत्र चर्चित हो रहे हैं, पर उनके भविष्य में प्रभावों का अभी अनुमान करना ठीक नहीं है क्योंकि समाज में चेतना विहीन लोगों से कोई आशा नहीं की जा सकती है और योग साधना से जिनकी इंद्रियों में चेतना है उनको तो कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है। सीधी बात कहें तो बाबा रामदेव के समर्थकों की प्रचारात्मक भूख इससे शांत होती है और हमें इस पर कुछ प्रतिकूल टिप्पणियां कर उनके अभियान पर प्रश्न चिन्ह खड़ा नहीं करना।
स्वामी रामदेव को राष्ट्रवादी अभियान में सबसे बड़ी समस्या यह आने वाली है कि उनके संगठन के प्रचारात्मक मोर्चे के अकेले ही सिपाही हैं और ऐसे अभियानों के लिय कम से कम आठ से दस उनको अपने जैसे लोग चाहिये। इतना ही नहीं अभी उनको यह भी प्रमाणित करना है कि वह योग साधना की शिक्षा से लेकर राष्ट्रवादी अभियान में उन शक्तियों से परे रहे हैं जो बाज़ार और प्रचार के दम पर समाज पर नियंत्रण किये हुए हैं। यह शक्तियां धर्म, राजनीति, समाज सेवा, कला, साहित्य और मनोरंजन के क्षेत्र में अपने मुखौटे रखकर आम लोगों की भीड़ पर शासन करती है। स्वामी रामदेव एक तरफ कहते हैं कि उनके पास एक भी रुपया नहीं है, पतंजलि योग पीठ की संपत्ति तो उनके द्वारा स्थापित ट्रस्ट की है’, तो दूसरी तरफ अपने ऊपर हो रहे शाब्दिक प्रहारों के लिये खुद ही सामने आकर कहते हैं कि ‘हमारे ट्रस्ट के आर्थिक कामकाज में पूरी तरह ईमानदारी बरती जाती है।’
ऐसे में कुछ सवाल स्वामी रामदेव से भी पूछे जा सकते हैं कि‘जब आपके पास रुपया नहीं है और ट्रस्ट काम देख रहा है तो आप उसकी ईमानदारी का दावा कैसे कर सकते हैं, खासतौर से जब उसमें दूसरे लोग भी सक्रिय हैं। आप तो घूमते रहते हैं तब आपको क्या पता कि ट्रस्ट के अन्य कामकाजी लोग क्या करते हैं? फिर वही लोग सामने आकर इन शब्दिक हमलों का सामना क्यों नहीं करते?’
योग शिक्षा से अलग स्वामी रामदेव की अन्य गतिविधियों मे अनेक पैंच हैं। क्या बाबा रामदेव के पीछे जो संगठन या व्यक्तियों का कोई ऐसा समूह है जो उनकी छवि या लोकप्रियता का लाभ निरंतर उठाकर अपना काम साध रहा है। 12 सौ करोड़ की संपत्ति होने की बात तो स्वयं स्वामी रामदेव ने स्वयं स्वीकारी है। इतनी संपत्ति को संभालने वालों में सभी माया से बचे रहने वाले पुतले हैं यह सहजता से स्वीकार करना कठिन है। किसी भी संगठन में पैसा देखकर कोई बेईमान न हो यह मान लेना कठिन लगता है। अगर बाबा रामदेव के संगठन में सभी योग साधना में निपुण हैं तो वह उनके अलावा अन्य कोई शब्दिक आक्रमण के बचाव में क्यों नहीं आता। हर बार अपने सर्वोच्च शिखर पुरुष को आगे क्यों करते हैं?
आखिरी बात यह कि हमारा मानना है कि बाबा रामदेव को अपनी शक्ति योग साधना की शिक्षा के साथ ही राष्ट्र जागरण के अभियान में लगाना चाहिए। वह चाहें तो समसामयिक विषयों पर भी बोलें, पर अपनी शक्ति अपने ऊपर लगने वाले आरोपों के खंडन में न लगायें। उनके स्थापित ट्रस्ट के पास 12 सौ करोड़ क्या 12 लाख करोड़ की संपत्ति भी हो तो हम उसमें छेद देखने का प्रयास नहंी करेंगे कि वह तो किसी एक व्यक्ति या उनके समूह की भी हो सकती है। चूंकि स्वामी रामदेव उसकी अपने होने से इंकार करते है तो फिर उनके भक्तों के लिये वह विवाद का विषय नहीं रह जाता। इस देश में इतने सारे लोगों के पास इतनी संपत्ति है पर आम लोग उनमें कितनी दिलचस्पी लेते हैं? यह काम राज्य का है और बाबा रामदेव के अनुसार उनके स्थापित ट्रस्ट की पूरी जानकारी संबंधित विभागां को है। अगर वह अपने ट्रस्ट की आर्थिक सफाई देते रहेंगे तो यकीनन अपने अभियान से भटक जायेंगे। एक बात याद रखनी चाहिये कि इस संसार में जो बना है नष्ट होगा। पतंजलि ट्रस्ट हो या उसकी संपत्ति भी एक न एक दिन प्रकृति के नियम का शिकार होगी पर बाबा रामदेव की पहचान भारत की प्राचीन विधा योग को चर्चित बनाने तथा जन जागरण की वजह से हमेशा रहेगी। आदमी के साथ संपत्ति नहीं जाती बल्कि उसका कर्म जाता हैं। ऐसे में इतने बड़े योगी को भौतिकता को लेकर विवाद में फंसना थोड़ा अचंभित करता है। एक आम लेखक और योग साधक होने के नाते हम देश की खुशहाली की कामना करते हैं और बाबा रामदेव इसके लिये प्रयासरत हैं तो उस पर हमारी दृष्टि जाती है तब कुछ न कुछ विचार आता ही है। खासतौर से तब जब हमने छह वर्ष पूर्व जब रामदेव को योग शिक्षा के लिये एक अवतरित होते देखा था तब यह आशा नहीं थी कि वह इतना सफर तय करेंगे। उन जैसे योगी पर माया भी अपना रंग जमायेगी। माया संतों की दासी होती है पर लगता है कि स्वामी रामदेव अब इसी दासी को अपने यहां जगह देने के लिये भी अपनी सफाई आलोचकों को देते हुए साथ में जनजागरण का अभियान भी जारी रखेंगे। अलबत्ता उन पर योगमाता की कृपा है और देखना यह है कि वह किस तरह यह दोनों काम एक साथ कर पायेंगे
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Feb 13, 2011

वेलेंटाइन डे और विश्व कप प्रतियोगिता-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (velantine day and world cup cricket tournament-hindi vyangya)

भारतीय प्रचार माध्यम-टीवी समाचार चैनल और समाचार पत्र-पूरी तरह से बाज़ार प्रबंधकों को इशारे पर चलते हैं इस बात का पता सन् 2011 के वेलेंटाईन डे पर चल गया। भारत में कथित रूप से विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता होने वाली है। कथित रूप से इसलिये कहा कि विश्व के पांच ताकतवर देशों में से केवल एक इसमें खेल रहा है। राजनीति, खेल, व्यापार तथा सांस्कृतिक रूप से पूरे विश्व में अपनी ताकत दिखाने वाले यह पांच देश हैं, अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, सोवियत संघ तथा फ्रांस हैं जिसमें केवल ब्रिटेन की टीम इंग्लैंड के नाम से आती है। प्रसंगवश इस टीम की स्थिति बता दें। इस टंीम का नाम था एम. सी.सी. और यह इसी नाम से भारत आती थी पर कहा इसे इंग्लैंड की टीम जाता था। बीसीसीआई की टीम थी जो भारत के नाम से खेलती थी। एम.सी.सी. का का मतलब था मैनचेस्टर क्रिकेट क्लब और जिसका मुख्यालय लार्डस में था। बीसीसीआई का मतलब था भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड-सीधे कहें तो यह भी एक तरह का क्लब है क्योंकि खेलों की दृष्टि से ओलम्पिक तथा एशियाड में भारत की तरफ से प्रतिनिधित्व करने वाले ओलम्पिक संघ से इसका कभी कोई वास्ता नहीं रहा।
आर्थिक रूप से सक्षम होने के कारण भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने ऐसा जलवा पेला कि सभी उसकी राह पर चल पड़े। कहीं क्लब तो कहीं एसासिएशन शब्द जोड़कर क्रिकेट के नियंत्रण का दावा करने वाली संस्थाऐं अपने अपने देशों की प्रतिनिधि दिखने लगीं। क्रिकेट के अंतराष्ट्रीय गठजोड़ या गिरोह का परिणाम यह हुआ कि इसे कालांतर में भारतीय बाज़ार की शक्ति से संपन्न सौदागरों ने सभी संस्थाओं पर अपना नियंत्रण कर लिया।
खेल तो पैसा रहा है किक्रेट तो बस चल रहा है।
पिछले कई बरसों से भारतीय प्रचार माध्यम वेलेंटाइन   डे पर जमकर धांसू प्रचार करते हैं ताकि देश के युवा लोग भूलें नहीं और धनपतियों के बने बार, होटल, मॉल तथा फिल्म प्रदर्शन केंद्र गुलजार रहें। वेलेंटाईन डे के समर्थक नारीवादी बुद्धिजीवी और धर्म समर्थक विद्वानों की बहसें इंटरनेट, टीवी समाचार चैनलोें और समाचार पत्रों के दिखाई देती हैं। ऐसे में एक बात ही समझ में आती है कि वेलेंटाईन डे के विरोधी और समर्थक कहीं फिक्सिंग डिस्कशन-प्रायोजित पूर्वनिर्धारित बहस-तो नहीं कर रहे। अगर टीवी चैनल और समाचार पत्र वेलेटाईन डे का प्रचार न करें तो शायद ही कोई याद रख पाये। एक बार तो यह लगता है कि प्रचार माध्यम चर्चा इसकी चचा करें और फिर भी युवा वर्ग न सुनें तो यह संभव है पर अगर विरोधी इस अवसर पर लट्ठमार दिवस या धर्म स्मरण दिवस का आयोजन करें तो फिर इसकी याद न आये इसकी संभावना कम ही है। इस बार भी हमें वेलंेटाईन डे की याद नहंी रही वह तो टीवी चैनल वालों ने किसी समूह का लट्ठमार या डंडा दिवस मनाये जाने का समाचार दिया तब पता लगा कि आज वेलेंटाईन डे है।
हालांकि कल के एक समाचार में टीवी चैनलों और अखबारों ने अपने तरीके से याद दिलाया था। एक समाचार था जहां एक युवा लड़के ने अपनी गोली मार ली क्योंकि उसकी प्रेमिका की मौत होने की खबर उसे मिल गयी। इस मौत के पीछे प्रेमिका के परिवार वाले जिम्मेदार माने जा रहे हैं और घटना के बाद अपने घर से फरार हैं। ऐसी एक दो घटनायें और भी आयीं और सभी के साथ यही बताया कि वेलेंटाईन डे से पूर्व प्रेम का कत्ल हो गया। मतलब हमारे समाचार पत्र और टीवी चैनलों को विद्वान यह मानते हैं कि यह यौन संबंध से जुड़ा प्रेम दिवस ही है। बाज़ार ने प्रचार प्रबंधकों की मति हर ली है और व्यक्तिगत परिलब्धियों की बहुता ने उनके सारे भाषाई गणित बिगाड़ दिये हैं। न उनको हिन्दी का पता है और अंग्रेजी का तो भगवान ही मालिक है।
यह इष्ट या शुभेच्छु दिवस है-एक हिन्दी विद्वान ने बताया था। वह विद्वान है संदेह नहीं पर लिपिक नुमा लेखन करने के बावजूद वह साहित्य के रचयिता नहीं है। कहीं उनके पास अंग्रेजी शब्दों का हिन्दी अनुवाद करने वाला कोई प्रमाणिक कोष है जिसका उन्होंने गहन अध्ययन किया है। हिन्दी के सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी गतिविधियों पर हमारी भी दृष्टि रही है।
एक दिन हमसे उन्होंने कहा-‘हिन्दी में बेहूदे व्यंग्य लिखकर अपने आपको बहुत बड़ा साहित्यकार समझते हो, जरा बताओ कि वेलेंटाईन डे का मतलब क्या है?’
हमने उनसे कृत्रिम क्रोध में कहा-‘हम क्या जानें? लेखक हिन्दी के हैं न कि अंग्रेजी के! फिर यह फालतु विषय लेकर हमारे सामने लेकर आप आये कैसे? एकाध व्यंग्य कहीं आप पर लिख दिया तो फिर यह मत कहना कि ऐसा या वैसा कर दिया।’
ऐसा कहकर हमने जोखिम मोल लिया था क्योंकि उन पर व्यंग्य लिखने का मतलब था कि एक फ्लाप व्यंग्य रचना लिखकर बदनाम होना। बहरहाल वह डर गये और हंसते हुए बोले-‘भई, व्यंग्य मत लिखना हम तो आपकी जानकारी बढ़ाने के लिये बता रहे हैं कि वेलेंटाईन डे का मतलब है ‘शुभेच्छु दिवस’।’’
हम प्रसन्न हो गये। बहरहाल वह हमसे वरिष्ठ थे और उन्होंने आठ साल पहले बताया था कि यह केवल लड़के लड़की के प्रेम तक सीमित नहीं हैं। इस पर आप अपने किसी भी इष्ट का अभिनंदन या अभिवादन कर उसे मिल सकते हैं। मिलकर पार्टी वगैरह कर सकते हैं।
उस समय प्रचार माध्यमों की ऐसी हालत नहीं थी पर जब लगातार इसका व्यवसायिक उपयोग देखा तब चिंतन की कीड़ा कुलबुलाने लगा। यह प्रचार माध्यम ही है जो तमाम तरह की कहानियों से खालीपीली जोड़ देते हैं। जिस प्रेमिका की हत्या हुई और प्रेमी ने आत्महत्या की उसकी प्रेमकथा की शुरुआत भी पिछले वेलेंटाईन डे पर होना बताया। अब इसका प्रमाण ढूंढने कौन जायेगा? क्रिकेट की तरह वेलेंटाईन डे पर भी सब चलता है
बहरहाल इस बार बाज़ार की जान विश्वकप क्रिकेट टूर्नामेंट में अटकी है और प्रचार माध्यम बीसीसीआई की उसमें भाग लेने वाली टीम के सदस्यों को देश का महानायक बनाने पर तुले हैं। संतों के हाथ में बल्ला पकड़ाकर उनको टीम इंडिया को शुभकामनायें दिलवा रहे हैं। शायद इसलिये उसने वेलंटाईन डे के लिये उनको समय कम मिला। बहरहाल फिर भी कुछ घटनाओं को उससे जोड़कर उन्होंने अपना बाज़ार के प्रति कर्तव्य तो निभाया।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Feb 7, 2011

बसंत पंचमी या ग्रीष्म पंचमी-हिन्दी लेख (basant panchami ya garmi ka mausam-hindi lekh)

यह बसंत आया कि गर्मी आई! विश्व में मौसम अपने अपने नये अंदाज दिखा रहा है। सूर्यनारायण उत्तरायण क्या हुए सर्दी ने अपना बिस्तरा बांध लिया। इसके बाद कश्मीर में बर्फबारी हुई पर फिर भी सर्दी उस तरह वापस नहीं लौटी जैसे मकर सक्रांति के पहले थी। 2011 की बसंत पंचमी इतनी गर्म रहेगी इसका अनुमान उस समय नहीं लग रहा था जब इस वर्ष के प्रारंभ में ही सर्दी उग्र रूप में थी।
ग्वालियर में तापमान 6 फरवरी को 34 के पास पहुंच गया। यह उग्र गर्मी के मौसम की शुरुआत का संकेत होता है। इस बार भारत में विकट गर्मी रही तो बरसात भी जोरदार हुई। इसके बाद सर्दी भी जमकर पड़ी मगर मौसम विशेषज्ञों की चिंताऐं यथावत हैं। धरती का तापमान बढ़ रहा है। इसके लिये पूरे विश्व में गैसों का उत्सर्जन बताया जाता है। कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इन गैसों का दुष्प्रभाव ओजोन परत पर पड़ता है जिसमें बहुत बड़ा छेद हो गया है जिसके कारण उस भाग से सूर्य की किरणें सीधे धरती पर आती हैं जिससे गर्मी बढ़ रही है। जहां तक हमारी जानकारी है उसके ओजोन परत एक तरह का कांच या वह सतह है जहां से सूर्य की किरणें बाधित होती हैं जिससे उनकी उष्मा कम हो जाती हैं और धरती का मौसम सामान्य बना रहता है। दूसरी भाषा में कहें तो आजोन परत एक छलनी की तरह है जो सूर्य की उष्मा की उग्रता को अपने में समेट लेती है ताकि धरती को परिष्कृत उष्मा मिल सके।
जहां विश्व के पर्यावरण को शुद्ध रखकर गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण करने की बात आती है वहां विभिन्न देशों के राजनयिक नाटक करने लगते हैं और एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर अपने देश को स्वयं के पर्यावरण हितैषी होने का प्रमाण पेश करते हैं। चीन और भारत पर अमेरिका अधिक गैस उत्सर्जन होने का आरोप लगाता है तो यह दोनों उस पर ही तोहमत जमाते हैं। मुख्य बात यह है कि सारी दुनियां का राजतंत्र धनपतियों-पहले इसमें उद्योगपति और व्यापारी शामिल होते थे और आजकल अपराधी भी इस शब्द के हकदार हो गये हैं-के हाथ में है जो एक नहीं अनेक प्रकार से इस धरती का ही बल्कि अंतरिक्ष का भी वातावरण बिगाड़ रहे हैं। हम इनके निरंकुश होने पर यह कहकर नहीं रो सकते कि राज्यतंत्र इनके इशारों पर चल रहा है बल्कि अब तो यह सवाल भी उठने लगा है कि आम आदमी क्या कर रहा है? वह स्वयं भी तो इनके बनाऐ ऐजेंडे पर चल रहा है। बाज़ार और उसके प्रचार माध्यमों में विज्ञापित वस्तुओं के साथ ही सुविधाओं के भुगतान के लिये आम आदमी प्राणप्रण से जुटा है।
टीवी, फ्रिज, एसी, कूलर, तथा पर्यावरण प्रदूषित करने वाले वाहनों का प्रयोक्ता होने की आम आदमी में ऐसी आदत हो गयी है कि वह सड़क, उद्यान तथा ऐतिहासिक धरोहरों को भी अपनी उपभोग की वस्तु समझने लगा है। सड़कों को खोदना, उद्यानों को गंदा करना तथा एतिहासिक धरोहरों के प्रति बेपरवाही दिखाना आम आदमी ने अपना अधिकार समझ लिया है। हम यहां पर अमेरिका और चीन पर आक्षेप करने की बजाय अपने देश के गिरेबान में झांके। जिस तरह विशेषज्ञ बताते हैं उससे यह बात तो साफ लगती है कि गैसें आसानी से नष्ट नहीं होती। ऐसे में भारत में आबादी के साथ घरेलू गैस का उपभोग बढ़ा है। तय बात है यह चीन में भी बढ़ा होगा पर अमेरिका में जनंसख्या इतनी नहीं है। इसी गैस को लेकर यह सवाल उठता है कि जलने के बाद वह जाती कहां है? यकीनन वह इसी पर्यावरण में ही बहती है। वातावरण में जिस तरह अप्रत्याशित रूप से गर्मी बढ़ रही है उससे तो यही लगता है कि कहीं न कहंी मानव ही इसके लिये जिम्मेदार है। विशेषज्ञ क्या कहते हैं कि हम नहीं जानते पर रसोई की आग में गैस के बढ़ते उपभोग के साथ ही यह गर्मी हमने बढ़ती देखी है। अमेरिका के अनेक कारखाने भी इससे अनेक गुना गैस उत्सर्जन के लिये जिम्मेदार माने जाते हैं। हम उस पर आक्षेप करने का अनावश्यक उत्साह नहीं दिखाना चाहते। हमारे यहां रसोई गैस के बढ़ते उपयोग के साथ ही विकास के नाम पर चौड़ी सड़के करने के लिये अनेक पेड़ पौद्यों की बलि दी जा रही है। आम आदमी को जहां भूखंड में खुली जगह रखने का कहा जाता है वहां वह पक्के निर्माण करा लेता है। जिनका मन करता है वह सरकारी जमीन पर पेड़ लगाकर पर्यावरण हितैषी होने का दावा करते हैं। मतलब पर्यावरण संतुलन रखने के लिये आम आदमी अपने जिम्मे से बचना चाहता है।
यह बकवास लिखने का विचार आखिर क्यों आया? यह लेखक प्रतिदिन अक्सर पार्कों में जाता है। कुछ पार्क कभी साफ लगते हैं। ऐसा लगता है कि उनको कोई राजकीय कर्मी साफ कर गया होगा पर फिर वही हालत! वहां प्लास्टिक की पन्नियां, बिस्कुट के खाली पैकेटों के झुंड, शराब की बोतले और तंबाकु के पाउच देखने गंदगी के रूप में विराजते हुए देखे जा सकते हैं। यकीनन यह राजकीय कर्मियों ने नहीं वरन् उन लोगों ने किया होता है जो कथित रूप से प्रयोक्ता बनकर आते हैं। केवल दोहन करने की प्रवृत्ति पर सृजन और सतर्कता से मुंह फेरने की आम आदमी की इस आदत ने शिखर पुरुषों को बेलगाम बना दिया है। अकर्मण्य तथा अचिंतक समाज में थोड़ी सक्रियता से ही बेईमानों को सत्ता मिल जाती है। जब बसंत पंचमी पर ग्रीष्म पंचमी का अहसास हो तो पर्यावरण प्रदूषण के लिये अपनी भड़ास निकालने के लिये दूसरा और क्या लिखा जा सकता है?
बहरहाल 8 फरवरी पर बसंत पंचमी पर अपने ब्लाग लेखकों तथा पाठकों को बधाई।
लेखक दीपक भारतदीप 

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Jan 24, 2011

सुबह इंसान को क्या करना चाहिए-हिन्दी रचना (subah aur insaan-hindi rachna)

प्रातः आठ बजे का समय था। हम सुबह घर से बाहर चाय पीकर निकले। पार्क में घूमने जाना था। चाय पीकर बाहर घूमने का यह रोज का हमारा नियम वैसे पुराना है, पर ब्लाग पर लिखने की वजह इसमें व्यवधान आ गया था। जब पहले बिजली कटौती नहीं थी तब यह समय ब्लाग लिखने में लगाते जिससे लिखना बंद हो गया। हालांकि सुबह केवल भारतीय अध्यात्म से संबंधित विषय पर ही हम लिखते थे पर अब सुबह कभी चार तो कभी तीन बजे से सुबह दस बजे तक बिजली कटौती ने हमारी इस अध्यात्मिक साधना को करीब करीब समाप्त कर दिया है। मगर इससे एक लाभ यह हुआ है कि प्रातःकाल घूमना हमारी दिनचर्या में शामिल हो गया है। जब सुबह घूमने जाते हैं तो राह चलते हुए अनेक दृश्य और लोगों की बातें हमारी आंखों और कानों पर प्रभाव डालती पड़ती हैं जो अब अलग से एक नयी अनुभूति देती थी है। शायद यह अध्यात्मिक साधना का परिणाम भी हो सकता है।
बहरहाल प्रातःकाल घूमने में स्वर्ग जैसा आनंद है। कहना चाहिए कि स्वर्ग में अगर इंसान जाये और दोपहर तक सोता रहे तो उसे वहां भी धरती पर भोगे गये नरक की अनुभूति होगी, यह हमारा दावा है। स्वर्ग एक कल्पना है पर सुबह का भ्रमण अगर नियमित कर उसकी अनुभूति को अपने मन में उतारा जाये तो यकीनन स्वर्ग की कल्पना मिथ्या साबित होगी। शायद अनेक महापुरुष इसलिये यही कहते हैं कि स्वर्ग और नरक इसी धरती पर हैं। यकीनन वह महापुरुष सुबह उठकर ज्ञान तथा ध्यान में संलग्न रहने वाले थे तभी उन्होंने इस सत्य की अनुभूति की। उन्होंने यह सिखाया कि अपने कर्म, आचरण, व्यवहार, तथा दिनचर्या में से यहीं इसी धरती पर स्वर्ग को भोगा जा सकता है।
उस दिन एक सज्जन ने हमसे कहा-‘आप देर से घूमने क्यों निकलते हैं? घूमना तो एकदम सूर्य निकलने से पहले होना चाहिए। यह क्या कि आठ बजे घूमने निकले हैं। इस समय तो चाय और नाश्ते करने का समय है।’
हमने कहा-‘हां, मैं चाय पीकर तफरी करने निकला हूं।’
वह बोले-‘इससे क्या लाभ? सुबह घूमिये तो जरा स्वास्थ लाभ होगा।’
हमने कहा-‘हां, कोशिश करूंगा कि सुबह निकलें, मुश्किल यह है कि हमारा सुबह का एक से डेढ़ घंटा योग साधना, स्नान, पूजा तथा चाय पीने में लग जाता है। योग साधना का समय लंबा हो जाये तो दो घंटे भी ऐसे ही निकल जाते हैं। आपकी राय पर विचार करेंगे और कुछ समय पहले ही उठा करेंगे।’
वह सज्जन हमारी तरफ आंखें फाड़कर देखने लगे और बोले-‘आप वाकई योग साधना करते हैं, मगर आप का पेट बहुत बाहर निकला है। यह देखकर नहीं लगता।’
हमने कहा-‘इसलिये ही सुबह घूमने निकलते हैं ताकि पेट कम हो।’
वह बोले-‘योग साधना वालों के पेट तो अंदर होते हैं। आपने बाबा रामदेव को देखा होगा कितने पतले और सुंदर लगते हैं। आपका पेट तो बहुत बाहर है।’
हमने कहा-‘दरअसल हम खान पान में थोड़े लापरवाह हैं। यह उसी का नतीजा है।’
वह बोले-‘फिर योग साधना करने से क्या फायदा? उसमें तो संयम रखना चाहिए।’
हमने कहा-‘हां, अब रखेंगे।
यह कहकर आगे चल दिये तो पीछे से फिर उन्होंने आवाज दी और कहा-‘मगर आप मोटे नहीं लगते। आपके शरीर का बाकी हिस्सा फिट लगता है। वैसे आप कौनसे आसन करते हैं।’
हमन कहा कि ‘बहुत सारे! पद्मासन, सर्वांगासन तथा सूर्यनमस्कार तथा बहुत सारे आसनों में साथ प्राणायाम भी करते हैं।’
वह बोले-‘आप हमें कोई ऐसा आसन बताईये जिससे हमारी कमर का दर्द चला जाये। कमबख्त, बहुत परेशान हैं।’
हमने कहा-‘उष्टासन करिये।’
वह बोले-‘यह कैसे होता है?’
हमने कहा-‘यह सड़क पर करके कैसे बता सकता हूं।’
वह बोले-‘आपका पद्मासन लगता होगा, इस पर यकीन नहीं होता।’
हमने कहा-‘चलिये, पार्क में करके दिखा देते हैं। पर हां उष्टासन नहीं करके बतायेंगे क्योकि हमारे पास अब चद्दर और दरी नहीं है।’
वह बोले-‘फिर कभी देखेंगे। कल मैं पार्क में आऊंगा तब आप पद्मासन लगाकर बताईयेगा।’
हमने कहा-‘बात तो हमने आज और अभी की कही है। कल की कल देखेंगे।
वह सज्जन चले गये।
उनके जाने के बाद हमें इस बात पर पछतावा हुआ कि किसलिये अपने कीमती दस मिनट उनसे वार्तालाप में बरबाद किये। इससे तो हां जी, हां जी, करते हुए निकल जाना चाहिए था। सारा दिन तो लोगों से बात करते और सुनते हुए बीतता है। मौन रहकर घूमने का आनंद तो प्रातःकाल घूमने में ही हैं।
उस दिन रास्ते पर पड़ने वाले एक मकान के पास से गुजर रहे थे तो एक सज्जन अखबार पढ़ते दिखेे। हमें देखकर बोले-‘नमस्कार, श्रीमान, इधर कैसे निकले हैं।’
हमने कहा-‘‘ जरा तफरी करने निकले हैं।’’
वह बोले-‘हां, अब तो हवा ही रह गयी है खाने को! हर चीज महंगी होती जा रही है। अनाज, सब्जी, दूध और और बिजली भी महंगी हो रही है। देखिए अखबार में क्या दर्दनाक खबरें लिखी हैं। आपने तो अखबार पढ़ा होगा?’
हमने कहा-‘अखबार तो अब जाकर पढ़ेंगे। सुबह क्या दर्दनाक विषयों में अपना कोमल हृदय फंसायें, वह तो सारा दिन ही झेलनेे हैं।’
वह बोले-‘अखबार पढ़ने का मजा तो सुबह ही है।’
हमने कहा-‘आप भी कमाल करते हैं। भला, दर्दनाक खबरों में मजा आता है? यह सब चीजें महंगी हो रही हैं उनको रोकना अपने बस में नहीं है, फिर उनसे उपजा संकट झेलना ही है तब क्यों सुबह का यह कीमती समय इन पर नष्ट करें।’
वह बोले-‘ऐसी बात नहीं है। नई जानकारी भी मिलती है। देखिए, आज मंत्रिमंडल में विस्तार होना है। इधर विश्व कप के लिये क्रिकेट टीम भी घोषित हो गयी है। यह तो रुचिकर विषय हैं।’
हमने कहा-‘हां, यह सही है। कल से सुबह ही अखबार पढ़ा करेंगे।’
हम थोड़ा आगे ही गये होंगे कि बच्चों को ले जानी वाली एक बस हमारे पास से तीव्र गति से धूल उड़ाती हुई निकली जिससे हमारे कानों, आंखों तथा नाक पर बुरा प्रभाव पड़ा। जितनी देर उन सज्जन से हम बात कर रहे थे उतने में हम उस सड़क से पार्क में पहुंच गये होते। मतलब उस वार्तालाप की वजह से धूल ने हम पर प्रहार किया। ऐसे में रुमाल से हमने मुंह ढंका, फिर पौंछा। किसी तरह पार्क में पहुंच गये। मन में पछतावा हो रहा कि बेकार की बातों में क्यों अपना वक्त लगाया।
पार्क में खिले फूलों को देखकर यह लगा कि किस तरह यह इस आशा में खड़े हैं कि लोग उनको देखें। लोग फूलों की पैंटिंग से घर में सजाते हैं। नकली फूलों से गुलदस्ते भी भरते हैं। असली फूल के पास खड़े होकर उसे निहारने का जो आनंद है कितनों के नसीब में होता है। यह जरूरी नहीं है कि फूलों के पास से जो निकले वह उसकी उपस्थिति के आनंद को अनुभव करे, क्योंकि आनंद लेना भी एक कला है जिसके लिये मौन होना जरूरी है। उससे ज्यादा अपने को हमेशा ही अभिव्यक्त होने के भाव से भी मुक्त होना पड़ता है। यह मैं करूं, वह देखूं, वह सुनूं, या मैं किसी से कुछ कहूं-आशय यह है कि अपनी दैहिक सक्रियता का मोह छोड़कर अपना ध्यान अंतर्मन में लगाना पड़ता है। आप सोचते रहिये कि ‘यह करें, वह करें’, मगर यह भी सोचें कि दूसरा उसको कितना भाव देता है। मतलब आपका सुनाना बेकार है क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि सामने वाला आपके विषय को रुचि के साथ सुन रहा है। जैसे कि हमने सुना पर तत्काल उस विषय से निवृत हो गये थे कि ‘सुबह इंसान को क्या करना चाहिए।
कई बार लोगों को यह अनुभव होता है कि हम उनकी बात सुन रहें तो यह भ्रम है और हम सुनकर याद रखेंगे यह तो महाभ्रम है। तय बात है यह बात हमारे कहने पर भी लागू होती है क्योंकि सामने वाले की प्रतिक्रिया ऐसी ही होती है।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Dec 16, 2010

फ्लेट सोसायटी भारत का पूरा समाज नहीं है-हिन्दी लेख (flat society in not indian society-hindi article)

क्या हमारे यहां फ्लैट सोसायटी ही संपूर्ण समाज बन गयी है? सीधा जवाब है नहीं! मगर टीवी चैनलों, समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा व्यवसायिक प्रकाशनों के कार्यक्रमों या सृजन के स्वरूप से तो ऐसा ही लगता है। स्थिति यह है कि सब टीवी चैनल पर प्रसारित होने वाले मुख्य समय के दौरान हास्य व्यंग्य कार्यक्रमों में लगातार तीन चार कार्यक्रम फ्लैट सोसायटी के सचिवों या रहवासियों के कथानकों पर आधारित होते हैं। उसकी क्या कहें अन्य चैनलों पर भी सामाजिक तथा जासूसी धारावाहिकों में भी इस फ्लेट सोसायटी की पृष्ठभूमि को ही चुनकर कहानियां लिखवाई जा रही हैं।
पता नहीं बड़े शहरों में रहने वाले बुद्धिजीवी समाज को लेकर क्या सोचते हैं? यह भी पता नहीं कि छोटे शहरों में विचर रहे बड़े बुद्धिजीवी अपने यहां की जीवन शैली पर क्या दृष्टिकोण रखते हैं? हमारे दिमाग में यह प्रश्न देश के समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा टीवी चैनलों पर जहां लेखक की रचनाओं के आधार दिखने वाले प्रकाशन तथा कार्यक्रमों का सृजन होता है उनकी विषय सामग्री को लेकर उठता ही है। चाहे हो या नहीं पर यह सच है कि जहां मौलिक रचना है वहां साहित्य की उपस्थिति का आभास होता है। अब हम उसकी उच्च या निम्न कोटि तथा उसमें समाहित सामग्री में समाज के क्षेत्र को लेकर सवाल उठा सकते हैं पर उसे साहित्य मानने से इंकार नहंी कर सकते। ऐसे में जब हम यह मानते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है तब टीवी समाचार चैनलों, समाचार पत्र पत्रिकाओं एवं व्यवसायिक प्रकाशनों की सृजन सामग्री को देखकर तो यह लगता है कि यह दर्पण झूठ भी बोल सकता है।
संक्षिप्त में हम भारत की स्थिति का अवलोकन करें। वैसे तो आर्थिक रूप से हमारे यहां तीन श्रेणियां हैं, उच्च, मध्यम तथा निम्न वर्ग! इसमें भी मध्यम वर्ग में भी अब इस तरह की तीन श्रेणियां बन गयीं हैं। निम्न वर्ग में भी दो श्रेणियां हैं, गरीब और गरीबी की रेखा से नीचे। उच्च वर्ग की श्रेणी पर कोई विवाद नहीं है क्योंकि उसके मायने भी ऊंचे हैं और कम से कम हम जैसा आदमी उसकी व्याख्या करने की औकात नहीं रखता। हमारे हिसाब से तो जिसका पांव ही पूरे दिन जमीन पर न पड़ता हो, कार से चलते हुए उसे केवल स्वर्णिम मय दृश्य ही दिखाई देते हों और जो गरीब के लिये सोचने के साथ ही गरीबी से लड़ने का केवल दंभ भरता हो वही ऊंचा है। तय बात है कि ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है। टीवी चैनलों पर बहुत दिन तक इसी उच्च वर्ग की पृष्ठभूमि पर सास बहु की कहानियों वाले धारावाहिक चले और अब भी चल रहे हैं। अगर विदेशों के लोग इसे देखते होंगे तो उनको तो यह लगता होगा कि भारत में इसी तरह के कारपोरेट घर होंगे। बड़े शहरों में जो बुद्धिजीवी हैं उनका समय ही लंबी दूरियों की यात्रा करने में लगता है। उसके बाद फिर उनको सम्मेलन करने होते हैं। ऐसे में वह शायद ही मध्यप्रदेश के किसी गांव की स्थिति पर विचार कर पाते होंगे, कल्पना करना तो दूर की बात है जो कहानियों, व्यंग्यों या कविताओं के लिए जरूरी होती है। छोटे शहरों के नव बुद्धिजीवी बड़े शहर में जाकर प्रसिद्ध बुद्धिजीवी बनने के चिंतन में अपने आसपास का वातावरण देखते जरूर हैं पर उसे सृजन की दृष्टि से अपनी बुद्धि में स्थान नहंी देते। वैसे छोटे और मध्यम शहरों के अब वातावरण में भी विरोधाभास है। अनेक जगह फ्लैट बने हैं तो वहीं स्वतंत्र रूप से मध्यमवर्गीय लोगों के मकान भी हैं। इन छोटे और मध्यम शहरों में आज भी ऐसे लोग हैं जो फ्लैट में रहना पसंद नहीं करते। इसके बावजूद कुछ लोग हैं जो फ्लैट में रहना चाहते हैं। यही फ्लैट वाली सोसायटी अब इस देश का हिस्सा है पर उतना नहीं जितना हमारे टीवी चैनल, समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा अन्य प्रकाशनों के कार्यक्रम या सृजन में दिखाई देता है।
बहुत कम बुद्धिजीवी लोग हैं जो छोटे और मध्यम शहरों में रहने वाले मध्यम और निम्न श्रेणी के नागरिकों की मानसिकता पर विचार करते होंगे। मुंबई भारत की आर्थिक राजधानी हैं पर यह भी बहस का विषय है! भारत की आर्थिक राजधानी कोई एक शहर नहीं हो सकता भले ही वहां दो करोड़ लोग रहते हों! भारत की राजधानियां तो समस्त खेत और खलिहान हैं। जहां के असली नागरिक मज़दूर तथा बेबस लोग हैं। यही लोग हम जैसे मध्यम तथा निम्न लोगों का वह सहारा हैं जिसकी कल्पना तक कोई नहीं करता। जब हम प्रचार माध्यमों पर देखते हैं तो ऐसा लगता है कि दूसरे देश को देख रहे हैं। जब ज़मीन पर चलते हुए सोचते हैं तो लगता है कि हमारे देश में वह सब नहीं होता जो सृजन के नाम पर हमारे बुद्धिजीवी परोस रहे हैं। जिन्हें यह बात समझ में न आये वह पांच सौ या हजार का नोट लेकर सड़क पर चिंतन करें। वह पेट्रोल पंप, कपड़े, ज्वेलरी तथा इलेक्ट्रोनिक सामान की दुकान पर चल जायेगा पर सब्जी मंडी, पंचर की दुकान या दूध की दुकान पर वह परदेसी मुद्रा की तरह दिखने लगता है। साइकिल में एक रुपये तथा स्कूटर में दो रुपये की हवा भराते हुए बरसों हो गये। पंचर का रेट बड़ा है पर महंगाई के अनुपात में कम! कहने का मतलब है कि जिन आवश्यकताओं का संबंध प्रत्यक्ष रूप से श्रम से है उनकी पूर्ति का मोल अब भी इतना कम है कि पांच सौ या हज़ार का नोट वहां प्रभावहीन हो जाता है। उससे भी ज्यादा यह कि छोटे व्यवसायी इतना बड़ा नोट लेने में डरते हैं क्योंकि नकली होने पर उनका एक या दो दिन नहीं वरन् सप्ताह भर की कमाई का नुक्सान हो जाता है। क्या कभी किसी ने इस अंतर्द्वंद्व को देखने का प्रयास किया है?
उस दिन एक मित्र मिला। उसने पांच साल फ्लेट खरीदा था! उसके मुहूर्त पर हम भी गये। उसने हमारे मकान का हाल हवाल पूछा तो हमने जवाब दिया कि ‘यथावत है, अभी उसे पूरा बनाने का सौभाग्य नहीं मिला! सोच रहे हैं कि तुम्हारी तरह ही कहीं फ्लेट खरीद लें।’
उसने कहा-‘मेरी सलाह है कि तुम उसे ही पूरा बनवाओ! यह फ्लेट सिस्टम बेकार है, क्योंकि वह अपने स्वामित्व से पैदा होने वाला आत्मविश्वास साथ नहीं रहता।’
उस मित्र से अधिक आत्मीयता नहीं है पर उस दिन अपने पुराने मकान मालिक के पास फ्लेट में जाने का अवसर मिला। मित्र न होने के बावजूद उनसे हमारी आत्मीयता है। अब वह मकान बेचकर फ्लेट में रहने लगे हैं। यह आत्मीयता इतनी अधिक है कि हम पिछले पंद्रह वर्षो में शायद सात आठ बार मिले होंगे पर जब मुलाकत होती है तो ऐसा नहीं लगता कि यह अंतराल उसे कम नहीं कर पाया। हम उनके फ्लेट में पहुंचे तो आसपास स्वतंत्र आवास भी बने देखकर अज़ीब लगा। पांचवीं मंजिल पर खड़े होकर देखने से वह स्वतंत्र आवास भले ही अज़ीब लगे पर उन आत्मीय सज्जन से वार्तालाप में फ्लेट सोसायटी का भी आभास हुआ। सोसायटी का सचिव या अध्यक्ष अगर ठीक न हुआ तो अनेक परेशानियां होती हैं। कोई संयुक्त निर्माण कराना हो तो उस पर विवाद होता ही है। इसके अलावा कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने फ्लेट लिये हैं पर वह किराये पर चलाते हैं और वहां अगर कोई ऐसा आदमी आ जाये जो प्रतिकूल प्रवृत्ति का हो तो पूरी सोसायटी के लिये संकट खड़ा हो जाता है। कोई मकान बेचकर जाता है तो सोसायटी वालों को यह चिंता होती है कि पता नहीं अब किस तरह का आदमी आयेगा। पूरे पांच घंटे तक वहां गुजारे पर ऐसा लगा कि फ्लेट सिस्टम कम से कम हम जैसे स्वतंत्र और स्वछंद आदमी के लिये अनुकूल नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह लगी कि इस फ्लेट सिस्टम पर कोई कहानी अपने से लिखते हुए बनेगी भी नहीं, क्योंकि जहां समाज के बहुत बड़े भाग को संबोधित करते हुए लिखने की आदत हो वहां फ्लेट सोसायटी की सोच ही संकुचित मानसिकता के साथ ही चिंतन क्षमता कम होने का प्रमाण लगती है।
जब हम अपने प्रचार माध्यमों में इसी फ्लेट प्रणाली को लेकर सृजन या कार्यक्रम पर दृष्टिपात करते हैं तो लगता है कि जैसे कहीं से हम भटक कर सोच रहे हैं। ऐसे में हम जब भारतीय समाज की बात करते हैं तो लगता है कि अब उसका कोई एक स्वरूप नहीं है। बाहर से एक दिखने वाला यह समाज अंदर से इतना खोखला हो चुका है कि उसके बुद्धिजीवी भी उसे देखना या दिखाना नहीं चाहते। यह अलग बात है कि अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर ही हम उसे देख सकते हैं पर भौतिक आधार पर इसके इतने खंड हो चुके हैं कि इसके लिये बहुत सारा लिखना पड़ेगा। इस पर इतनी कहानियां बन जायेंगी कि फ्लेट सोसायटी के सचिवों पर आधारित कथानकों पर सोचने वाले उसकी कल्पना तक नहीं कर पायेंगे क्योंकि उनके लिये यह असुविधाजनक मार्ग होगा।
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Dec 9, 2010

भूख और जज़्बात-हिन्दी शायरी (bhukh aur jazbat-hindi shayari)

जिंदा रहने के लिये
मरते दम तक वह दौलत का ढेर लगायेंगे,
जिस भूख से पड़ा नहीं कभी वास्ता
उसके आने के शक में
भागते ही जायेंगे।
उनसे हक इंसाफ की
उम्मीद करना बेकार है
अपने खौफ से भागते हुए
जिंदगी गुजारने वाले
अपने पांव तले
आम इंसानों के जज़्बात
यूं ही कुचलते जायेंगे।
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जिनसे चाहा है आसरा जान का
वही छुरा पीठ में घौंप जाते हैं,
फिर अपनी मज़बूरी जताते हैं।
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Dec 5, 2010

पहुंच गये जब मंजिल पर-हिन्दी शायरी (manzil-hindi shayari)

अपने जिंदा इंसाने होने का
अहसास भी अब डराने लगा है,
ज़माने की सच्ची मोहब्बत हो गयी है
लकड़ी, लोहे, और प्लास्टिक के सामनों से
इसलिये किसी की हमदर्दी भी
झूठी होने का ख्याल सताने लगा है।
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ज़माने को अब ख्यालों से
बस में नहीं किया जाता है,
चंद अफसाने सुना दो
उकता चुके दिल को बहलाने के लिये
लोगों का झुंड चला आता है।
अक्ल की बात करो या नहीं
बस, दिल्लगी करना आना चाहिए,
भूखे के रोटी का इंतज़ाम
ऊपर वाला कर लेगा,
अपनी जिंदगी की ऐश के लिये
कोई भी ख्वाब बेचकर, तरक्की पाईये,
पहुंच गये जब मंजिल पर
दुश्मन भी सलाम ठोकने चला आता है।
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