सामने कुछ कहैं
पीठ पीछे कुछ और
ऐसे लोगों की बातों पर क्या करें गौर
बात काम करें मचाएँ ज्यादा शोर
बोले और पीछे पछ्ताएं
जैसे नाचने के बाद रोए मोर
जिनके मन में नही सदभाव
उनकी वाणी में होता है कटुता का भाव
अपनी पीठ आप थपथपापाएं
अपने दिल का मैल छिपाएं
क्या पायेंगे ऐसे लोगों को बनाकर सिरमौर
उनकी भीड़ में शामिल होने से बेहतर है
अकेले में समय गुजारें
उनके झुंड में रहने से अच्छा है
भले लोगों का तलाश करें ठौर
समसामयिक लेख तथा अध्यात्म चर्चा के लिए नई पत्रिका -दीपक भारतदीप,ग्वालियर
Oct 30, 2007
Oct 27, 2007
सच और झूठ
एक झूठ सौ बार बोला जाये
तो वह सच हो जाता है
और एक सच सौ बार
दुहराया जाये तो
मजाक हो जाता है
सच होता है अति सूक्ष्म
विस्तार लेते वृक्ष की तरह
कई झूठ भी समेटे हुए
वटवृक्ष बन जाता है
कौनसा पता झूठ का है
और कौनसा सच का
पता ही नही लग पाता है
लोग पते पकडे हाथ में ऐसे
मानो सच पकडा हो
भले ही झूठ ने उनकी बुद्धि को जकडा हो
जिनके पास सच है
उनको भी भरोसा नहीं उस पर
जिन्होंने झूठ को पकडा है
वह भी अपने पथ को सच
मानकर चलते हैं उस पर
सदियों से चल रहा है द्वंद
सच और झूठ का
इसका अंत कहीं नहीं आता है।
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तो वह सच हो जाता है
और एक सच सौ बार
दुहराया जाये तो
मजाक हो जाता है
सच होता है अति सूक्ष्म
विस्तार लेते वृक्ष की तरह
कई झूठ भी समेटे हुए
वटवृक्ष बन जाता है
कौनसा पता झूठ का है
और कौनसा सच का
पता ही नही लग पाता है
लोग पते पकडे हाथ में ऐसे
मानो सच पकडा हो
भले ही झूठ ने उनकी बुद्धि को जकडा हो
जिनके पास सच है
उनको भी भरोसा नहीं उस पर
जिन्होंने झूठ को पकडा है
वह भी अपने पथ को सच
मानकर चलते हैं उस पर
सदियों से चल रहा है द्वंद
सच और झूठ का
इसका अंत कहीं नहीं आता है।
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Oct 23, 2007
अनुभूति
अपने अन्दर ही अपने पर
जब यकीन नहीं होता
तब किसी दूसरे पर
कोई कैसे भरोसा करेगा
जैसे मन में होगा खुद का चेहरा
वैसा ही दूसरे का भी लगेगा
तुम कितना चाहो
उधार की रौशनी से
तुम्हारा मन रोशन हो जाये
वह कभी संभव नहीं
क्योंकि जब तक तुम
खुद के नहीं बन सकते
तब क्या लगेगा गैर भी अपना
तुम्हें तो अपना भी गैर लगेगा
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जब यकीन नहीं होता
तब किसी दूसरे पर
कोई कैसे भरोसा करेगा
जैसे मन में होगा खुद का चेहरा
वैसा ही दूसरे का भी लगेगा
तुम कितना चाहो
उधार की रौशनी से
तुम्हारा मन रोशन हो जाये
वह कभी संभव नहीं
क्योंकि जब तक तुम
खुद के नहीं बन सकते
तब क्या लगेगा गैर भी अपना
तुम्हें तो अपना भी गैर लगेगा
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Sep 23, 2007
क्रिकेट बहुत दिन बाद जनचर्चा का विषय बना
आज पहली बार बहुत समय बाद लोगों के मुहँ से क्रिकेट के बारे में चर्चा करते सुना, और स्पष्ट है कि यह कल बीस ओवरीय विश्वकप प्रतियोगिता के सेमी फाइनल में आस्ट्रेलिया को हारने के बाद शुरू हुई। पहले ऎसी चर्चा १९८३ में शुरू हुई थी बाजार में लोगों को जमकर भुनाया गया और विश्व में आर्थिक रुप से गरीब कहे जाने वाला भारत क्रिकेट का आर्थिक आधार बन गया। फिर एक दौर एसा आया कि भारतीय टीम अंतर्राष्ट्रीय दौरों पर तो अच्छा प्रदर्शन करती पर प्रतियोगिताओं में पिट कर आ जाती। क्रिकेट के कर्ण धारों को लगता कि अन्तराष्ट्रीय दौरों के सफलता से भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता बरकरार रहेगी और उन्होने प्रतियोगिताओं को भी सामान्य रुप से लिया और पिछले विश्व कप के बाद भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता कम हो गयी भले ही क्रिकेट से जुडे लोग इसे नही मानते हैं पर इसके आर्थिक पक्ष से जुडे विशेषज्ञ इस पहलू को जानते हैं कि लोगों में अगर लगाव अधिक नहीं है तो उसका फ़ायदा नही उठाया जा सकता है।
बीस ओवरीय मैच अगर देखा जाये तो भारत में क्रिकेट को लोकप्रियता दिला सकते हैं और बाजार में एक बार फिर लोगों में इसके प्रति लगाव पैदा कर उसे भुना सकते है पर उसकी एक ही शर्त है कि भारत इस कप को जीत ले। महत्वपूर्ण मैच हारने के मामले में भारतीय खिलाडी बदनाम है और इसी कारण दर्शकों में खेल और खिलाडियों के प्रति जज्बा कम भी है। हालांकि लोग कहते हैं कि खेल है उसको खेल की भावना से देखा जाना चाहिऐ पर और यह सही भी है पर जब इससे जुडे आर्थिक पक्षों के बारे में सोचेंगे तो यह साफ लगेगा कि जीत और सिर्फ जीत ही उसमें काम करती है, खिलाडियों को आर्थिक फायदा दिलाने में । सभी जगह एक नंबर को सलाम किया जाता है और दो और तीन नंबर वाले कहा जाता है कि'कोई बात नहीं अगली बार प्रयास करना'।
कल की जीत के बाद अगर लोगों में पुन: क्रिकेट के बारे में चर्चा शुरू हुई है तो इससे जुडे बाजार के लोग जरूर खुश हुए होंगे। आज मैं बाजार गया तो दुकानों, ठेलों और पार्कों के आसपास एकत्रित लोगों के मुहँ से इस बात में चर्चा सुनी -शायद कई वर्षों बाद। इसमें हर वर्ग का आदमी था-अब वर्गों के स्वरूप तो सब जानते ही हैं उनमें विस्तार से जाने की बजाय हम कह सकते हैं कि क्रिकेट के बारे मे पहली बार जन सामान्य के बीच चर्चा हुई। आर्थिक समीक्षकों की दृष्टि से कहें तो आज बहुत दिन बाद क्रिकेट का बाजार खुला।
बहुत दिन से क्रिकेट के लेकर लोगों में निराशा का भाव था और फाइनल में उत्साह का संचार तो हुआ है पर यह आगे बना रहे तो इसकी एक ही शर्त है कि भारत इस विश्व कप को जीत ले। वैसे मुझे यह यकीन है कि भारत इस विश्व कप जीत लेगा क्योंकि इसमें सब युवा खिलाड़ी हैं और उनमें पूरी तरह एकजुटता का भाव दिखाई देता है जबकि पिछले एक दिवसीय विश्व कप में गयी टीम के बारे में किसी को विश्वास नहीं था और खिलाडियों के मनमुटाव की चर्चाएं भी सार्वजनिक रुप से हो चुकीं थी। फिर उसके अनेक खिलाडी अनफिट थे। जैसा कि मैं कहता हूँ कि क्रिकेट खिलाड़ी की फिटनेस का आंकलन उसकी बैटिंग और बोलिंग से नही बल्कि उसकी रन लेने के लिए विकेटों की बीच दौड़ तथा क्षेत्र रक्षण करने की फुर्ती से देखा जाना चाहिऐ और मुझे इस टीम में इस दृष्टि से कोई कमी नहीं दिखाई देती। मेरी इस टीम को शुभकामना है कि वह जीते और देशवासियों का मनोबल बढाए जिनके जज्बातों पर उनका और इस खेल का भविष्य टिका हुआ है।
बीस ओवरीय मैच अगर देखा जाये तो भारत में क्रिकेट को लोकप्रियता दिला सकते हैं और बाजार में एक बार फिर लोगों में इसके प्रति लगाव पैदा कर उसे भुना सकते है पर उसकी एक ही शर्त है कि भारत इस कप को जीत ले। महत्वपूर्ण मैच हारने के मामले में भारतीय खिलाडी बदनाम है और इसी कारण दर्शकों में खेल और खिलाडियों के प्रति जज्बा कम भी है। हालांकि लोग कहते हैं कि खेल है उसको खेल की भावना से देखा जाना चाहिऐ पर और यह सही भी है पर जब इससे जुडे आर्थिक पक्षों के बारे में सोचेंगे तो यह साफ लगेगा कि जीत और सिर्फ जीत ही उसमें काम करती है, खिलाडियों को आर्थिक फायदा दिलाने में । सभी जगह एक नंबर को सलाम किया जाता है और दो और तीन नंबर वाले कहा जाता है कि'कोई बात नहीं अगली बार प्रयास करना'।
कल की जीत के बाद अगर लोगों में पुन: क्रिकेट के बारे में चर्चा शुरू हुई है तो इससे जुडे बाजार के लोग जरूर खुश हुए होंगे। आज मैं बाजार गया तो दुकानों, ठेलों और पार्कों के आसपास एकत्रित लोगों के मुहँ से इस बात में चर्चा सुनी -शायद कई वर्षों बाद। इसमें हर वर्ग का आदमी था-अब वर्गों के स्वरूप तो सब जानते ही हैं उनमें विस्तार से जाने की बजाय हम कह सकते हैं कि क्रिकेट के बारे मे पहली बार जन सामान्य के बीच चर्चा हुई। आर्थिक समीक्षकों की दृष्टि से कहें तो आज बहुत दिन बाद क्रिकेट का बाजार खुला।
बहुत दिन से क्रिकेट के लेकर लोगों में निराशा का भाव था और फाइनल में उत्साह का संचार तो हुआ है पर यह आगे बना रहे तो इसकी एक ही शर्त है कि भारत इस विश्व कप को जीत ले। वैसे मुझे यह यकीन है कि भारत इस विश्व कप जीत लेगा क्योंकि इसमें सब युवा खिलाड़ी हैं और उनमें पूरी तरह एकजुटता का भाव दिखाई देता है जबकि पिछले एक दिवसीय विश्व कप में गयी टीम के बारे में किसी को विश्वास नहीं था और खिलाडियों के मनमुटाव की चर्चाएं भी सार्वजनिक रुप से हो चुकीं थी। फिर उसके अनेक खिलाडी अनफिट थे। जैसा कि मैं कहता हूँ कि क्रिकेट खिलाड़ी की फिटनेस का आंकलन उसकी बैटिंग और बोलिंग से नही बल्कि उसकी रन लेने के लिए विकेटों की बीच दौड़ तथा क्षेत्र रक्षण करने की फुर्ती से देखा जाना चाहिऐ और मुझे इस टीम में इस दृष्टि से कोई कमी नहीं दिखाई देती। मेरी इस टीम को शुभकामना है कि वह जीते और देशवासियों का मनोबल बढाए जिनके जज्बातों पर उनका और इस खेल का भविष्य टिका हुआ है।
Sep 8, 2007
दृष्टा बनकर जो रहेगा
अगर मन में व्यग्रता का भाव हो तो
सुहाना मौसम भी क्या भायेगा
अंतर्दृष्टि में हो दोष तो
प्राकृतिक सौन्दर्य का बोध
कौन कर पायेगा
मन की अग्नि में पकते
विद्वेष, लालच, लोभ, अहंकार और
चिन्ता जैसे अभक्ष्य भोजन
गल जाता है देह का रक्त जिनसे
तब सूर्य की तीक्ष्ण अग्नि को
कौन सह पायेगा
अपने ही ओढ़े गये दर्द और पीडा का
इलाज कौन कर पायेगा
कहाँ तक जुटाएगा संपत्ति का अंबार
कहाँ तक करेगा अपनी प्रसिद्धि का विस्तार
आदमी कभी न कभी तो थक जाएगा
जो दृष्टा बनाकर जीवन गुजारेगा
खेल में खेलते भी मन से दूर रहेगा
वही अमन से जीवन में रह पायेगा
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सुहाना मौसम भी क्या भायेगा
अंतर्दृष्टि में हो दोष तो
प्राकृतिक सौन्दर्य का बोध
कौन कर पायेगा
मन की अग्नि में पकते
विद्वेष, लालच, लोभ, अहंकार और
चिन्ता जैसे अभक्ष्य भोजन
गल जाता है देह का रक्त जिनसे
तब सूर्य की तीक्ष्ण अग्नि को
कौन सह पायेगा
अपने ही ओढ़े गये दर्द और पीडा का
इलाज कौन कर पायेगा
कहाँ तक जुटाएगा संपत्ति का अंबार
कहाँ तक करेगा अपनी प्रसिद्धि का विस्तार
आदमी कभी न कभी तो थक जाएगा
जो दृष्टा बनाकर जीवन गुजारेगा
खेल में खेलते भी मन से दूर रहेगा
वही अमन से जीवन में रह पायेगा
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Sep 3, 2007
अपनी सोच से अपने को बचाओ
विश्वास, सहृदयता और प्रेम हम
ढूंढते दोस्तो, रिश्तेदारों और
अपने घर-परिवार में
अपने मन में कब और कहाँ है
कभी झांक कर देखा है
इस देह से बनी दीवार में
अपने अहं में खुद को जलाए देते हैं
इस भ्रम में कि कोई और
हमें देखकर जल रहा है
लोगों के मन में हमारे प्रति
विद्वेष पल रहा है
कभी अपने मन को साफ नहीं कर पाते
चाहे कितनी बार जाते
सर्वशक्तिमान के दरबार में
कुछ देर रूक जाओ
अपनी सोच को अपने से बचाओ
और फिर अपनी देह में सांस ले रहे
उस अवचेतन की ओर देखो
उससे बात करो
तब तुम्हारा भ्रम टूटेगा कि
कितना झूठ तुम सोच रहे थी
और सच क्या है इस संसार में
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ढूंढते दोस्तो, रिश्तेदारों और
अपने घर-परिवार में
अपने मन में कब और कहाँ है
कभी झांक कर देखा है
इस देह से बनी दीवार में
अपने अहं में खुद को जलाए देते हैं
इस भ्रम में कि कोई और
हमें देखकर जल रहा है
लोगों के मन में हमारे प्रति
विद्वेष पल रहा है
कभी अपने मन को साफ नहीं कर पाते
चाहे कितनी बार जाते
सर्वशक्तिमान के दरबार में
कुछ देर रूक जाओ
अपनी सोच को अपने से बचाओ
और फिर अपनी देह में सांस ले रहे
उस अवचेतन की ओर देखो
उससे बात करो
तब तुम्हारा भ्रम टूटेगा कि
कितना झूठ तुम सोच रहे थी
और सच क्या है इस संसार में
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Aug 30, 2007
इस ब्लोगर मीट पर हास्य कविता मत लिखना
पहले ब्लागर का पता उसके मित्र ने ही दूसरे ब्लागर को दिय था और सख्त हिदायत थी कि किसी भी तरह उससे बहस अधिक मत करना-वह कभी कामेडियन लगता है तो कभी ऐकदम दार्शनिक हो जाता है।
दूसरा ब्लागर उसके पत्ते पर पहुंचा। उसने पहले ब्लागर को उसके मित्र का परिचय दिया। पहले ब्लोगर ने भी उसका स्वागत किया और पूछा-'' आपको देखकर खुशी हुई पर मैने कभी आपका ब्लोग देखा ही नहीं है।'
दूसरा ब्लागर उसके पत्ते पर पहुंचा। उसने पहले ब्लागर को उसके मित्र का परिचय दिया। पहले ब्लोगर ने भी उसका स्वागत किया और पूछा-'' आपको देखकर खुशी हुई पर मैने कभी आपका ब्लोग देखा ही नहीं है।'
जरूरत क्या-'दूसरे ने कहा-'मैंने उस पर लिखा ही क्या है जो आप पढ पाते। बस अपने आने की घोषणा करने वाली दो-चार लाइनें डालीं और हो गये ब्लोगर, पर मैं आपका लिखा पढता हूं।'
पहला ब्लोगर-'क्या आपने कभी मेरे ब्लोग पर कमेंट दी है?'
दूसरा ब्लोगर्-''नहीं अब मैं आपका लिखा पढ्कर भूल जाता हूं कि कमेंट भी लिखा जाना चाहिये।'
पहला ब्लोगर-आपको बहुत पसंद आता है?'
दूसरा ब्लोगर-नही!आपका लिखा मेरे समझ से परे होता है, पर आप अच्छा लिखते हैं।'
पहला ब्लोगर-जब आपके समझ में नहीं आता तो कैसे कह सकते हैं कि अच्छा लिखता हूं?'
दूसरा ब्लोगर-मेरे समझ में नहीं आता इसलिये। खैर छोडिये इस बात को, काम की बात करें।' पहला ब्लोगर्-'आप मुझसे क्या चाह्ते हैं?'
दूसरा ब्लोगर-'कुछ खास नहीं! बस ऐक ब्लोगर मीट कर लेते हैं। इतनी सारी ब्लोग मीट हो रहीं हैं पर कोई अपने को बुला ही नहीं रहा है, इसलिये आज हम लोग भी ऐक मीटिंग कर लेते हैं। आप उसकी रिपोर्ट लिख देना।'
पहला ब्लोगर-'मैं क्यों लिखूं? आप क्यों नहीं लिखेंगे ?''
दूसरा ब्लोगर-मैं तो उस पर जबरदस्त कमेंट लिखूंगा।''
पहले ब्लोगर ने देखा कि वह लगातार अपने कंधे उचकाये जा रहा था-ऐसा लग रहा था कि वह कोई व्यायाम करने का आदी हो। पहले ब्लोगर ने कहा-'आप अपने कंधे लगातार इस तरह घुमा क्यों रहे हैं। कोई व्यायाम कर रहे हैं या बचपन से ही ऐसी कोई आदत है। इस तरह आपके कंधे घूम रहे हैं या नाच रहे हैं पता ही नहीं लग रहा है।'
दूसरा बोला-'आप ही देख लीजिये।'
पहला ब्लोगर-'आप ऐसा कर क्यों रहे हैं?'
दूसरा बोला-'और क्या करूं? कंप्युटर पर लिखते-लिखते ऐसी आदत हो गयी है। उस पर काम करते हुए भी टाइप करूं या नहीं ऐसे ही कंधे उचकाता रहता हूं ताकि मुझे यह याद रहे कि मैं ऐक ब्लोगर हूं।'
पहला ब्लोगर-हां, अभी आपने बताया था कि उस पर अपने आने की घोषणा करते हुए ऐक पोस्ट डाली थी। वैसे आप किस तरह और कौनसे विषयों पर लिखते हैं?'
दूसरा ब्लोगर्-'मैंने आपको बताया थ कि बस ऐक बार लिख है और वह मेरी जिंदगी की पहली और आखिरी रचना है।
पहला ब्लोगर्-'कुछ तो लिखते ही होंगे।'
दूसरा ब्लोगर्-'बस कुछ ज्यादा नहीं बस कमेंट लिखता हूं कभी-कभी। वैसे इस लाइन में आपसे सीनियर हूं। वैसे कमेंट लिखना भी कोई आसान काम नहीं है।'
पहला ब्लोगर-'आपकी बात सही हैं, कमेंट लिखना भी कोई आसान काम नहीं है। पर आप बताईये हम दो लोग मिलकर कैसे ब्लोगर मीट कर सकते हैं? क्या आपके पास इसके कोई योजना है?'
दूसरा ब्लोगर्-'मेरे पास दस ब्लोग हैं। आपके पास भी छह ब्लोग है। फ़िर चिंता की क्या बात है? किसी भी ब्लोगमीट में इतने सारे ब्लोग लिखने वाले लेखक नहीं शामिल हुए होंगे।'
वह अपने कंधे लगातार उचकाये जा रहा था। पहला ब्लोगर-'आपकी बात सही हैं। पर हम लिखने वाले तो दो ही लोग हैं।'
दूसरा बोला-'मेरे सभी ब्लोगों पर अलग-अलग नाम हैं। किसीपर मेरा असली नाम नहीं हैं। सभी नाम छ्द्म हैं, आपके भी छ्द्म नाम से कुछ् ब्लोग तो होंगे ही?'
पहला ब्लोगर-हां! ऐक धार्मिक ब्लोग है और उस पर केवल धार्मिक विषयों पर ही लिखता हूं।'
दूसरा ब्लोगर-'तब तो मजा आ गया। हमारे मीट में धार्मिक ब्लोगर का होना चार चांद लगा देगा।'
पहला ब्लोगर-पर वह तो मैं ही हूं।'
दूसरा-पर यहां कौंन देखने आ रहा है। आप तो अपने छ्द्म नाम ही लिख देना। और हां मैने अपने अपनी बच्ची और पत्नी के नाम पर भी ब्लोग बनाये हैं पर उन पर कुछ लिखा नहीं है, मीट में उनकी उपस्थिति भी दिखा देना। इससे महिलाओं की उपस्थिति भी हो जायेगी। '
गृह्स्वामिनी चाय और नाश्ता ले आयी उनके जाने के बाद दूसरा ब्लोगर बोला-'आपने भाभी जी से परिचय नहीं कराया?'
गृह्स्वामिनी चाय और नाश्ता ले आयी उनके जाने के बाद दूसरा ब्लोगर बोला-'आपने भाभी जी से परिचय नहीं कराया?'
पहला-इसलिये कि आप और मैं आराम से चाय और नाश्ता उदरस्थ कर सकें।'
दूसरा-'क्या ब्लोगिंग से चिढती हैं?"
पहला-'नहीं, नफ़रत करती हैं।'
दूसरा-'कोई बात नहीं है। मेरी पत्नी ने भी घर से निकाल दिया है। अब इधर्-उधर रिश्तेदारों के यहां रहकर गुजार लेता हूं। घर में दोबारा घुसने देने के लिये उसने ब्लोगिंग छोडने की शर्त रखी है।'
पहला-'फ़िर आप ब्लोगिंग कैसे करते हैं?'
दूसरा-'ऐक साइबर कैफ़े वाले को पटा रखा है।'
पहला-'आप किस तरह के ब्लोग पर कमेंट रखते है।'
दूसरा-चाहे जिस पर भी। बस लेखक चिढ जाये या डरकर ब्लोगिंग छोड जाये। मुझे कोई डर भी नहीं लगता क्योंकि मेरा तो सब जगह छ्द्म नाम है, यहां तक कि घर परिवार के लोगों के नाम भी छ्द्म हैं। वह तो मैं खुद मानकर चलता हूं कि उनके नाम है।"
पहला-'आपके ब्लोग का नाम क्या है?"
जैसे ही उसने अपने ब्लोग का नाम बताया पहला ब्लोगर उछल कर खडा हो गया और बोला-'अच्छा तो वह तुम थे जो मेरे छ्द्म ब्लोग पर अभद्र कमेन्ट रख गये थे। तुमने मुझे विचाराधारा की लडाई लडने की चुनौती दी थी और मैने उसी वजह से उसे धर्म का ब्लोग बना दिया। उसके बाद तुम आये ही नहीं। आज आओ तो कर लें विचारधारा पर बहस!'
दूसरा-आप नाराज क्यों हो रहें है? आपने खुद ही कहा कि आपका छ्द्म नाम है, अगर आपक असली नाम होता तो आपका हक बनता शिकायत करने का । अच्छा अब आप ब्लोगर मीट पर रिपोर्ट लिख देना।'
पहला-कौनसी ब्लोगर मीट?'
दूसरा-'यह जो अभी यहां हुई।'
पहला-'यह ब्लोगर मीट थी?'
दूसरा-' और क्या थी? मुझे क्या बेवकूफ़ समझ रखा है जो इतने देर से बात कर रहा हूं। मैं केवल मीटिंग में ही बोलता हूं। मेरे पास फ़ालतु समय नहीं है। और हां, इस पर कोई हास्य कविता मत लिख देना। मुझे वह बिल्कुल पसंद नही है।फ़िर कमेंट नहीं लिखूंगा।'
वह चला गया। पहले ब्लोगर ने यह सोचकर चैन की सांस ली ऐक तो घर में यह किसी को पता नहीं लगा कि वह ब्लोगर था दूसरा उसने हास्य कविता के मनाही की थी हास्य आलेख की नहीं।
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तुम तय करो पहले अपनी जिन्दगी में चाहते क्या हो फिर सोचो किस्से और कैसे चाहते क्या हो उजालों में ही जीना चाहते हो तो पहले चिराग जलाना सीख...