Nov 11, 2007

उसकी दूसरी गलती-हिंदी कहानी

बोस का आदेश था कि मुझे उस कंपनी में एक 'आवश्यक सौदे ' के लिये जाना होगा। मैने मना किया और कहा कि-'मुझसे उंचे पद वाले अधिकारी जब इस कंपनी में हैं तो आप मुझे क्यों भेज रहें है और उस कंपनी की मैनेजिंग डायरेक्टर मुझ जैसे जूनियर से बात करना पसंद करेगी यह भी एक प्रश्न है।''
बोस ने मेरी राय को सिरे से ही नकारते हुए कहा-''नहीं! मैं तुम्हारी बात से एग्री नहीं करता क्योंकि तुम बहुत सीनियर हो, और रही अधिकारी होने या न होने की बात तो तुम इस शहर में बने रहने के लिये प्रमोशन नहीं लेते ताकि कहीं यहां से ट्रांसफर ना हो जाये। हैड क्वार्टर वाले भी इस बात को जानते है और इसलिए मुझे फोन पर तुम्हें ही इस काम के लिये भेजने को कहा है।"
आखिर मुझे वहां जाना ही पडा। मेरे इंकार के पीछे वह वजह नहीं थी जो मैने बोस को बताई थी। ऐक जैसे व्यवसाय होने के कारण उस कंपनी के संगठन और प्रबंधन की जानकारी मुझे होना स्वाभाविक थी कि ऐक एसा व्यक्ति वहां के प्रबंधन में था जो मेरे साथ पहले ऐक जगह काम कर चुका था और गबन के आरोप में वहां से निकला गया था। उसके इस कार्य की जानकारी उसके ही ऐक मित्र ने वहां के प्रबंधन को दी थी कि वह उसके साथ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं करेंगे। मगर प्रबंधन ने उसकी नहीं मानी और उसके खिलाफ़ पुलिस कार्रवाई की और वह कुछ दिन जेल में रहा और उसका मित्र उसे यह समझाने में सफ़ल रहा था कि यह सब मेरी वजह से हुआ था। वह जाते-जाते मुझसे बद्ला लेने की धमकी दे गया था-और वह जिस तरह का आदमी था उससे दूर रहना ही बेहतर था।
आखिर बोस के आदेश पर मैं वहां पहुंचा। मैं शंकित जरूर था पर डरा हुआ बिलकुल नहीं था। साथ ही मैं यह भी जानता था कि सब कुछ वैसा नहीं होगा जैसे बोस चाहते थे।
कंपनी की इमारत में घुसते ही वहां खडे चौकीदर को मैने अपना परिचय दिया तो उसने अंदर ऐक टेबल की तरफ़ जाने का इशारा किया जहां ऐक महिला बैठीं थी। मैं वहां पहुंचा और उसे अपना परिचय दिया तो उसने कहा-''आप अभी बैठिये।''
मैं उसके पास बैठ गया, कुछ देर बाद वह बोली-'' हमारी मेम साहब से मिलने के पहले उनके सचिव से मिलना होगा। वह अभी आते ही होंगे।"
मैने अभी बैठा ही था कि वह बोली-''लीजिये सर आगये।'' मैने पलट कर देखा और मुझे मिली जानकारी गलत नहीं थी। वही था और मुझे घूर रहा था। वह महिला उससे बोली-" सर, इनसे मिलिये, यह उस कंपनी से आये हैं जिसके लिये मेमसाहब कल बता रही थीं।''
वह मुझे घूर रहा था। मैं उससे उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था पर वह ऐसे ही चला गया।
मैने स्वागती महिला की तरफ देखा तो वह बोलीं-''वह उधर मेमसाहब के चेम्बर में पूछ्ने गये हैं।'' मुझे उसकी बात पर यकीन नहीं था। वह कुछ खेल करेगा यह मैं जानता था। थोडी देर बाद चपरासी आया और स्वागती से बोला-''वह कौन साह्ब हैं जो मेमसाहब से मिलने आये हैं। आप उनसे बोल दीजिये कि मेम साह्ब अपने ही समकक्ष किसी अधिकारी से बात करेंगी, मामूली कर्मचारी से नहीं।''
ऐसा कहकर वह चला गया, इस बीच स्वागती के पास फोन आगया और वह मुझसे बोली-''तुम तो कोई छोटे कर्मचारी हो। मेडम तुमसे नहीं मिलना चाहतीं। तुम अब यहां से तुरंत चले जाओ मेम साह्ब के सेक्रेटरी का आर्डर है।''
मैं जानता था कि कौन बोल रहा था , और मुझे उसके व्यवहार पर बिल्कुल गुस्सा नहीं आया क्योंकि मैं जानता था हमारी कंपनी से ज्यादा उस कंपनी को हमारी जरूरत थी। अगर मैं वहां से चला जाता तो किसी ऐक को जवाब देना ही था मुझे या उस कंपनी की डिप्टी डायरेक्टर को। मेरा इस तरह वहां से लौटना मेरी कंपनी स्वीकार नहीं कर सकती थी।
मैने स्वागती पर बैठी उस महिला कर्मचारी से कहा-''क्या मैं फोन कर सकता हूं।"
उसने एकदम शुष्क और कड़े स्वर में कहा-''नहीं। आपको यहाँ से जाने का आदेश है।''
मैंने बाहर निकल गया और बाहर से पीसीओ से अपने बॉस को फोन किया और उन्हें जानकारी दी। वह बोले-''उन्हें ग़लतफ़हमी है। तुमसे इस तरह का व्यवहार कर हमारी कंपनी से अनुबंध की उम्मीद छोड़ देना चाहिये, क्योंकि हमारा हेड क्वार्टर इस बहुत गंभीरता से लेगा। फ़िर भी मैं बात करता हूं। तुम दस मिनट बाद मुझे फोन करना।''
मैं वहीं खडा रहा। बरसात के दिन थे और मुझे पसीना आने के साथ प्यास भी बहुत लग रही थी, पर इससे ज्यादा इस बात की फिक्रथी कि दो कंपनियों के बीच मेरी वजह से विवाद छिड़ने वाला था। मैं ऐक होटल में गया और चाय्-नाश्ता करने के बाद फ़िर उसी पी.सी.ओ. पर आया। लगभग आधा घंटा गुजर गया था। मैने बॉस को फोन किया, मेरी आवाज सुनते ही बॉस बोले-''क्या कभी तुम किसी कंपनी में गबन करने के बाद जेल गए हो। क्या तुम्हें कभी नौकरी से निकाला गया। और क्या तुम इस कंपनी की तरफ़ से कांट्रेक्ट करने में अपना कमीशन खाते हो। क्यातुम ऐक बहुत बडे कमीशन खोर हो?''
मैने हंसकर कहा-'आपके मूंह से अपने बारे में यह कहानी सुनकर मुझे बिल्कुल ताज्जुब नहीं हुआ।' ''मैं जानता हूं!" बोस ने कहा-''तो तुम यह भी जानते हो कि किसने यह कहानी गढी होगी। मुझे उसका नाम बताओ। अभी तुम वहां जाओ मेडम तुमसे बात करने को तैयार हैं।''
पीसीओ उस कंपनी के दफ़्तर से ज्यादा दूर नहीं था। मैं जैसे ही वहां से बाहर निकला वैसे ही वह चपरासी मुझे मिल गया तो अंदर से मेरे लिये संदेश ले आया था और स्वागती ने मुझे बाहर जाने का आदेश दिया था। वह बोला-'सर, मेडम आपको बुला रहीं है।'
मैं उस कंपनी के इमारत की सीढियाँ चढ़कर उसी स्वागती के पास से गुजरा तो वह एकदम बोली-''सॉरी सर, मुझे मेडम के सेक्रेटरी साह्ब ने ऐसा करने को कहा था।"
मैं उसकी बात का जवाब दिये बिना ही डिप्टी मेनेजिंग की नेम प्लेट लगे कक्ष में दाखिल हो गया। वह काम कर रही थी और मेरी आहट सुनते ही उसने सिर ऊपर किया, मैं हतप्रभ रह गया वह एकदम मेरी तरफ़ देख रही थी। फ़िर बोली-''आप! नहीं मैं यकीन नहीं करती कि आप..................वह झूठ बोल रहा था।''
मैं उसे वहां देखकर आश्चर्य में था''तुम यहां कब आयी।'
वह बहुत खुश होकर बोली-''मैं तीन महिने से यहां हूं और आपका पता ढूंढ रही हूं और पता लगा कि अपने मकान बना लिया है। पहले तो आप बैठिये । मैं कुछ मंगवाती हूं। काम की बातें तो होती रहेंगी। मैं आपको ऐसे तो जाने नहीं दूंगी."
मैंने कहा-''हां। वैसे तुम्हें देखकर बहुत खुशी हो रही है, पर हमें काम पर भी बात करना चहिये क्योंकि बोस इस मामले में आज ही निर्णय करना चाह्ते हैं।"
-''आप बैठो तो सही-" काम की बाते तो होती रहेंगीं, मैं इस समय अपने हैड क्वार्टर से ओनलाइन बात कर रही हूं और उसमें आपकी कंपनी के बारे में भी चर्चा हो रही है। वैसे घर परिवार में सब ठीक है! मेरी प्यारी सहेली के हाल कैसे हैं। मैं उससे मिलना चाहती हूं। उसीको तो ढूंढ रही हूं और आज उसका पति हाथ आ गया तो अब उसे इतनी आसानी से नहीं छोडूंगी।"वह खुश होकर बोली.
मैं बैठ गया। वह ओन लाइन बात कर रही थी और मैं पिछली यादों में खो गया।
वह मेरी पत्नी की बचपन की सहेली थी और हमारे ऐक वर्ष बाद ही उसका विवाह भी हमारे शहर में हुआ। चूँकि दोनों ऐक ही शहर की थी इसलिए ऐक बार उसके विवाह के ऐक माह बाद दोनों अपने मायके भी साथ गयीं थीं । वह विवाह सेपहले ऐक कंपनी में कलर्क थी और यह आश्वासन मिलने के बाद कि उसकी कंपनी उसी शहर में उसका ट्रांसफर कर देगी लड़के वाले शादी को तैयार हुए थेक्योंकि वह कामकाजी लड़की चाह्ते थे। विवाह के बाद वह बहुत दिनों तक परेशान रही और इस दौरान मेरी पत्नी उसका हौसला बढाती , फ़िर ऐक दिन वह और उसका पति शहर छोड़ गये और उसके बाद कोई संपर्क नहीं हुआ पर यह जरूर पता लगा कि दोनों ने अपनी जिंदगी में आगे बहुत तरक्की की है। उसके बारे में जानकारी तभी मिलती जब मेरी पत्नि मायके जाती और उसके घर जरूर जाती और वहीं से जानकारी मिल जाती।
''मैं कल ही आपके घर आउंगी।"वह बोली तो मेरे विचारों कर क्रम टूटा-'आप अपना फोन नंबर दो तो मैं पहले अपनी सहेली से बात कर लूं। उसे यह बताऊँ तो सही मैं यहां हूं।"
हमारी कार्य सबंधित बात भी पूरी हो गयी थी और मैने उसे अपना फोन नंबर दिया और बाहर निकलने लगा तो वह बोली-''हां, आप यह तो बताओ वह मेरा सेक्रेटरी किसकी कहानी सुना रहा था। यकीनन आपकी तो है नहीं, क्योंकि आप जेल तो गये नहीं है क्योंकि मुझे पता पड़ जाती। कहीं अपनी तो नहीं सुना रहा था क्योंकि वह यहां बदनाम है।'
''यह तो उसी से ही पूछ लेना-"मैने कहा और बाहर निकल गया।
वह बाहर ही खडा था और उसका मूंह सूखा हुआ लग रहा था। मुझसे बोला-"वह तुम्हें जानती है?"
मैंने शुष्क स्वर में कहा-''वह मुझे बहुत मानती भी है पर मैने तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहा और न कहूंगा। मगर तुमने अपनी मुसीबत ऐक बार खुद बुलाई है। वह तुम्हें छोडेगी नही क्योंकि मेरी पत्नि से जब मिलेगी तो वह उसे जरूर बताएगी, आज से छह वर्ष पूर्व अपनी नौकरी खोने के बाद किस तरह धमकी दी थी। मैं कोशिश करूंगा वह इसे न बताये पर लगता है तुम्हारे पाप पीछा कर रहे हैं क्योंकि जिस कहानी को मैं भूल चुका था उसे तुमने खुद याद किया है, तुम्हें मेरी चर्चा उससे नही करनी थी, ताकि पुरानी बाते फिर एक बार हमारे सामने न आ सकें।"
मैं वहां से निकल आया और वह वहीं खडा आसमान में देख रहा था।शायद वह समझ गया था की उसने यह दूसरी गलती की है और लगभग वैसी ही जैसे पहले की थी जब उसने अपनी करिस्तानियों का जिक्र अपने मित्र से किया था जिसने प्रबंधन को पूरी बात बता दी थी।
नोट-यह मेरी मौलिक एवं स्वरचित हिंदी कहानी है।

1 comment:

परमजीत सिहँ बाली said...

दीपक जी,आप की यह कहानी सच्चाई के बहुत पास की लगती है...क्यूँकि हमारे समाज में आज ऐसे लोग भी बहुत बड़ी सख्या में मिल जाते हैं...जो दूसरो को नीचा दिखानें का अकसर मौका ढूंढते रहते हैं...ऐसी ही घट्ना मेरे एक साथी के साथ हो चुकी है।