गरीबी और महंगाई के मुद्दों से
हर जगह मुंह मोड़ लो,
जो बरसों तक रहे बेनतीजा
ऐसी बहसें चलती रहें
बिना मतलब के मुद्दे जोड़ लो,
तभी विज्ञापन का सदाबहार पेड़
बढ़ता रहेगा
चाहे जब फल तोड़ लो।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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3.दीपक भारतदीप का चिंतन
समसामयिक लेख तथा अध्यात्म चर्चा के लिए नई पत्रिका -दीपक भारतदीप,ग्वालियर
Jun 21, 2010
Jun 3, 2010
इश्क, एसोसिएशन और विज्ञापन-हास्य कविता (ishq,association and vigyapan)
छद्म नाम बताकर,
पराया फोटो लगाकर,
आशिक और माशुका ने
अपनी इश्क की कहानी रचाई,
हुई दोनों की पहली मीट
जो उनकी पहली और आखिरी मुलाकात का संदेश लाई।
माशुका गरजते बोली
‘हद हो गयी गयी इंटरनेट पर धोखे की,
कंप्यूटर की लोग इज्जत इतनी करते
जितनी कागज के खोखे की,
अब मैं एक माशुका एसोसियेशन बनाऊंगी,
आशिकों के धोखे से बचाने के लिये
नयी पीढ़ी की लड़कियों में
चेतना और जागरुकता पैदा करूंगी
जिसे बुढ़ापे तक चलाऊंगी,
कब तक सहूंगी यह सब
तुम्हारे साथ इश्क कर मैंने छठी बार चोट खाई।’
सुनकर आशिक भी दहाड़ा,
कविता ऐसे सुनाने लगा जैसे पहाड़ा,
आंखों से खून की धारा बह आई।
वह बोला
‘तुम्हारी एसोसिएशन के जवाब में
मैं भी आशिक एसोसिएशन बनाऊंगा,
छद्म नाम और पराये फोटो वाली
फर्जी माशुकाओं के जाल से बचाऊंगा,
इश्क के धोखे की इंटरनेट से कर दूंगा सफाई।’
सुन रहा था पास में एक
वेबसाईट लिखने वाला
उसके दिमाग में भी एक योजना आई।
मन ही मन कहने लगा
‘अच्छा है जो मेरे सामने हुई यह लड़ाई,
अब दोनों के पाठों का अपनी ’इश्क साईट’ पर लिंक दूंगा,
यह दोनों तो ठहरे फोकटिया,
मैं ठहरा पुराना पोपटिया,
इनका लिखा मजेदार होगा
पाठक मिलेंगे ज्यादा
जिससे अपने विज्ञापनों से चार पैसे कमा लूंगा,
फिर दावा करूंगा कि
इश्क जगत में कचड़ा साफ कर ला रहा हूं सफाई।
इसलिये आशिक माशुका एसोसिशन को
अपनी साईट से जोड़ रहा हूं
लोग पढ़ें और समझें
करें न एक दूसरे से बेवफाई।
अंतर्जाल लेखकों में माननीय भी हो जाऊंगा
इधर करूंगा कमाई।’
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पराया फोटो लगाकर,
आशिक और माशुका ने
अपनी इश्क की कहानी रचाई,
हुई दोनों की पहली मीट
जो उनकी पहली और आखिरी मुलाकात का संदेश लाई।
माशुका गरजते बोली
‘हद हो गयी गयी इंटरनेट पर धोखे की,
कंप्यूटर की लोग इज्जत इतनी करते
जितनी कागज के खोखे की,
अब मैं एक माशुका एसोसियेशन बनाऊंगी,
आशिकों के धोखे से बचाने के लिये
नयी पीढ़ी की लड़कियों में
चेतना और जागरुकता पैदा करूंगी
जिसे बुढ़ापे तक चलाऊंगी,
कब तक सहूंगी यह सब
तुम्हारे साथ इश्क कर मैंने छठी बार चोट खाई।’
सुनकर आशिक भी दहाड़ा,
कविता ऐसे सुनाने लगा जैसे पहाड़ा,
आंखों से खून की धारा बह आई।
वह बोला
‘तुम्हारी एसोसिएशन के जवाब में
मैं भी आशिक एसोसिएशन बनाऊंगा,
छद्म नाम और पराये फोटो वाली
फर्जी माशुकाओं के जाल से बचाऊंगा,
इश्क के धोखे की इंटरनेट से कर दूंगा सफाई।’
सुन रहा था पास में एक
वेबसाईट लिखने वाला
उसके दिमाग में भी एक योजना आई।
मन ही मन कहने लगा
‘अच्छा है जो मेरे सामने हुई यह लड़ाई,
अब दोनों के पाठों का अपनी ’इश्क साईट’ पर लिंक दूंगा,
यह दोनों तो ठहरे फोकटिया,
मैं ठहरा पुराना पोपटिया,
इनका लिखा मजेदार होगा
पाठक मिलेंगे ज्यादा
जिससे अपने विज्ञापनों से चार पैसे कमा लूंगा,
फिर दावा करूंगा कि
इश्क जगत में कचड़ा साफ कर ला रहा हूं सफाई।
इसलिये आशिक माशुका एसोसिशन को
अपनी साईट से जोड़ रहा हूं
लोग पढ़ें और समझें
करें न एक दूसरे से बेवफाई।
अंतर्जाल लेखकों में माननीय भी हो जाऊंगा
इधर करूंगा कमाई।’
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May 28, 2010
खूनखराबे का रोग-हिन्दी शायरी (khoonkharabe ka rog-hindi shayari)
वह खून की होली खेलकर
लाल क्रांति लाने का सपना दिखा रहे हैं,
भरे पेट उनके रोटी से
खेल रहे हैं
बेकसूरों की शरीर से निकली बोटी से,
हैवानियत भरी सिर से पांव तक उनके
वही गरीबों के मसीहा की तरह नाम लिखा रहे हैं।
----------
गोली का जवाब गोली ही हो सकती है
जानवरों से दोस्ती संभव है,
अकेले आशियाना बनाकर
जीना भी बुरा नहीं लगता
जहां पक्षी करते कलरव हैं,
पर हैवानों से समझौता कर
अपनी अस्मिता गंवाना है,
लड़ने के लिये उनको
फिर लाना कोई नया बहाना है,
कत्ल करने के लिये तत्पर हैं जो लोग,
उनको है खूनखराबे का रोग,
कत्ल हुए बिना वह नहीं मानेंगे,
जिंदा रहे तो फिर बंदूक तानेंगे,
सज्जन होते हैं ज़माने में
असरदार उन पर ही मीठी बोली हो सकती है।
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भरे पेट उनके रोटी से
खेल रहे हैं
बेकसूरों की शरीर से निकली बोटी से,
हैवानियत भरी सिर से पांव तक उनके
वही गरीबों के मसीहा की तरह नाम लिखा रहे हैं।
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गोली का जवाब गोली ही हो सकती है
जानवरों से दोस्ती संभव है,
अकेले आशियाना बनाकर
जीना भी बुरा नहीं लगता
जहां पक्षी करते कलरव हैं,
पर हैवानों से समझौता कर
अपनी अस्मिता गंवाना है,
लड़ने के लिये उनको
फिर लाना कोई नया बहाना है,
कत्ल करने के लिये तत्पर हैं जो लोग,
उनको है खूनखराबे का रोग,
कत्ल हुए बिना वह नहीं मानेंगे,
जिंदा रहे तो फिर बंदूक तानेंगे,
सज्जन होते हैं ज़माने में
असरदार उन पर ही मीठी बोली हो सकती है।
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May 24, 2010
आवारा जिन्न-हिन्दी शायरी (awara jinna-hindi shayari
जीवन पथ पर धीमे धीमे
कदम बढ़ाना
यह राह कहीं सहज तो कहीं कठिन है,
रात्रि को चंद्रमा की इठलाती किरणों के तले
उतना ही मस्ताना जितना सह सको
क्योंकि आगे सूरज की किरणों से सजा
आने वाला दिन है।
अपने घर के रखवाले
खुद ही बनकर रहना,
किसी दूसरे को नहीं सौंपना
अपने सम्मान कागहना,
काली नीयत की आग
अच्छी नज़र को पिघला देती है
जैसे आग से पानी हो जाता हिम है।
चौराहे पर आकर चमकने की कोशिश
तुम्हें बाज़ार में बिकने वाली आवारा चीज़ बना देगी,
यह दौलत पाने के अनंत इच्छा
केवल जिंदगी ही नहीं
मौत को भी सोने के भाव गला देगी,
पैसा है यहां सभी का देवता
जबकि सर्वशक्तिमान ने बनाया उसे आवारा जिन्न है।
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यह राह कहीं सहज तो कहीं कठिन है,
रात्रि को चंद्रमा की इठलाती किरणों के तले
उतना ही मस्ताना जितना सह सको
क्योंकि आगे सूरज की किरणों से सजा
आने वाला दिन है।
अपने घर के रखवाले
खुद ही बनकर रहना,
किसी दूसरे को नहीं सौंपना
अपने सम्मान कागहना,
काली नीयत की आग
अच्छी नज़र को पिघला देती है
जैसे आग से पानी हो जाता हिम है।
चौराहे पर आकर चमकने की कोशिश
तुम्हें बाज़ार में बिकने वाली आवारा चीज़ बना देगी,
यह दौलत पाने के अनंत इच्छा
केवल जिंदगी ही नहीं
मौत को भी सोने के भाव गला देगी,
पैसा है यहां सभी का देवता
जबकि सर्वशक्तिमान ने बनाया उसे आवारा जिन्न है।
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May 16, 2010
वफा सस्ती कब थी-हिन्दी शायरी (vafaa sasti aur mahangi-hindi shayari)
वफा न कभी सस्ती थी
जो कहें अब महंगी हो गयी,
बाज़ार से हो गयी लापता बरसों से
खरीदने वालों की जो तंगी हो गयी।
दाम चुकाकर वफा खरीद सकते हैं,
पर उसके खालिस होने का नहीं दम भरते हैं,
जब जब कीमत का नकाब उतरा
तब असलियत नंगी हो गयी।
-------------
कई अक्लमंद लगे हैं काम पर
दुनियां के आम इंसान जगाने के लिये,
इसलिये कोई दे रहा है खूनी तकरीर
कोई बांट रहा हथियार लोगों में, लड़ने के लिये।
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बाज़ार से हो गयी लापता बरसों से
खरीदने वालों की जो तंगी हो गयी।
दाम चुकाकर वफा खरीद सकते हैं,
पर उसके खालिस होने का नहीं दम भरते हैं,
जब जब कीमत का नकाब उतरा
तब असलियत नंगी हो गयी।
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कई अक्लमंद लगे हैं काम पर
दुनियां के आम इंसान जगाने के लिये,
इसलिये कोई दे रहा है खूनी तकरीर
कोई बांट रहा हथियार लोगों में, लड़ने के लिये।
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May 10, 2010
समाज एक कारखाना-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (society is a factory-hindi satire poem)
समाज एक कारखाना और
परिवार एक उत्पादित है
उन बुद्धिजीवियों के लिये
जो सजाते हैं अपने ख्यालों में
बड़े करीने से,
ढूंढते हैं परिवारों में
टूटने बिखरने की कहानियां
वाद और नारे से आगे उनकी सोच नहीं जाती,
जिसे कई बार दोहराते
इनामों की थाली उनके घर सजकर आती,
जगा रहे हैं श्रम के लिए इंसाफ की रौशनी
ऐसे लोग
जिनका बदन नहीं नहाया कभी पसीने से।
-------------
कभी ढूंढते हैं लड़खड़ाती प्रेम कहानी में
आजादी का सवाल,
दुनियां में सच की जंग के लिये
तब मचाते हैं इंसानियत के आशिक की तरह बवाल।
कहीं खूनखराबे में
इंसाफ की जंग के कायदे बतलाते
देश के पहरेदारों की शहादत से
अपना मुंह छिपाते
कलम के वीरों की तरह ठोकते ताल।
----------
कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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3.दीपक भारतदीप का चिंतन
परिवार एक उत्पादित है
उन बुद्धिजीवियों के लिये
जो सजाते हैं अपने ख्यालों में
बड़े करीने से,
ढूंढते हैं परिवारों में
टूटने बिखरने की कहानियां
वाद और नारे से आगे उनकी सोच नहीं जाती,
जिसे कई बार दोहराते
इनामों की थाली उनके घर सजकर आती,
जगा रहे हैं श्रम के लिए इंसाफ की रौशनी
ऐसे लोग
जिनका बदन नहीं नहाया कभी पसीने से।
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कभी ढूंढते हैं लड़खड़ाती प्रेम कहानी में
आजादी का सवाल,
दुनियां में सच की जंग के लिये
तब मचाते हैं इंसानियत के आशिक की तरह बवाल।
कहीं खूनखराबे में
इंसाफ की जंग के कायदे बतलाते
देश के पहरेदारों की शहादत से
अपना मुंह छिपाते
कलम के वीरों की तरह ठोकते ताल।
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May 6, 2010
जज़्बात सौदे की तरह बांटते-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (jazbat saude ki tarah bantte-hindi vyangya kavitaen)
इतिहास के पन्नों में
दर्ज खूनखराबे के हादसो में से
वह अपने ख्याल के मुताबिक
पढ़कर आते हैं।
बैठकर महफिलों में
फिर उन पर आंसु बहाते है,
खून का रंग एक जरूर मानते पर
ख्यालों न मिलते हों तो
कई इंसानों के खून भी
उनको पानी की तरह मानकर नज़र फेर जाते हैं।
-------
कुछ तारीखों को
हमेशा वह दोहराते,
कुछ को भूल जाते।
दर्द का व्यापार करने वाले
अपने जज़्बात सौदे की तरह बांटते
जहां न मिलें दाम,
न मिलता हो इनाम,
वहां से अपनी सोच सहित लापता हो जाते।
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दर्ज खूनखराबे के हादसो में से
वह अपने ख्याल के मुताबिक
पढ़कर आते हैं।
बैठकर महफिलों में
फिर उन पर आंसु बहाते है,
खून का रंग एक जरूर मानते पर
ख्यालों न मिलते हों तो
कई इंसानों के खून भी
उनको पानी की तरह मानकर नज़र फेर जाते हैं।
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कुछ तारीखों को
हमेशा वह दोहराते,
कुछ को भूल जाते।
दर्द का व्यापार करने वाले
अपने जज़्बात सौदे की तरह बांटते
जहां न मिलें दाम,
न मिलता हो इनाम,
वहां से अपनी सोच सहित लापता हो जाते।
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जमीन पर लहु बिखरा पड़ा है फिर भी उनका बयान किन्तु और परंतु शब्दों के साथ खड़ा है। मरने वालों पर बोले वह कुछ शब्द पर कातिलों का दर्द भी बया...
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तुम तय करो पहले अपनी जिन्दगी में चाहते क्या हो फिर सोचो किस्से और कैसे चाहते क्या हो उजालों में ही जीना चाहते हो तो पहले चिराग जलाना सीख...