Aug 10, 2009

नकली आंसू फूटे नहीं-हिंदी शायरी (naqli ansu-hindi shayri)

जिंदगी के सफर में
कई बार अपनों ने ही गिराया
फिर भी टूटे नहीं।
काम निकालकर भूल गये
फिर भी हम रूठे नहीं।
हमारे अरमानों को लगाई गयी आग
फिर भी अपने दूसरे के सपने फूंके नहीं।
कभी कभी लगता है
गलती दर गलती करते गये
लोगों को झूठे दर्द
अपने समझ कर सहते गये
पर फिर सोचते हैं कि
भला वह लोग भी तो
इतनी दगा के बावजूद
अपनी जिंदगी में उठे नहीं।
यूं ही खड़े हैं जिंदगी में
सलामत हैं हाथ पांव क्या यह कम है
जुटा लेते अपने लिये
हम भी नकली हमदर्द
पर इन आंखों से कभी नकली आंसू फूटे नहीं।

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Aug 8, 2009

नये इंसान के उड़ने की चाहत-हास्य व्यंग्य (insan ki chahat-hasya vyangya)

सर्वशक्तिमान ने एक नया इंसान तैयार किया और उसे धकियाने से पहले उसके सभी अंगों का एक औपचारिक परीक्षण किया। आवाज का परीक्षण करते समय वह इंसान बोल पड़ा-‘महाराज, नीचे सारे संसार का सारा ढर्रा बदल गया है और एक आप है कि पुराने तरीके से काम चला रहे हैं। अब आप इंसानों का भी पंख लगाना शुरु कर दीजिये ताकि कुछ गरीब लोग धनाभाव के कारण आकाश में उड़ सकें। अभी यह काम केवल पैसे वालों का ही रह गया।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘पंख दूंगा तो गरीब क्या अमीर भी उड़ने लगेंगे। बिचारे एयरलाईन वाले अपना धंधा कैसे करेंगे? फिर पंख देना है तो तुम्हें इंसान की बजाय कबूतर ही बना देता हूं। मेरे लिये कौनसा मुश्किल काम है?
वह इंसान बोला-‘नहीं! मैं इंसान अपने पुण्यों के कारण बना हूं इसलिये यह तो आपको अधिकार ही नहीं है। जहां तक पंख मिलने पर अमीरों के भी आसमान में उड़ने की बात है तो आपने सभी को चलने और दौड़ने के लिये पांव दिये हैं पर सभी नहीं चलते। नीचे जाकर आप देखें तो पायेंगे कि लोग अपने घर से दस मकान दूर पर स्थित दुकान से सामान खरीदने के लिये भी कार पर जाते हैं। ऐसे लोगों पर आपकी मेहरबानी बहुत है और पंख मिलने पर भी हवाई जहाज से आसमान में उड़ेंगे। मुद्दा तो हम गरीबों का है!’

सर्वशक्तिमान ने कहा-‘वैसे तुम ठीक कहते हो कि पांव देने पर भी इंसान अब उसका उपयोग कहां करता है पर फिर भी पंख देने से तुम पक्षियों का जीना हराम कर दोगे। अभी तो तुम उड़ते हुए पक्षी को ही गुलेल मारकर नीचे गिरा देते हो। फिर तो तुम चाहे जब आकाश में उड़ाकर पकड़ लोगे।’

उस इंसान ने कहा-‘ऐसा कर तो इंसान आप का ही काम हल्का करता है। वरना तो आपका यह प्रिय जीव इंसान हमेशा हीं संकट में रहेगा। इनकी संख्या इतनी बढ़ जायेगी कि इंसान भाग भाग कर आपके पास जल्दी आता रहेगा।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘अरे चुप! बड़ा आये मेरा काम हल्का करने वाले। वैसे ही तुम लोगों की वजह से हर एक दो सदी में अहिंसा का संदेश देने वाला कोई खास इंसान जमीन पर भेजना पड़ता है। वैसे तुम इंसानों ने वहां पर्यावरण इतना बिगाड़ दिया है कि नाम मात्र को पशु पक्षी भेजने पड़ते हैं। अधिक भेजे तो उनके लिये रहने की जगह नहीं बची है। सच तो यह है मुझे सभी प्रकार के जीव एक जैसे प्रिय हैं इसलिये सोचता हूं कि कुछ पशु पक्षी वहां मेरा दायित्व निभाते रहें। वह बिचारे भी मेरे नाम पर शहीद कर दिये जाते हैं इस कारण उनको अपने पास ही रखना पड़ता है। कभी सोचता हूं कि उनको दोबारा नीचे भेजूं पर फिर उन पर तरस आ जाता है। वैसे मैंने तुम इंसानों को इतनी अक्ल दी है कि बिना पंख आकाश में उड़ने के सामान बना सको।’
वह इंसान बोला-‘वह सामान तो बहुत है पर वहां पेट्रोल की वजह से एयर लाईनों में किराये बढ़े गये हैं और उसमें अमीर ही उड़ सकते हैं या आपके ढोंगी भक्त! गरीब आदमी का क्या?’

सर्वशक्तिमान ने कहा-‘गरीब आदमी जिंदा तो है न! अगर उसे पंख लगा दिये तो भी उड़ नहीं सकेगा। अभी गरीब आदमी को कहीं बैल की तरह हल में जोता जाता है और कहीं उसे घोड़े की जगह जोतकर रिक्शा खिंचवाया जाता है। अगर पंख दिये तो उसे अपने कंधे पर अमीर लोग ढोकर ले जाने पड़ेंगे। इंसान को इंसान पर अनाचार करने में मजा आता है और इस तरह तो गरीब पर अनाचार की कोई सीमा ही नहीं रहेगी। वैसे तुम क्यों फिक्र कर रहे हो।
वह इंसान बोला-‘महाराज, मैं तो बस जिंदगी भर आकाश में उड़ना चाहता हूं।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘अब तो बिल्कुल नहीं। तुम इंसानों को अक्ल का खजाना दिया है पर तुम उसका इस्तेमाल पांव से चलने पर भी नहीं कर पाते तो उड़ते हुए तो वैसे ही वह अक्ल कम हो जाती है। इतनी सारी दुर्घटनाओं के शिकार असमय ही यहां चले आते हैं और जब तक उनके दोबारा जन्म का समय न आये तब तक उनको भेजना कठिन है। उनसे पूरा पुराना अभिलेखागार भरा पड़ा है। अगर तुमको आकाश में उड़ने के लिये पंख दिये तो फिर ऐसे अनेक पुराने अभिलेखागार बनाने होंगे। अब तुम जाओ बाबा यहां से! कुछ देर बाद कहोगे कि सांप की तरह विष वाले दांत दे दो। अमीर तो अपनी रक्षा कर लेता है गरीब कैसे करेगा? जबकि उससे अधिक विष अंदर रहता ही है भले दांत नहीं दिये पर उसने तुम इंसान कहां चूकते हो।’
सर्वशक्तिमान ने उस जीव को नीचे ढकेल दिया।
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Aug 1, 2009

एक अलबेला कौवा, नारियों के लिये हौवा-हिंदी हास्य व्यंग्य (ek albela kauva-hindi hasya vyangya)

एक टीवी समाचार चैनल पर प्रसारित यह समाचार अत्यंत दिलचस्प था कि एक गांव में एक अलबेला कौवा नारियों को चोंच मारकर परेशान कर रहा है। हालांकि उसमें एक तरफ तो यह कहा जा रहा था कि नारियों को परेशान किया जा रहा है दूसरी तरफ कह रहे थे कि वह युवा नारियों को छेड़ रहा है। अलबत्ता खबर से यह लगा कि वह चैंच मारकर भाग जाता है।
दरअसल उस कौवे ने एक पेड़ पर अपने अंडे रखे हैं और उस मोहल्ले की लड़कियां जब वहां से निकलती हैं तो वह उन पर हमला कर भाग जाता है।
एक स्त्री कहना था कि ‘उसने उस पेड़ पर अपने अंडे रखे हैं और शायद वह इस डर से हमले करता है कि लड़कियां उसके अंडे न उठाकर ले जायें।’
वहां महिलायें परेशान होने के बावजूद उसे एक मनोरंजक घटना भी मान रहीं थी। मजे की बात यह है कि वह कौवा पुरुष वर्ग के बारे में निश्चित है कि वह उसके अंडे नहीं ले जायेंगे।
एक महिला ने कहा-‘अगर वह कोई लड़का होता तो उसकी शिकायत करते पर इस छिछोरे कौवे की भला कहां शिकायत की जा सकती है।’
कहने को तो सभी कौवे काले रंग के होते हैं पर उनमें कुछ मादा भी होती/होते हैं-यह हम अनुमान से कह रहे हैं क्योंकि हमारी जानकारी में ऐसी कोई बात नहीं आई कि कौवे समलैंगिक होते हैं। जब मादा होगी तभी तो उसे बच्चे पैदा होते होंगे। इंसानों की तरह पशु पक्षियों में भी नारी जाति बच्चे की रक्षा करने के लिये तत्पर रहती है। कुछ पशु पक्षियों के बारे में कहा जाता है कि अपने बच्चे को खतरा देखकर उनकी मादा खूंखार हो जाती है। जैसे बिल्ली के बारे में कहते हैं कि वह किसी आदमी से अपने बच्चे को खतरा देखती है तो उसकी आंखों में पंजे गाड़ देती है।
जिस तरह यह समाचार प्रसारित हो रहा था उसमें सनसनी कम मनोरंजन अधिक नजर आ रहा था। ऐसे मनोरंजक प्रसारण भी समाचारों की श्रेणी में आते हैं जो सीधे निर्मित होते हैं न कि फिल्मी या खेल के वह समाचार जो बनते हैं कमाई के लिये और उनका विज्ञापन मनोरंजन के नाम पर किया जाता है।
बहरहाल उस कौवा की चर्चा बहुत दिलचस्प लगी। आखिर वह नारी जाति पर के लिये हौव्वा क्यों रहा है? क्या पिछले जन्म में वह कोई ऐसा नर था जिसे नारी ने धोखा दिया। वैसे कौवे द्वारा नारियों को छेड़ने की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले इंद्रपुत्र जयंत ऐसी खुराफात भगवान श्रीराम जी की अर्धांगिनी श्रीसीता जी से कर चुका है जिसमें उसने अपनी आंख गंवा दी थी। संभव है कि यह कौवा फिर प्रकट हुआ हो पर अब यहां इस धरती पर श्रीराम जैसा कोई चरित्र तो है नहीं जो उसकी दूसरी आंख निकाल सके। फिर जैसे वह चैदह पंद्रह वर्ष की युवतियों को छेड़ रहा है उससे यह भी संदेह हो रहा है कि वह उस इतिहास को पढ़ चुका है या स्वयं संबद्ध रहा है इसी कारण जिस युवती के पीछे पति रूपी रक्षक न हो उन्हीं पर अपनी चैंच संभवतः गड़ा रहा है।
बहरहाल इस तरह दूसरे कौवे भी करने लगे तो महिलाओं के लिये परेशानी और मनोरंजन दोनों ही होगा ं। कहते हैं कि झूठ बोले कौवा काटे! अगर दूसरी महिला को काट गया तो कह सकती हैं कि देखो झूठ बोलती होगी।’
खुद को काट जाये तो फिर सोचती होंगी-हाय! मैं तो कभी नहीं झूठ बोलती!’
मगर जमाने का क्या? वह तो यही कहेगा कौवा काट गया तो इसका मतलब यही है कि झूठ बोलती होंगी।’
वैसे दूसरे कौवे भी यह करने लगें तो आश्चर्य नहीं होगा। हो सकता है कि वह कौवा पूर्वाभ्यास कर रहा हो। आजकल झूठ बोलने का रिवाज बढ़ गया है। कौवा किसी को काट नहीं रहा है। ऐसे में समस्त कौवों को अपनी छबि की चिंता होगी। इसलिये संभव है कि वह कौवा अपनी जाति का दूत होकर विचर रहा हो कि देखें मनुष्य की तरफ से किस तरह की प्रतिक्रिया होती है। वह अपना प्रतिवेदन कौवा महासम्मेलन में प्रस्तुत कर सकता है और फिर उसके निष्कर्षों के आधार पर बाकी कौवे भी सक्रिय हो जायें तो कोई आश्चर्य नहीं है।
आजकल मोबाइल आ गया है। लोग अधिक ही झूठ बोलते हैं।
लड़की ने मोबाईल उठाया। बात की और रख दिया। मां ने पूछा-‘किसका फोन था?’
‘फैंड्स का था-’कहीं भी ऐसा जवाब सुनने को मिल सकता है।
अब यह फैं्रड्स लड़का भी हो सकता है और लड़की भी! मां यह सोचकर चुप हो जाती है कि ‘लड़की का होगा’। लड़कीे चालाकी दिखाती है। उसने मां से झूठ न बोलकर अपने दिल को तसल्ली दी कि ‘मां से झूठ नहीं बोलकर मैंने अपना धर्म निभाया।’
यही स्थिति लड़के की भी है। फोन उठाता है। बात कर मोबाइल अपने हाथ पकड़ कर चल देता है। बाप पूछता है कि-‘कहां जा रहे हो?’
‘फैं्रड्स से मिलने।’यह भी जवाब अक्सर सुनने को मिलता है।’
अभी तक माता पिता यही मानकर चलते हैं कि वह समलैंगिक मित्र से मिलने जा रहा है-हालांकि इसका आशय अभी तक अच्छा था पर आगे यह बुरा लगने लगेगा। जो पाठक इस पाठ को पचास वर्ष बाद पढ़ें तो यह बात ध्यान रखें कि समलैंगिक से आशय केवल इतना ही है कि लड़का अपने मित्र लड़के और लड़की अपनी सहेली से केवल वार्तालाप करने जा रही है। पचास वर्ष बाद तो समलैंगिक शब्द ही खतरनाक होने वाला है यह हमें आज ही पता है।
आप सोच रहे होंगे कि लड़के भी झूठ बोलते हैं तो कौवा उनको शायद नहीं काटेगा तो यह भ्रम भी निकला दीजिये। इसी कार्यक्रम में एक दूसरे कौवे का जिक्र भी था जिसमें वह एक ग्रामीण को परेशान कर रहा है। वह ग्रामीण तमाम तरह के तंत्र मंत्र कर चुका है पर वह कौवा उसका पीछा नहीं छोड़ रहा है। यह कौवा बड़ा चालाक पक्षी है। यह तो पता नहीं कि दोनों घटनाओं में वह झूठ बोलने के कारण हमले कर रहा है या नहीं पर हो सकता है कि यह केवल अभ्यास हो बाद में कौवा जाति केवल झूठ बोलने वालों पर ही हमला करे।
दरअसल यह कौवा इस देश में ही इसलिये बचा हुआ है कि अभी भी इस देश में पुरानी अध्यात्मिक वृत्ति के लोग अधिक हैं। अगर देश से कहीं बाहर होता तो अभी तक दोनों कौवों को मारकर उनका मांस खा लिया जाता। तिस पर नारी जाति पर आंख डालने पर तो पूरी कौवा कौम ही मिटा दी जाती। हमारा अध्यात्मिक दर्शन सभी प्रकार के जीवों के साथ सहिष्णुता से जीना सिखाता है पर यह सभी जगह नहीं है। बाकी जगह तो इंसान के लिये पशु पक्षी क्या दूसरे ऐसे इंसान को भी मिटा दिया जाता है जो समूह के कायदे और कानून नहीं मानता या विद्रोह करता है।
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Jun 28, 2009

बर्बर और रहबर-व्यंग्य कविता

कहीं दूर पहाड़ी के पार
होने का दावा करते
कहीं कागज पर चित्र खींचकर दिखाते
वह ख्याली बर्बर इंसान का खौफ
आम आदमी के मन में बिठाते।
अपना नाम इसी तरह
रहबरों में लिखाते।

इतिहास में बही खूनी नदियां
बीत गयी अनेक सदियां
पर वह अभी भी
कलम से कागज पर लिखवाते
इसी तरह जमाने को
अपनी रहबरी का कमाल दिखाते।

कहीं तलवार फहराते
कहीं कलम लहराते
मकसद से परे निशाना लगाते
जंग में अमन का रास्ता ढूंढना सिखाते।

उनके अल्फाजों से
जो बहका
वह अपने रास्ते से भटका
जिंदा रहा तो भीड़ में भेड़ की तरह
मरा तो शहीद दिखाते।

धरती पर पैदा इंसान
बनता न हैवान
तो फरिश्ता बनने का
मौका वह कैसे पाते
इसलिए बर्बरों की तस्वीर सजाकर
वह अपनी रहबरी दिखाते।

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Jun 21, 2009

प्यार के शिकार का दर्द-हिंदी शायरी

ढूंढ रहे हैं बाज़ार में
किसी भाव भी किसी का दिल मिल जाए.
प्यार वह शय है
जो हर बाज़ार में बिकती है
मगर खरीद फरोख्त
मुफ्त में होती दिखती है
चेहरे पर भले नकली चमक हो
जेब में भले ही छोटे सिक्कों की खनक हो
किसी को नीयत और असलियत की न भनक हो
जाल बिछाकर बैठो
भटके दिमाग और खाली दिल
शिकार की तरह चले आयेंगे
अपना प्यार लुटाएंगे मुफ्त में
भले ही फिर उनका मज़ाक बन जाए.
तुम तो ठहरे शिकारी
भला कौन तुम्हें
प्यार के शिकार का दर्द समझाए.

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May 9, 2009

ओ! उदास रहने वालों-हिंदी शायरी

उदास मन है जमाने के
क्योंकि लोग खुशी बांटते नहीं हैं
अपने गमों का पिटारा खोले बैठे है सभी
खुश होने के अपने इरादे बांधते नहीं है।

बंद कर लिये हैं दरवाजे सोच के
दूसरे के दर्द पर हमदर्द बनना तो दूर
उसके दिल के दरवाजे पर झांकते नहीं है।

हारे हुए लोग ढूंढ रहे हैं
अंधेरों में खुशी के चिराग
ठंडा है शरीर पर
दिल में लगी है आग
अपनी खुशी को छिपाने की कोशिश
न हों फिर भी गम दिखाने की कोशिश
बांटते नहीं अपनी खुशी जमाने में हवा की तरह
एक झौंका बहकर कितने लोगों को
खुश कर सकता है जानते नहीं है।

ओ हमेशा उदास रहने वालों
बुरी खबरें तो अक्सर आती है
फिर भी देखते रहो उसमें कहीं अच्छी तो नहीं है
बनाये रखे अपना मनोबल
उससे अधिक ताकत किसी में नहीं है

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Apr 6, 2009

अनुभूति के रस का प्रवाह-हिंदी शायरी

प्यार अगर कहीं उगता तो
बरसता हर सावन में
महकता हर बसंत में
हर पल
हर जगह जमीन पर छितरा जाता।
हाथ से पकड़ा न जाये
आंख से देखा न जाये
कान से सुनना है कठिन
मूंह से चूसा न जाये
इंसान के रक्त में
अनुभूतियों के रस का प्रवाह न हो
तो प्यार की पहचान नहीं हो सकती
दिल के अहसास में प्यार अपनी जगह बनाता।
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