Apr 16, 2007

नसीब और ख़ुशी

कुछ पलों की ख़ुशी की खातिर
झूमते और नाचते है लोग
फिर थक हारकर बैठ जाते हैं
फिर भी लगता है उन्हें कि
वह खुश नही हो सके
फिर ख़ुशी कि तलाश में
निकल पड़ते हैं लोग
चूहे-बिल्ली जैसा खेल है
इस इंसानी ज़िन्दगी का
आगे चलती अद्रश्य ख़ुशी
पीछे चलता हैं इन्सान
ख़ुशी की कोई पहचान नहीं है
आंखों में कोई तस्वीर नहीं है
मिल भी जाये तो उसे
कैसे पहचाने लोग
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तुम तय करो पहले चाहते क्या हो
फिर सोचो कैसे चाहते हो
उजालों में ही जीना चाहते हो
तो पहले चिराग जलाना सीख लो
बहारों में जीना है तो
फूल खिलाना सीख लो
उड़ना है हवा में तो
जमीन पर पाँव रखना सीख लो
अगर तैरना है तो पहले
पानी की धार देखना सीख लो
यह ज़िन्दगी तुम्हारी कोई खेल नहीं है
इससे खिलवाड़ मत करो
इसे मजे से तभी जीं पाओगे
जब दिल और दिमाग पर
एक साथ काबू रखो
तुम्हारे चाहने से कुछ नहीं होता
अपने नसीब अपने हाथ से
अपनी स्याही और अपने कागज़ पर
लिखना सीख लो
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