May 3, 2007

लिखना है तो लिखना है

मैं क्यों लिखता हूँ , मुझे नहीं मालुम ! अब सवाल भी अपने से है जवाब भी स्वयं ही देना है। लेखक होने के कारण भावुक हूँ और यह भावुकता इसके मुझ को मजबूर करती है । यह जरूर नहीं है कि हर भावुक व्यक्ति लेखक हो पर लेखक भावुक होता हो इसमें संशय नहीं है , यह अलग बात है कि अपनी संवेदनशीलता को अपने शब्दों में कितना पिरो सकता है यह वही जानता है । बात लिखने की चल रही है और मैं अपने लिखने का उद्देश्य तलाशना चाहता हूँ। मैंने लिखना अपने अकेलेपन में स्वयं को तलाशने के लिए किया था-और यह सिलसिला शुरू हुआ तो यह भाव बना कि लोग इसे पढ़ें । देश के कयी अखबारों में छपने के साथ मेरी लिखने की भूख भी बढती गयी और फिर धीरे धीरे विरक्ति होती गयी और फिर टीवी पर क्रिकेट देखने की आदत ने अपना लिखा बाहर भेजना बंद किया और फिर लिखना भी कम हो गया । मैंने एक बात अनुभव की जब मैं नहीं लिखता तो मेरा मन परेशान हो उठता था , और जब लिखता तो मेरे अन्दर एक खुशनुमा अहसास होता। लिखते समय मैं एक बात का ध्यान रखता हूँ कि मैं अपना तनाव मन की खिड़की से बाहर फैंक रहा हूँ पर वह मेरी रचना के पास से निकल रहे पाठक पर नहीं गिरना चाहिए। कभी भी मैं नकारात्मक विचारधारा का समर्थक नहीं रहा, और किसी पर अपने लिखने से व्यक्तिगत आक्षेपों से दूर ही रहता हूँ । किसी एक घटना पर लिखने में मजा नहीं आता और न ही उसमें कोई निष्कर्ष निकाला जा सकता है। एक समय पर एक कोई घटना जब होती है तो हम समझते हीं कि वह केवल वहीं हुयी है जबकि वैसी घटना विगत में हो चुकी होती है और भविष्य में भी होने की तैयारी होती है -बस पात्रों के नाम, स्थान और समय बदलता रहता है।जब मेरे मन में हलचल होती है तो उस पर नियन्त्रण करने के लिए मैं कलम उठा लेता हूँ-अब आप कह सकते हैं कि कंप्युटर पर आ जाता हूँ। मेरे मन की पीडा लिखने को प्रेरित करती है। पीड़ा के उदगम और विसर्जन के बीच की प्रक्रिया के बीच चिंतन और मनन चलता रहता है।कम्पूटर की भाषा में कहें तो प्रोसेस चलता रहता है। मेरे प्रयास रहता है मी पीडा के विसर्जन से दूसरी जगह उदगम नहीं होना चाहिऐ। जिन लोगों में अपनी गलती से सीखने की आदत होती है वह कभी निराश नहीं होते -उन्हें अपने हादसों से ही ज्ञान प्राप्त करने का अभ्यास हो जाता है। जो लोग अपनी नाकामियों की गलती दूसरों पर डालते हैं और हादसों से जो बिखरने लगते हैं वह कभी लिख नहीं सकते और न ही बोल पाते हैं और उनके पास घुटने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता। एक लेखक के रुप ने मुझे कभी इस स्थिति में नहीं आने दिया । लोग विरोधाभासों में जीते है पर उनेह इसकी अनुभूति नहीं होती । मैं भी कयी बार अपने अन्दर इन विरोधाभासों को देखता हूँ और उन पर दृष्टि रखता हूँ । विरोधाभास का मतलब एक घटना पर एक तर्क और वैसी घटना दूसरी जगह होने पर दूसरा तर्क देना। अपने साथ कोई बात होने पर एक तर्क वैसी ही बात दुसरे के साथ होने पर दूसरा तर्क देना एक मंवील स्वभाव का हिस्सा है। कई बार ऎसी स्थिति आने पर मैं ऐसा करता हूँ पर कम से कम मैं अपने अन्दर इस बोध के साथ रहता हूँ पर लोग अपने को भुलावे में डालने में सफल हो जाते हैं। मैं समय की बलिहारी मान लेता हूँफिर मैं क्यों लिखता हूँ ? इसका उत्तर मैंने लिखते लिखते ढूँढ लिया । हमारी सारी इन्द्रियां अपने मूल स्वरूप के अनुसार काम करती हैं-जैसे आँखों का काम है देखना वह देखती हैं ,कानों का काम है सुनना वह सुनते हैं, नाक कान है सूंघना वह सून्घती हैं , मस्तिष्क का काम है सोचना वह सोचता है और मुख का काम है भोजन ग्रहण करना और शब्दों के उदगम स्थल के रुप में अपनी भुमिका का निर्वहन करना। लिखना किसी भी इन्द्रिय का मौलिक काम नहीं है और वह केवल स्व प्रेरणा से ही संभव है । स्व प्रेरणा से कोई भी कार्य करने में जो अनुभूति है उसे लेखन के द्वारा ही महसूस किया जा सकता है । मेरा लिखना निरुद्देश्य है पर निष्फल नहीं है क्योंकि इससे न केवल मुझे आनंद मिलता है वरन अनेक अच्छे मित्र इसी लेखन के जरिये मिले हैं और सम्मान भी मिला है।इण्टरनेट पर ब्लोग बनाने का फैसला मेरी गलतियों का परिणाम से हे हुआ। दरअसल मैं कुछ ढूँढ रहा था और मैं सोच रहा था कि मैं वही कर रहा हूँ। पता लगा कि एक ब्लोग बन गया है , समझ में कुछ आया नहीं अचानक नारद पर बने ब्लोग की याद आयी । नारद को भेजी गयी एक रचना अभी एक रचना एक वेब मेगजीन अभिव्यक्ति में छपी है जो इस बात का प्रमाण है मेरा उस समय ज्ञान कितना था। मैं आज भी नारद पर जाने के लिए पहले अभिव्यक्ति का दरवाजा खट ख्ताता हूँ। कर रहा था नारद से संपर्क और सोचता था कि पत्रिका से कर रहा हूँ । अपनी गलतियों और हादसों से बचने के लिए लिखना भी एक कारण है पर इन्टरनेट पर उनसे भी पीछा नहीं छूटता । सोचा गलती से ब्लोग बना और हादसे से नारद में प्रव्वेश हुआ , तो लिखो कोई पूछे तो पूछता रहे कि तुम लिखे क्यों हो?
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