May 6, 2007

बारात का एक दिन, शादी की एक रात-कविता

एक दिन की बारात
शादी की एक रात
आदमी अपनीसारी जिन्दगी की
कमाई दाव पर लगाता है
दूसरों को खुश कर अपनी
ख़ुशी का सपना सजाता है
पर जब आता है वह दिन
गहराती है रात
तब बदहाल आदमी भूल जाता है
अपनीसारी ख़ुशी
झूठी शान में अपने को थकाता है
सब बाराती चले जाने पर
खाली पंडाल के नीचे खङा आदमी
खर्च और भेंट का हिसाब करते हुए
झूठी प्लेटों के बीच खडे होकर
इधर-उधर देखता झुंझलाता
बारात का वह दिन
शादी कि वह रात
अपने बेटे की शादी पर
सुखद कल्पनाएं जो उसने की थी
उन्हें वह ढूँढता रह जाता
और फिर वह अब बेटी की
शादी में जुट जाता
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शादी एक खूबसूरत ख्वाब है
जो देखता है हर कोई
पहले अपने शादी का जश्न मनाने के बाद
अपनी औलाद होने पर उसकी शादी का
ख्वाब सजोने लगता है हर कोई
बेटा होने पर सोचता ऎसी बहु
घर में लाऊँगा जो मेरे पाँव दबाए
भोजन और पानी दे बैठे-बिठाए
हर शख्स मेरी किस्मत पर चिढ जाये
बेटी होने पर यह ख्वाब सजाता है
ऐसे भर भेजूंगा जहां राज करेगी
घर के नौकर करेंगे सेवा
मेरी बेटी खाएगी मेवा
लोग मेरी किस्मत पर बौख्लायेंगे
वाह रे इन्सान कैसी है तेरी सोच
बरात का एक दिन
शादी की बस एक रात
पूरी जिन्दगी दाव पर लगाता है
ख्वाब हकीकत नहीं होते
रोते हुए ही जिन्दगी गुजारता है
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