May 11, 2007

आध्यात्म यानी आत्मसाक्षात्कार का साधन

हम जब भी कुछ विचार करते हैं तो उसका केंद्र इस संसार में मौजूद तत्व ही होते हैं जो हमें दिखाई देते हैं जिनका मूल स्वभाव ही नश्वर है। परमात्मा से बिछडे आत्मा तत्व की तरफ हम देखते तक नहीं जो हमारी देह को धारण किये हुए हां और जो अविनाशी भी है। हम देख-और सुख के मायावी जाल में इस तरह फंसे हैं कि लगता है बस यह सांसरिक तत्व ही सत्य है और केवल उसमें ही फंसकर अपना जीवन गुजार देते हैं , और उस आत्मा से कभी नहीं जुड़ते जो सदैव हमारी और इस भाव से ताकता रहता है कि हम उससे संपर्क करेंगे। पंच तत्वों से बनी इस देह में रहने वाली तीन प्रक्रतियां अहंता, ममता और वासना सदैव हमारी बुध्दी और मन को इस तरह फंसाये रहती हैं कि हम अपने आत्मा पर जीवन भर दृष्टि नहीं कर पाते और ढ़ेर सारी तकलीफें झेलते हैं। सरलता से जिस जीवन को जिया जा सकता है उसमें हम ढ़ेर सारे तकलीफें स्वयं बुला लेता हैं। आप सोच रहे होंगे कि कोई वृध्द व्यक्ति अपनी रोनी रो रहा है। ऎसी बात नहीं है न मैं वृद्ध हूँ न नवयुवक । तनाव के पल मेरे लिए भी आते हैं पर उस समय मैं अपने इष्ट का स्मरण करता हूँ तब हस पड़ता हूँ, लगता है कि इसे मैं अपना दु:ख क्यों समझ रहा हूँ यह तो देह के साथ लगा ही रहेगा। मैं सभी प्रकार के सांसरिक कार्य करते हुए भी उनमें पाने भाव को लिप्त नहीं करता , यह राज केवल मैं ही जानता हूँ पर मेरे निकट के लोग इसका आभास तक नहीं कर पाते, वह सोचते हैं कि मैं हंस रहा हूँ पर मैं केवल इस दुनियां में लोगों का पाने देह पर अभिमान को देखकर हंसता हूँ। मैं अगर किसी का काम करता हूँ तो वह खुश होकर मुझे धन्यवाद देता है पर मुझ पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता क्योंकि जो काम मैं करता हूँ उसका करतार स्वयं को नहीं मानता। बचपन से लेकर आज तक भगवान् की भक्ती करते हुए मैं मन मैं कोई कामना नहीं रखता क्योंकि मेरा मनाना है कि जो हुआ वह तो होना ही था और जो रहा है उस पर मेरा बस नहीं है जो होना है वह अटल है, फिर उस अपने इष्ट से मैं क्या माँगूं जिसने इस देह में सारे कार्य करने की शक्ति दीं है । और हम कोई भी सांसारिक कार्य उससे संपन्न कर सकते है तो फिर हम उस परमपिता के सामने क्यों हाथ फैलाते हैं ? जी समय हम उसे अपने ह्रदय में धारण कराने का प्रयास करते हैं तब हमारे अन्दर मौजूद अहंता,ममता और वासना तीनों मिलाकर हमें कुछ मांगने के लिए प्रेरित करती हैं और हम भगवन से वह माँगते है, जबकि उस समय कुछ न सोचे तो वह हमारे अन्दर स्थापित होकर हमें परमानंद की अनुभूति करायेगा पर उस समय भे सांसरिक बात सोचकर हम वह कीमती समय नष्ट कर देते हैं। शेष आगे
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मन के खेल पर भारी धन का चक्कर-दीपकबापूवाणी (man ke khet par dhan ka Chakkar-DeepakBapuwani)

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर, वैभव रथ पर सवार देव से लेता टक्कर। ‘दीपकबापू’ आदर्श की बातें करते जरूर, रात के शैतान दिन में बनते फक्कड़।।...