May 26, 2007

हाँ, मैं उसे जानता हूँ

NARAD:Hindi Blog Aggregator
सुबह सायकल पर अपने काम पर निकल जाने वाला वह शख्स मुझे आज भी याद है। उसकी आय अच्छी थी पर घूमता वह सायकल पर ही था। गर्मी के दिनों में अपना मकान बनवा रहा था। पसीने -पसीने हो जाता था, लोग कहते भाई गाडी लो लो, वह सुनकर चुप हो जाता था। उसने अपना मकान भी बनवा लिया उसमें रहने भी आ गया और स्कूटर भी ले लिया पर फिर भी घूमता वह सायकिल पर ही था केवल छुट्टी के दिन ही वह अपने परिवार को घुमाने के लिए उसे चलाता था।

लोग कहते कि पैट्रोल के पैसे बचा रहा है वह फिर भी खामोश रहता । इसके पीछे उसके कोई अन्य मजबूरी नहीं थी, बस वह शराब पीता था और उसकी आय में या तो स्कूटर के लिए पैट्रोल आ सकता था या फिर दारू की बोतल। वह बहुत सोचता था कि दारू पीना छोड़ दे पर नहीं छोड़ पाता। सायकल पर जाता था , भीषण गर्मी में उसके शरीर से पसीना इतना निकलता की उसकी पैंट और कमीज से टपकने लगता था आँखों में सूनापन उसके शरीर में धड़कता ऐसा संवेदनहीन ह्रदय कि उसे अपनी शारीरिक और मानसिक तकलीफों को अनदेखा करने में भी संकोच नहीं था। अपने लिए उसने ऐसा रास्ता चुना था जो सिवाय तबाही के और कुछ नहीं देता।

वह लक्ष्यहीन चला जा रहा था, उसकी सोच और विचार......वह नहीं जानता था कि उसके मन में क्या चल रहा है, अपनी जिन्दगी को वह बिचारा तो बेमन से जीं रहा था । भला बिना मन भी जिया जा सकता है ? वह बिचारा नहीं जानता था। कितना क्रूर था , नशे में चूर था-अनचाहे वह अपने और परिवार के साथ क्रूरतापूर्ण बर्ताव कर रहा था । लोगों ने उसकी ख़ूब हंसी उडाई-उसके और उसके परिवार की भी । वह ऎसी आग में अपने को जला रहा था जो उसने खुद लगाई थी-वह जनता था कि व्यसन एक आग की तरह ही हैं जो इन्सान को जीते जीं नष्ट कर देते हैं । लोगों से बात करते वह कतराता था -वह अच्छी तरह जानता था कि उसके दिमाग की यह हालत शराब की वजह से हुई है।

रोज तय करता था कि आज नहीं पियेगा पर फिर शाम होते होते उसके दिमाग में पीने से पहले ही शराब का नशा चढ़ने लगता था , उसके कदम शराब की दुकान की तरफ बढ जाते थे , उसकी हालत यह हो गयी थी कि मई-जून की गर्मी के दिनों में भरी दोपहर में पीने लगा था । एकदम पक्का शराबी हो गया था । ग़ैर या अपने उस पर क्या यकीन करते वह खुद अपने पर यकीन नहीं करता था ।

अब कहाँ है वह। मैं उसे ढूँढ रहा हूँ, मुझे पता है वह अब कभी दिखाई नहीं देगा । क्या वह मर गया ? अगर मनुष्य की पहचान देह से है तो जवाब है "नहीं, वह अभी जिंदा है" ।

अगर बुध्दी, विचार और कर्म से है तो-" हाँ वह अब इस दुनियां में नहीं है ।"

वह कुछ कह रहा है मुझे सुनाई नहीं दे रहा, वह दिखता है पर मैं उसे देखना नहीं चाहता। वह मेरे मन को विचलित कर देता है, मेरी आँखें बंद होने लगती हैं , मैं बहुत भयभीत हो जाता हूँ । मगर वह मुस्कराता है , उसका आत्मविश्वास देखते हुए बनता है। उसके इशारे पर मेरी उंगलियां इस कम्प्यूटर पर नाचने लगती हैं और वह आत्मविश्वास से मुस्कराने लगता है । मैं उसकी आखों की चमक को नहीं देख पाता क्योंकि कभी मैंने उसकी आंखों में भयानक सूनापन देखा था-जो मुझे आज भी याद है और जब उसकी तरफ देखता हूँ तो मुझे वह याद आ जाता है और मैं पानी नज़रें फेर लेता हूँ ।

इससे भी ज्यादा भयानक था उसके विचारों और बुध्दी में सूनापन .....जो मुझे डरा देता था । बहुत लिख चुका उसके बारे में, एक शराबी के बारे में और क्या लिखा जा सकता है । हालांकि लिखने के लिए बहुत कुछ है , क्योंकि वही तो लिखवा रहा है यह सब।
मैंने उससे पूछा -"तुम यह तो बताओ तुम शराब क्यों पीते थे ?"

मैंने अपना प्रश्न टाईप कर इधर-उधर देखा। वह वहाँ नहीं था। वह मुझे अब नहीं दिखता पर मेरे साथ ही रहता है। जब सामने आता है तो... ...वह अब भी बिचारा लगता है पर लगता है वह कुछ सोचता है । उसकी आँखें चमकते लगती हैं पर मैं उन्हें नही देखा पाता । किसी शीशे में अपने बाह्य रुप को देखना आसान है पर क्या ऐसा आइना है जिसमे अपने आन्तरिक रुप को देखा जा सकता है। मेरे पास वह भी है पर मैं उस शराबी को उसमें नहीं देखना चाहता। वह डरपोक है , बहुत बोलता है, ज्ञान बघारता है पर जब पूछते हूँ कि-" तुम शराब क्यों पीते थे?" तो दुम भागकर भाग जाता है।

मैं सोचता हूँ कि मुझे ऐसा प्रश्न नहीं करना चाहिए । आख़िर वह एक शराबी था और मैं उसे जानता था फिर उसे पूछकर परेशान नहीं करना चाहिऐ । हो सकता है कि वह बिचारा.........इस प्रश्न का उत्तर खुद नही जानता हो । मैंने देखा जैसे ही यह रचना लिख चुका वह कहीं मेरे आसपास मंडरा रहा है, मैं उसे देखना चाहता हूँ पर कुदरत ने कोई ऎसी चीज ही नहीं बनाए जो आदमी अपने सामने बैठाकर खुद को देख सके । अगर आप मुझे कांच देखने को कहेंगे तो यकीन करें वह इसमे मेरी मदद नही कर सकता ।
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